• हमारा लक्ष्य

    विश्वस्तरीय सोच, स्थानीय कार्य
    स्थानीय भाषा में शहरों के आधार पर डिजिटल शिक्षा द्वारा समाज को शिक्षित करना।

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  • हमारी दूरदर्शिता

    अनेकता के आदर एवं एकता में विश्वास पर आधारित शहरी नागरिकता - आई-रूल: :

    1.आई (इंटरनेट) – स्थानीय भाषा में प्रत्येक शहर के लिए स्थानीय एवं सामाजिक रूप से जिम्मेदार विषय वस्तु।

    2.आर (रिसर्च) – आर्थिक भुगोल से सम्बन्धित (राजनीतिक इतिहास और लोग / राजवंशों पर नहीं) विकासवादी तथ्यों व विज्ञान और रोजगार पर आधारित अनुसंधान।

    3.यू (अर्बनाइज़ेशन) – जैव-क्षेत्रीय नगर नियोजन - संस्कृति और प्रकृति में परस्पर निर्भरता।

    4.एल (लैंग्वेज) – भाषा के आधार पर विविधता की प्राथमिकता का निर्धारण (ना कि राजनीतिक भूगोल और जातीयता द्वारा) ।

    5.ई (एजूकेशन) – अन्तर्विषयक, मूल्यात्मक और समग्र शिक्षा। आजीवन सीखते रहने और सतत् कौशल उन्नयन के लिए जिज्ञासा पैदा करना।

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  • प्रारंग का अर्थ

    "प्रारंग" एक कम इस्तेमाल किया जाने वाला संस्कृत का शब्द है, जो तीन प्राथमिक रंगों को प्रदर्शित करता है जो हैं- नीला, पीला और लाल। ये तीन प्राथमिक रंग बाकी सभी रंगों के प्रणेता हैं। यही संदेश प्रारंग के चिन्ह में दर्शाया गया है- - भारत की एकता में विविधता का रंग।

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    हाथी- ऐतिहासिक रूप से हाथी को विश्व में भारत के प्रतीक चिन्ह के रूप में देखा गया है। वर्तमान भारत की आधुनिक राष्ट्रीय सीमाओं के बजाय प्रारंग का बेहतर प्रस्तुतीकरण एक सीमाहीन अवधारणा पर आधारित छवी एवं कल्पना से होता है जो कि राजनीतिक सीमाओं से परे है। भारत में छः लाख से अधिक गांवों और नौ हजार कस्बों और शहरों के होने के कारण कोई भी व्यक्ति अपने एक जीवनकाल में भारत के सभी भागों का भ्रमण करने एवं उसे समझने की आशा नहीं रख सकता। एक के अपने अनुभवों के आधार पर भारत न सिर्फ आगंतुकों के लिये बल्कि भारतीयों के लिये भी विभिन्न रूप समेटे हुये है। भारत की एक प्राचीन कथा ‘हाथी और छः अंधे व्यक्ति’, हमें अधूरे ज्ञान के खतरों एवं आत्मीयता और निष्पक्षता को संतुलित करने की ज़रूरत की याद दिलाती है।

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    "सम्पूर्ण हाथी" को देखना (अपने सारे रंगों और पूरे वैभव में), ही वास्तविकता में "अनेकता में एकता" है। यह केवल सीमाहीन (वैश्विक) एवं विस्तृत अनुशासन और समग्र शिक्षा के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता। प्रारंग ही वह बुनियादी रंगीन हाथी है । प्रारंग का उद्देश्य है कि सभी लोग इस हाथी को भारत के विभिन्न शहरों, कस्बों और गावों में अपने रंग बिखेरते देखकर इसी के रंग में रंग जायें और एक दक्ष नागरिक बनें।

  • प्रारंग का तरीका

    प्रारंग अनुसंधान एवं विकास प्रक्रिया – पहुंच, पुनर्गठन, पुनर्जोड़

    प्रारंग एक अनूठी शोध पद्धति का प्रयोग करता है जो प्रत्येक चयनित शहर / नगर के एक गहन विश्लेषण पर निर्भर करता है (अ) शहर का विकास, (ब) शहर के निवासियों का वर्तमान व्यवसाय व कार्य, (स ) प्रत्येक कार्य का शहर के प्राकृतिक परिवेश और ऐतिहासिक विकास से सम्बन्ध, (द) और शहर में रहने वाले नागरिकों की विविधता। इस प्रकार कार्य, स्थान और नागरिकता की विधिवत् समीक्षा के द्वारा शहर के महत्वपूर्ण जैव क्षेत्रीय बिंदुओं को परिभाषित किया जाता है।

    इसके बाद, एक समर्पित शोधकर्ता और दैनिक शोधपत्र लेखक एक शहर को सौंपा जाता है, और सलाह एवं लेखों के पञ्चांग की त्रैमासिक समीक्षा के लिए एक "नगर सलाहकार समिति" में सलाहकार नियुक्त किये जाते हैं। प्रत्येक शहर के शोधकर्ता द्वारा नियोजित पञ्चांग के आधार पर दैनिक ज्ञानवर्धक एवं सम-सामयिक लेख लिखे जाते हैं जो कि स्थानीय एवं वैश्विक ज्ञान की समीक्षा करते हैं। प्रत्येक लेख को एंड्राइड ऐप्प, वेबसाइट, शहर पोर्टल, फेसबुक व इन्स्टाग्राम आदि पर प्रसारित किया जाता है।

    विभिन्न धाराओं/विषयों पर ज्ञानवर्धक लेखों का चयन एक संतुलित तरीके से किया जाता है जो कि प्रत्येक स्थान की जैव-क्षेत्रीय बिन्दुओं को ध्यान में रखकर और एक 7 चरणीय कार्यप्रणाली के आधार पर किया जाता है। दैनिक लेखों का वर्गीकरण ‘संस्कृति’ और ‘प्रकृति’ के आधार पर 60 बिन्दुओं पर किया गया है ताकि नागरिकों को भविष्य में इन लेखों को खोजना व भिन्न शहरों की प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक तुलना सरलता से की जा सके।

    इस 7 चरणीय प्रक्रिया में चौथा कदम सबसे प्रभावशाली है जहाँ हम 3 अलग-अलग घटकों से प्रत्येक ज्ञानवर्धक लेख की सामग्री बनाते हैं जो कि तथ्य, चित्र और विषय (पुस्तकें व डिजिटल) सूत्र हैं। उसके बाद जैव क्षेत्रीय दस्तावेज़ और नगर सलाहकार समिति की सलाहों को ध्यान में रखकर दैनिक लेख लिखने से पहले चौथे घटक “भाव” को निर्धारित किया जाता है।

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  • हमारा परिवार

    प्रारंग एक स्टार्ट-अप उद्यम है जो वर्तमान के नोएडा, नई दिल्ली में स्थित शब्दचित्र अनुसंधान केंद्र द्वारा संचालित है। 4 शहरों में शुरुआती दौर के पूरे होने के बाद मध्य 2018 में यह एक अलग प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के रूप में जारी किया जाएगा । अधिक जानकारी और शब्दचित्र टीम के संपर्कों के लिए, कृपया वेबसाइट देखें http://www.shabdachitra.com

    सलाहकार– विभिन्न शहर/नगर नियोजन विशेषज्ञों, समाजशास्त्रियों, सरकारी अधिकारियों, प्रबंधन शास्त्रियों, पत्रकारों और कलाकारों ने भी अपने विचारों के माध्यम से प्रारंग में योगदान दिये हैं। वर्ष 2018 में प्रारंग के एक नयी कम्पनी के रूप में आने के बाद हम इनमें से कुछ सलाहकारों को तिमाही समीक्षा में शामिल होने के लिए आमंत्रित करेंगे। इन नामों की घोषणा के लिए इस स्थान पर नज़र बनाये रखें।

  • ज्ञान का संग्रहालय


    "मैंने हमेशा सोचा है कि स्वर्ग एक प्रकार का पुस्तकालय होगा।" - जॉर्ज लुइस बोर्जेस

    क्या पूरी दुनिया का ज्ञान, एक ही स्थान पर निहित किया जा सकता है यदि हम आज तक लिखी गयी सभी पुस्तकों, सभी चित्रों और सभी नक्शों को एक पुस्तकालय में एकत्रित कर लें? बोर्जेस अपनी कहानी “द लाइब्ररी ऑफ बेबल” (कोलाहल का पुस्तकालय) में एक ऐसे ही स्थान की कल्पना करते हैं जहाँ न सिर्फ आज तक लिखी गयी सभी पुस्तकें हों बल्कि भविष्य में लिखी जाने वाली पुस्तकें भी हों। एक और कहानी "अलेफ" में बोर्जेस इस कल्पना को और आगे ले जाते हैं जहाँ स्वयं भाषा के आधार-खण्ड को समझने के लिए, मनुष्य वर्णमाला के सिर्फ एक अक्षर का प्रयोग करके पुस्तकें लिखता है। इस बात की निरर्थकता यह स्पष्ट करती है कि- " मनुष्य के लिए ब्रह्मांड का पूरा ज्ञान एकत्र करना असंभव है"।

    हमारी योजना है एक ऐसा प्रारंग संग्रहालय बनाने की जो भारत की नदियों के किनारे, शहरों और कस्बों के विकास के माध्यम से भारतीय सभ्यता की कहानी प्रदर्शित करे। भारत की संस्कृति और प्रकृति को प्रदर्शित करने के लिए नई दिल्ली के बाहरी इलाके में, गंगा नदी के किनारे एक नदी सभ्यता संग्रहालय बनाया जाएगा। जहाँ एक तरफ इस संग्रहालय के निर्माण में कुछ साल लगेंगे, वहीं संग्रहालय में रखी जाने वाली वस्तुएं और पुस्तकें पिछले 25 से अधिक वर्षों में प्रारंग की संस्थापक टीम के सदस्यों द्वारा एकत्रित की गई हैं। यही अनूठा पुस्तकालय, किताबें, सिक्के, मूर्तियां, नक्शे, कॉमिक्स, टिकटें, पोस्टर, कालीन, फर्नीचर, कपड़े, जीवाश्म, पत्थर और भारतीय शहरों से संबंधित अन्य संग्रहणीय वस्तुएं प्रारंग के दैनिक ज्ञान लेख को अनोखा बनाती हैं। शब्दचित्र अनुसंधान केंद्र के शोधकर्ताओं को इन पुस्तकों और भारत की ऐतिहासिक वस्तुओं की उपलब्धता है। इसके द्वारा प्रारंग के सदस्यों के अन्दर एक महत्वपूर्ण मानसिक और शारीरिक संतुलन बना रहता है। हम अपनी अनुसंधान प्रक्रिया में इंटरनेट पर उपलब्ध मौजूदा डिजिटल जानकारी का प्रयोग न करके अपने संग्रह में मौजूद कॉपीराइट मुक्त छवियों और पुरातात्त्विक स्रोत किताबों का प्रयोग एवं अध्ययन करते हैं। प्रारंग का कार्य मात्र अनुवाद करने का नहीं है। हम एक शहर के पाठक के भाषाई स्तर, शैक्षिक स्तर और आर्थिक जरूरत को ध्यान में रखते हुए उसके लाभ के इरादे से अनुसंधान करते हैं एवं उसपे आधारित लेखन करते हैं।