यात्रा का सबसे सस्ता उपाय

लखनऊ

 02-06-2018 02:36 PM
य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

17वीं शती के कुशाग्रबुद्धि फ़्रांसीसी लेखक सिरानो दे बेर्जेराक अपनी व्यंगात्मक कृति ‘चन्द्रमा के राज्य का इतिहास’ (1652 ई.) में एक आश्चर्यजनक घटना का वर्णन करते हैं, जो मानो उनके साथ घटी थी। भौतिकी का कोई प्रयोग करते वक्त एक बार वे अचानक अपने उपकरणों समेत हवा में काफी ऊपर उठ आये। कुछ घंटे बाद जब वे पुनः धरती पर उतरने में सफल हुए, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा : वे अपने सगे फ्रांस तो क्या, यूरोप से भी बाहर आ चुके थे, वे उत्तरी अमरीका महादेश पर कनाडा में थे। अटलांटिक महासागर के पार इस आशातीत उड़ान को फ़्रांसिसी लेखक ने बिलकुल स्वाभाविक माना। उन्होंने समझाया कि जब तक वे धरातल से अलग थे, हमारे ग्रह ने पहले की तरह ही अपनी धुरी पर पूरब की दिशा में अपना घूमना जारी रखा। इसलिए जब वे पृथ्वी पर उतरे, उनके पैरों के नीचे फ़्रांस की बजाय अमरीका महादेश आ गया।

लगता है कि यात्रा करने का यह कितना आसान व सस्ता उपाय है। जमीन से ऊपर उठ आये, कुछ मिनट हवा में रुके रहे और दूर पश्चिम में बिलकुल नए स्थान पर उतर आये। महादेशों व महासागरों की यात्रा से थकने की बजाय पृथ्वी से ऊपर उठ कर इंतज़ार करना चाहिए कि कब वह स्वयं घूमती हुई आपकी मंजिल आपके पैरों तले पहुंचा दे। पर अफ़सोस कि यह अनूठी विधि कोरी कल्पना के सिवा कुछ भी नहीं है। प्रथमतः, हवा में ऊपर उठ कर हम पृथ्वी के गोले से अलग नहीं हो जाते : हम उसके गैसीय आवरण के सहारे उससे जुड़े रहते हैं, उसके वातावरण में लटके रहते हैं, जो स्वयं भी पृथ्वी के अक्षीय घूर्णन में साथ देता रहता है। हवा (या और सही कहें, तो हवा की निचली अधिक घनी परत) पृथ्वी के साथ घूमती रहती है और जो कुछ भी उसमें होता है – बादल, विमान, उड़ते पक्षी, आदि – सबों को अपने साथ पृथ्वी की धुरी के गिर्द घुमाती रहती है। यदि हवा पृथ्वी के साथ नहीं घूमती होती, तो हम हमेशा हवा का तेज़ बहाव अनुभव करते; इतना तेज़ कि उसके सामने बड़ी से बड़ी आंधी भी समीर के हल्के झोंके सी लगती।

तो फिर आखिर ऐसा क्यों होता है? इस सवाल का उत्तर है ‘जड़त्व’ (Inertia) । यदि हम वातावरण की ऊपरी परतों तक उठ आते या यदि वातावरण होता ही नहीं, तो भी हम यात्रा के इस सस्ते उपाय को काम में नहीं ला सकते, जिसकी फ़्रांसीसी लेखक ने कल्पना की है। घूमती हुई पृथ्वी के तल से अलग हो कर भी हम जड़त्व के कारण पुराने वेग से गतिमान रहते हैं। पुराने वेग से तात्पर्य है उस वेग से, जिससे हमारे पैरों तले पृथ्वी घूमती रहती है। जब हम पुनः नीचे उतरते हैं, हम अपने को उसी स्थान पर पाते हैं, जहाँ से ऊपर उठे थे। यह वैसी ही बात हुई, जैसे ट्रेन के डिब्बे में उछलने पर डिब्बे के सापेक्ष हम उसी पुराने स्थान पर गिरते हैं। तो इस प्रकार आसान शब्दों में रोज़मर्रा के जीवन से उदहारण लेकर जड़त्व को समझा जा सकता है।

1. मनोरंजक भौतिकी, या. इ. पेरेलमान


RECENT POST

  • नेताजी के जीवन पर स्‍वामी जी की अमिट छाप
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     23-01-2019 02:13 PM


  • भारत में अपशिष्ट जल की व्यवस्था
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     22-01-2019 02:44 PM


  • हमारे लिखने से पहले, कैसे जानता है गूगल हमारी मंशा
    संचार एवं संचार यन्त्र

     21-01-2019 02:06 PM


  • भेदभाव से लड़ते हुए समानता का एक सन्देश
    ध्वनि 2- भाषायें

     20-01-2019 10:00 AM


  • भारत में सेनेटरी नैपकिन को लेकर जागरूकता
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     19-01-2019 01:12 PM


  • ऊर्जा के नवीकरणीय स्रोत के रूप में इथेनॉल
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     18-01-2019 12:56 PM


  • क्‍या संभव है भूकंप का पूर्वानुमान लगाना?
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     17-01-2019 01:44 PM


  • इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IOT) तकनीक से बदलती रोजमर्रा की जिंदगी
    संचार एवं संचार यन्त्र

     16-01-2019 03:00 PM


  • भारत के गांव-गांव को डिजिटल जगत से जोड़ने की पहल 'भारत नेट'
    संचार एवं संचार यन्त्र

     15-01-2019 12:21 PM


  • मकर संक्रांति में तिल का धार्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     14-01-2019 11:48 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.