चलिए समझा जाए लखनऊ समझौते को गहराई से

लखनऊ

 09-11-2018 10:00 AM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

देश को ब्रिटिश हुकुमत से आज़ाद कराने के लिए देश में कई समझौते हुए। उन्हीं समझौतों में से एक समझौता लखनऊ समझौता भी था जो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की राजनीति को धराशाई करता था। आज़ादी की कोशिशों के दौरान नवाबों के शहर लखनऊ में अधिवेशन के जरिये हिन्दू-मुस्लिम एकता की नयी मिसाल पेश की गयी। यह अधिवेशन साल 1916 के दिसम्बर में दिनांक 26 से 30 तक लखनऊ में हुआ। इस अधिवेशन की अध्यक्षता अम्बिका मजूमदार ने की थी और इन्हीं की अध्यक्षता में कांग्रेस और मुस्लिम लीग के बीच समझौता हुआ था, जिसे लखनऊ समझौता कहा जाता है।

समझौते की पृष्ठ भूमि

• 1906 में जब मुस्लिम लीग का गठन किया गया। तब यह ब्रिटिश समर्थक होने के साथ अपेक्षाकृत एक मध्यम संगठन था।
• ब्रिटिश वाइसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने प्रथम विश्व युद्ध के बाद भारत के द्वारा युद्ध में सहयोग देने पर भारतीयों से सुधार सुझावों की मांग की थी।
• मुस्लिम लीग जिसका नेतृत्व मोहम्मद अली जिन्नाह कर रहे थे, इस अवसर का उपयोग कर संयुक्त हिंदू-मुस्लिम मंच के माध्यम से संवैधानिक सुधारों के लिए दबाव डालना चाहते थे।
• जिन्नाह तब दोनों पार्टियों के सदस्य थे और वे समझौते के लिए काफी हद तक जिम्मेदार थे।
• दिसंबर 1915 में चरमपंथियों ने बाल गंगाधर तिलक के नेतृत्व में और मध्यस्थों ने गोपाल कृष्ण गोखले की अगुवाई में बॉम्बे में लीग के नेताओं से मुलाकात की।
• यह पहली बार हो रहा था जब आई.एन.सी. (Indian National Congress) और मुस्लिम लीग, दोनों के नेताओं ने संयुक्त सत्र के लिए बैठक की थी।
• इस बैठक में नेताओं ने एक-दूसरे से परामर्श किया और संवैधानिक सुधारों के लिए मांगों की एक सूची तैयार की।
• अक्टूबर 1916 में इम्पीरियल विधान परिषद के निर्वाचित 19 भारतीय सदस्यों ने सुधार के लिए वाइसराय को एक ज्ञापन संबोधित किया।
• नवंबर 1916 में, दोनों पक्षों के नेताओं ने कलकत्ता में फिर से मुलाकात की और सुझावों पर चर्चा की और संशोधन किया।
• अंत में दिसंबर 1916 में लखनऊ में वार्षिक सत्र का आयोजन हुआ। जिसमें आई.एन.सी. और लीग ने समझौते की पुष्टि की।
• इसे लखनऊ संधि के रूप में जाना जाने लगा।

जिन्नाह के प्रयासों के लिए सरोजिनी नायडू ने जिन्नाह को 'हिंदू-मुस्लिम एकता के राजदूत' का शीर्षक दिया।

समझौते से सुधार

• भारत में ब्रिटिश हुकुमत न हो कर खुद की सरकार।
• भारतीय परिषद का समापन।
• न्यायपालिका से कार्यपालिका को अलग करना।
• भारतीय मामलों के सचिव के वेतन का भुगतान भारतीय धन से न करकर ब्रिटिश खजाने से किया जाएगा।
• केंद्र सरकार में मुस्लिमों को 1/3 का प्रतिनिधित्व दिया जाएगा।
• स्थानीय विधायिकाओं में मुसलमानों की संख्या प्रत्येक प्रांत के लिए निर्धारित की जाएगी।
• जब तक मतदाता मांग न करे सब का निर्वाचन क्षेत्र अलग-अलग होगा।
• अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व के लिए वेटेज (Weightage) की प्रणाली का परिचय (यह आबादी में बहुसंख़्यकों की तुलना में अल्पसंख्यकों को अधिक प्रतिनिधित्व देने के लिए निहित किया गया)।
• विधान परिषद का काल 5 साल तक बढ़ा देने की मांग।
• इंपीरियल विधान परिषद के आधे सदस्य भारतीय होंगे।
• सभी निर्वाचित सदस्यों को सीधे वयस्क मताधिकार के आधार पर निर्वाचित किया जाना है।
• विधान परिषद के सदस्य अपने प्रेसीडेंट (President) को चुनेंगे।

समझौते के परिणाम

• लखनऊ समझौते ने राष्ट्रीय राजनीती में एक हिंदू-मुस्लिम एकता की छाप छोड़ी। लेकिन यह केवल एक छाप थी जो अल्पकालिक थी।
• अलग सांप्रदायिक क्षेत्रों पर पार्टियों के बीच हुए समझौते ने औपचारिक रूप से भारत में सांप्रदायिक राजनीति की स्थापना की।
• इस समझौते के माध्यम से आई.एन.सी. ने भी स्वीकार किया कि भारत में विभिन्न हितों के साथ दो अलग-अलग समुदायों का समावेश था।
• इस समझौते ने मुस्लिम लीग को अब तक कांग्रेस पार्टी के साथ भारतीय राजनीति में आगे धक्का देने का काम किया था।

संदर्भ:
1.http://www.thehansindia.com/posts/index/Education-&-Careers/2016-08-05/Lucknow-pact/246775
2.https://byjus.com/free-ias-prep/lucknow-pact-1916
3.https://www.gktoday.in/gk/lucknow-pact-of-1916/
4.https://www.britannica.com/event/Lucknow-Pact



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