घुंघरू एक ‘घन वाद्य’

लखनऊ

 28-07-2018 01:20 PM
ध्वनि 1- स्पन्दन से ध्वनि

विश्‍व स्तर पर भारतीय पारंपरिक नृत्‍यों का प्रमुख स्‍थान है। भारतीय इतिहास में भिन्‍न भिन्‍न नृत्‍यों की महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है। भारतीय नृत्‍य कला के इतिहास में जितने प्रमाण मिले हैं उनमें प्रमुख हैं भतरनाट्यम, कथक, कुच्‍चीपुड़ी तथा कथकली आदि। इनमें से कथक उत्तर प्रदेश में महत्वपूर्ण शास्त्रीय नृत्य है।

कथक का नृत्‍य घुंघरु‍ओं को पैरों में बांधकर तालबद्ध पैरों की हरकत तथा गोलाकार घूमने के द्वारा पहचाना जाता है। लखनऊ का कथक के रूप में शास्त्रीय नृत्य के साथ एक गहरा संबंध है।

नृत्‍य कला का गहरा संबंध हमेशा से वाद्य यंत्रों से रहा है। बिना इनके कोई भी नृत्‍यकार अपना नृत्‍य पूरा नहीं कर सकता है, क्योकि वाद्य यंत्र नर्तकों के पैरों की हरकत, हाथ की मुद्राओं एवं शरीर के हाव भाव के अनुसार ध्वनि उत्‍पन्‍न करते हैं। 200 ईसा पूर्व से 200 ईसवीं तक के समय में भरतमुनी द्वारा संकलित नाट्यशास्त्र  में संगीत वाद्ययंत्रों को ध्वनि के उत्पादन के आधार पर चार मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है: तत् वाद्य अथवा तार वाद्य, सुषिर वाद्य अथवा वायु वाद्य (हवा के वाद्य), अवनद्व वाद्य या चमड़े के वाद्य (तबला वाद्य), घन वाद्य या आघात वाद्य (ठोस वाद्य, जिन्‍हें समस्‍वर स्‍तर में करने की आवश्‍यकता नहीं होती)।

घन वाद्य के अंतर्गत आने वाले घुँघरू पारंपरिक, यानी शास्त्रीय नृत्य का एक आवश्यक घटक है, ये मुख्य रूप से लयबद्ध होते हैं तथा इसमें विशेष ट्यूनिंग (tuning) की आवश्यकता नहीं होती है। घुंघरू पहनने का उद्देश्य पैरों की हरकत के अनुसार ध्वनि को उत्‍पन्‍न करना था। घुंघरू की एक स्ट्रिंग (string) में 50 घंटी से 200 घंटी तक एक साथ गठित हो सकती है। घंटी और अतिरिक्त तारों के बढ़ते सेट के साथ, एक नर्तक अपनी तकनीकी क्षमता में आगे बढ़ता है।

घुँघरू, शास्त्रीय नर्तकियों के प्रमुख आभूषण होने के अलावा, उन सभ्यताओं से भी जुड़े थे जो नृत्य करते समय उन्हें पहनते थे। इसलिए, आम महिलाओं द्वारा घुँघरू का उपयोग सामाजिक सीमाओं के कारण बाधित था। समय बीतने के साथ, घुँघरू ने कविता, साहित्य और सिनेमा के माध्यम से अपने अस्तित्व को हासिल किया है, जिसे नर्तकियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले गहने के रूप में चित्रित किया गया है।

संदर्भ:
1. http://ccrtindia.gov.in/musicalinstruments.php
2. https://www.swarganga.org/articles/details.php?id=6
3. https://www.utsavpedia.com/attires/jewelry/evolution-of-ghunghru-to-payal-to-thin-anklets/
4. गांगुली, प.स. (सम्पादक). 2008. एनसाईंक्लोपपीडिक डिक्शनरी ऑफ वर्ल्ड म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट्स, ग्लोबल विशन पब्लिशिंग हाउस



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