लखनऊ और टोपियों का है पुराना नाता

लखनऊ

 02-08-2018 05:29 PM
स्पर्शः रचना व कपड़े

लखनऊ की बात हो और चिकनकारी का ज़िक्र न हो ऐसा तो हो ही नहीं सकता। चिकनकारी के सदाबहार आकर्षण का 200 वर्षों पुराना मूल आखिर लखनऊ और यहाँ के नवाबों से ही जुड़ा है। तब से अब तक इसमें काफी बेहतरीन बदलाव भी आये हैं जिससे इसकी महत्ता और लोकप्रियता और भी बढती जा रही है। असल चिकनकारी में एक मलमल के कपड़े पर सफ़ेद धागे से कलाकारी की जाती है। जहाँ चिकनकारी साड़ी, सलवार, कुर्ते, शेरवानी आदि की शोभा वर्षों से बढ़ाती आ रही है, वहीं एक और वस्त्र है जिसपर इसने अपने रंग बिखेरे हैं। ये हैं टोपियाँ।

किसी भी स्थान की टोपी उस स्थान के निवासियों व उनकी विचारधारा का प्रतीक बन जाती हैं। और यह बात लखनऊ के मामले में भी सिद्ध होती दिखाई देती है। जहाँ एक टोपी एक व्यक्ति के पहनावे के तरीके को दर्शाती है, वहीँ दुसरे व्यक्ति के लिए वह उसकी धार्मिक श्रद्धा से जुड़ी होती है। इस्लाम में माना जाता है कि ईश्वर की आराधना के समय सर ढका होना चाहिए और इस कारण इनसे लोगों का एक रिश्ता सा बन गया है। 19वीं सदी में नवाबी संस्कृति में भी टोपियों को ख़ास महत्त्व दिया जाता था। साथ ही त्यौहारों, उत्सवों आदि पर भी ये टोपियाँ, पहनने वाले को एक धार्मिक और परंपरागत आभा प्रदान करती हैं।

अवध के दूसरे शासक नासिर-उद-दीन हैदर के समय उनके द्वारा एक अनोखी पांच कोणों वाली टोपी धारण की जाती थी। कहते हैं कि टोपी के पांच कोने नबी के परिवार के पांच सदस्यों के प्रतीक थे। यह टोपी सिर्फ बादशाह द्वारा ही पहनी जा सकती थी। बाद में यह टोपी लखनऊ में काफी लोकप्रिय हुई और इसके काफी विकसित रूप दिखने लगे जिनमें से एक पर चिकनकारी का कार्य भी किया गया था। इस पांच कोण वाली टोपी से पहले चार कोण वाली टोपी इस्तेमाल में थी जिसे चौ गोशिया टोपी के नाम से जाना जाता था।

इन सभी टोपियों के अलावा एक और टोपी लखनऊ में काफी लोकप्रिय हुई जो असल में दिल्ली के एक राजकुमार द्वारा यहाँ लायी गयी थी। यह टोपी थी, दुपल्ली टोपी। यह टोपी कपड़े के दो टुकड़ों से बनी होती है और वज़न में काफी हलकी होती है। समय के साथ इस टोपी के भी कुछ नए प्रारूप सामने आये जिससे निकली नुक्का टोपी, जो आगे और पीछे से नुकीली होती है। इस पर सोने और चांदी के तार से सुन्दर चिकनकारी भी की जाती है।

इन सभी बातों से यह कहा जा सकता है कि लखनऊ में काफी पहले से वेशभूषा पर आधारित श्रृंगार होता आ रहा है। साथ ही यह भी काफी सराहनीय है कि समय के साथ लखनऊ के निवासियों ने अपनी पारंपरिक वेशभूषा को ना भुलाते हुए उसे आज भी ज़िन्दा रखा है और इसी कारण आज लखनऊ पारंपरिक चिकनकारी कला का इतना बड़ा गढ़ है।

संदर्भ:
1. http://lucknowobserver.com/dopalli-topi/
2. http://www.lucknow.org.uk/chikan.html



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