भारतीयों के साथ किया गया नस्लवाद छपा था पोस्टकार्ड में

लखनऊ

 16-10-2018 02:15 PM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

तस्‍वीरें बिना कुछ कहे बहुत कुछ बयां कर देती हैं। ऐसा ही कुछ नज़ारा देखने को मिला लंदन के SOAS विश्‍व विद्यालय में लगी एक प्रदर्शनी में जिसमें 1900-1930 के दौरान भारत से यूरोप भेजे गये 300 पोस्‍ट कार्डों को प्रदर्शित किया गया। इन पोस्‍टकार्डों में तत्‍कालीन समाज के प्रत्‍येक वर्ग की तस्‍वीरों को दर्शाया गया था। इन पोस्‍टकार्डों को हम 19वीं सदी के भारत का इंस्‍टाग्राम (Instagram) भी कह सकते हैं। औपनिवेशिक काल के दौरान संचार के लिए पोस्‍टकार्ड एकमात्र अच्‍छा विकल्‍प था। कम मूल्‍य का होने के कारण उच्‍च, मध्‍यम और निम्‍न वर्ग तीनों के मध्‍य पोस्टकार्ड समान रूप से लोकप्र‍िय हो गया था। 1902-1910 के बीच 6 अरब पोस्‍टकार्ड मात्र ब्रिटिश डाक द्वारा जारी किये गये थे। इन आंकड़ों से आप इनकी लोकप्रियता का अनुमान लगा सकते हैं।


पोस्‍टकार्ड भेजने के लिये किसी प्रकार के लिफाफे की आवश्‍यकता नहीं होती थी। इन पोस्‍टकार्डों के चित्र प्रारंभिक भारतीयों का जीवन, नस्‍लवाद-रूढ़िवाद, शहरीकरण, धर्म और ब्रिटिश शासन के दौरान दैनिक जीवन आदि पर केंद्रित होते थे। इन चित्रों के माध्‍यम से उस दौरान के प्रत्‍येक वर्ग की जीवन शैली को अत्‍यन्‍त करीब से दर्शाया गया है। मद्रास और बैंगलुरू के क्षेत्र के फोटोग्राफर (Photographer) और स्‍टूडियो (Studio) यूरोप में तक प्रसिद्ध थे, इस कारण अधिकांश पोस्‍टकार्ड इसी क्षेत्र से पारित किये जाते थे। इनमें आप कहीं अंग्रजों के ठाट बाट तो कहीं गरीबों की दयनीय स्थिति को देख सकते हैं। साथ ही उस दौरान की इमारतों और सड़कों के चित्र (बैंगलुरू) लोगों के मध्‍य अत्‍यंत प्रिय थे, इसमें भारतीय और यूरोपियों के मध्‍य अंतर स्‍पष्‍ट झलकता है।


कुछ चित्रों में महिलाओं को जूं निकालते हुए दर्शाया गया है, तो कुछ में एक भारतीय व्‍यक्ति को यूरोपीय को नहलाते (मद्रास) हुए दर्शाया गया है। इन पोस्‍टकार्डों में कुछ लोगों के व्‍यवसाय को भी दर्शाया गया है जैसे-धोबी, घर के मुलाज़िम, फल विक्रेता (मद्रास) आदि। इनके चित्रों में भारतीय अक्‍सर उनके रंग-रूप, धर्म, रोजगार आदि से जाने जाते थे। इन तस्‍वीरों में प्रदर्शित नस्‍लवाद विवाद का कारण बना। पोस्‍ट कार्ड में कुछ तस्‍वीरें ऐसी भी थीं जिसमें भारतीय और उनके ‘मास्टर’ (यूरोपियों) के बीच के सम्बन्ध पर व्यंग्य किया गया था।


इन पोस्‍टकार्डों के माध्‍यम से ब्रिटिश, भारत में अपनी और भारतीयों की स्थिति को विश्‍व के सामने रखना चाहते थे। भारत की देवांगना कुमार (लोकसभा अध्‍यक्ष मीरा कुमार की बेटी) द्वारा औपनिवेशिक काल के दौरान की कुछ तस्‍वीरों की प्रदर्शिनी लगायी गयी, जिसमें भारतीय माली, दूध वाले, बावर्ची, घर की कामकाजी महिलाओं आदि की तस्‍वीरें हैं। इनकी वेशभूषा यूरोपियों की इनके प्रति मानसिकता को स्‍पष्‍ट झलकाती है। इनके संग्रह में औपनिवेशिक समाज के इस वर्ग के प्रति सहानुभूति दर्शायी गयी है।

संदर्भ:
1.https://www.bbc.com/news/amp/world-asia-india-45506092?__twitter_impression=true
2.https://qz.com/india/1384146/postcards-were-the-instagram-of-colonial-india/
3.http://www.rediff.com/getahead/slide-show/slide-show-1-specials-vintage-pics-the-servants-of-the-british-raj/20121111.htm
4.https://www.thehindu.com/features/friday-review/art/the-picture-is-the-message/article5189785.ece
5.https://www.thehindu.com/features/friday-review/art/altering-the-gaze/article3811736.ece



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