हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक, ऐशबाग़ की रामलीला

लखनऊ

 06-11-2018 10:19 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

उत्तर भारत में रामलीलाओं का मंचन हर साल होता है जिसमें कलाकार रामायण के विभन्न पात्रों के सहारे पूरी रामायण को लोगों के सामने प्रस्तुत करते हैं। रामलीला की रूपरेखा वैसे तो तुलसीदास के द्वारा रखी गयी थी लेकिन अलग-अलग समय पर लोगों ने उसे जीवित रखने का काम किया है। लखनऊ के ऐशबाग़ में हर साल होने वाली रामलीला देश में आयोजित होने वाली रामलीलाओं में सबसे पुरानी है। ऊपर दिया गया वीडियो सन 2016 में ऐशबाग़ में आयोजित रामलीला का है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री की उपस्थिति भी देखने को मिली थी।

इसका इतिहास लगभग 500 साल पुराना है। यहाँ की रामलीला कमेटी (Committee) का गठन 1860 में किया गया था जो तब से अब तक लगातार हर साल रामलीला का आयोजन करते आ रही है। यहाँ की रामलीला में 250 से ज्यादा कलाकार अभिनय करते हैं, जिसमें देश के दूसरे शहरों से 60 नामी कलाकार अभिनय करने आते हैं।

लखनऊ में रामलीला मुग़ल काल में काफी फली-फूली थी। अवध के तीसरे नवाब मुहम्मद अली शाह ने रामलीला के प्रचार और इसके संरक्षण में काफी अहम भूमिका निभाई। ऐशबाग़ में रामलीला की शुरुआत मोहम्मद अली शाह के आने पर ही हुई थी। मोहम्मद अली शाह एक कला प्रेमी और रंगमंच में काफी सक्रिय रूचि रखने वाले नवाब थे। एक बार किसी कारण ऐशबाग़ में रामलीला के मंचन में आर्थिक परेशानी विघ्न डालने लगी। उस वक़्त अवध के तीसरे बादशाह (1833-42) मौलाना मोहम्मद अली शाह ने शाही खजाने से रामलीला के लिए मदद भेजी थी। उनके हाथ का लिखा हुआ इस शाही मदद का पर्चा लखनऊ के बिरहाना मोहल्ले में एक ब्राह्मण के पास बाद में मिला भी था।

यह मुस्लिम शासक हिन्दू-मुस्लिम एकता के काफी प्रयत्न करते थे। अवध के आखरी नवाब वाजिद अली शाह रामलीलाओं में अपनी सक्रिय भूमिका दिखाने के लिये पाठ भी किया करते थे। वाजिद अली शाह अपने जीवित रहने तक हर साल रामलीला में भगवान श्री कृष्ण की भूमिका में नज़र आते थे। इनका हिन्दू त्यौहारों से इतना गहरा लगाव था कि प्रत्येक नवाब हर हिन्दू त्यौहार में शामिल हुआ करते थे। दीवाली के वक़्त नवाब वाजिद अली शाह सभी प्रमुख स्थानों को दीयों की रोशनी से जगमगा देते थे। लखनऊ के ऐशबाग़ को रामलीला की दी गयी भेंट न केवल हिंदू-मुस्लिम एकता का नायाब उदाहरण है, इसके साथ ही यह कला प्रेमियों को दी गयी एक अनमोल और सर्वोच्च भेंट भी है जो आने वाले कई सालों तक जिंदा रहेगी।

कहा जाता है कि हिन्दू उन्हें इतना प्रेम करते थे कि जब नवाब वाजिद अली शाह की गद्दी छिन गयी तो एक अफवाह उड़ी कि उन्हें निर्वासित कर लन्दन भेजा जा रहा है। यह सुनकर हज़ारो हिन्दुओं की आँखों में आंसू भर आये थे एवं हाथ दुआ के लिए उठे थे। तब उन्होंने इश्वर को संबोधित करते हुए एक पुकार लगायी थी:

हज़रात जाते हैं लन्दन,
कृपा करो रघुनंदन।।

संदर्भ:
1.https://goo.gl/ojgnXP
2.https://www.patrika.com/lucknow-news/aishbagh-ramleela-history-3586188/



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