कैसे दिखता है हर मनुष्य एक दूसरे से भिन्न?

लखनऊ

 27-11-2018 01:26 PM
डीएनए

क्या आपने कभी सोचा है कि आपका रंग-रूप और आपके शरीर की बनावट ऐसी क्यों है? आप दूसरों से कैसे अलग दिखते हैं? आपकी आँखों, बालों और त्वचा का रंग, आपकी कद-काठी किसके द्वारा तय होती है? दशकों तक इन सवालों के जवाब पर रहस्य का परदा पड़ा था। सभी जीव वैज्ञानिक हैरान थे कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी कैसे माँ-बाप के गुण बच्चों में आते हैं। जीव-विज्ञानिकों ने कई दशकों तक इसका अध्ययन किया, कई प्रयोग भी किये गये और अंततः उन्होंने देखा कि हैरतअंगेज़ अणु डी.एन.ए. में ढेर सारे निर्देश होते हैं जो हमारे रंग-रूप, शरीर की बनावट आदि को निर्देशित करता है।

शुरूआत में मेण्डल ने 1865 में अनुवांशिकता का सिद्धांत तो दिया परंतु वे ये नहीं बता पाए कि ऐसा क्यों होता है। इसके पश्चात सटन और बोवेरी ने 1903 में वंशागति के गुणसूत्री सिद्धांत को दिया, जिसके आनुसार जीन के माध्यम से हमारे लक्षणों का निर्धारण होता है। लेकिन इस बात का पता नहीं चला कि जीन किस पदार्थ अथवा रसायन के बने होते हैं। इसके बाद जोहन फ्रेडरिक मिशर ने न्यूक्लीक अम्ल (nucleic acid) यानी कि नाभिकीय अम्ल की खोज की। नाभिकीय अम्ल प्राणियों में सदा ही उपस्थित होता है, क्योंकि यह सभी कोशिकाओं के केंद्रक में पाया जाता है। उन्होंने यह देखा की इस रासायनिक पदार्थ में फॉस्फोरस (Phosphorous) की मात्रा अधिक थी और सल्फर (Sulphur) की मात्रा बिल्कुल नहीं थी। जबकि प्रोटीन में सल्फर होता है किंतु फॉस्फोरस नहीं। अतः वे समझ गये कि ये प्रोटीन नहीं हो सकता। कुछ समय बाद कौसेल ने न्यूक्लीक अम्ल के रासायनिक घटकों का पता लगाया। इसके तत्पश्चात यह भी पता चला कि न्यूक्लीक अम्ल दो प्रकार के होते है- डीऑक्सीराइबो न्यूक्लिक अम्ल (DNA) और राइबो न्यूक्लिक अम्ल (RNA)। कुछ समय तक तो स्पष्ट नहीं था कि अनुवांशिक पदार्थ प्रोटीन है या DNA, परंतु अब प्रयोगों द्वारा सिद्ध हो गया है कि DNA ही अनुवांशिक पदार्थ है।

उसके बाद एम. एच. एफ. विल्किंस तथा रोज़ालिंड फ्रेंकलिन ने 1951-1953 में DNA के X-रे क्रिस्टलोग्राफी विधि के माधयम से DNA की संरचना का पता लगाया। इसके बाद 1953 में विल्किंस, फ्रांसिस क्रिक और जेम्स वाटसन द्वारा DNA की संरचना का त्रिविम मॉडल प्रस्तुत किया गया, इस खोज में उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए इन्हें 1962 में फिज़ियोलॉजी या चिकित्सा में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने बताया कि:

1. DNA अणु दो पॉलीन्यूक्लियोटाइड (Polynucleotide) श्रृंखलाओं का बना होता है जो कि एक अक्ष के चारों ओर सर्पिलाकार क्रम में दक्षिणावर्त कुण्डलित होती है।

2. दोनों पॉलीन्यूक्लिओटाइड श्रृंखलाएं विपरित दिशा में किण्डलित होती हैं अर्थात यदि एक श्रृंखला में शर्करा के कार्बन 5'⟶3' दिशा में है तो दूसरी उसके विपरित 3'⟶5' में होगी।

3. न्यूक्लियोटाइड DNA की बुनियादी संरचनात्मक इकाई होती है। प्रत्येक न्यूक्लियोटाइड शर्करा अणु (डीओक्सीराइबोस/Deoxyribose), नाइट्रोजिनस बेस (Nitrogenous Base) और फॉस्फेट ग्रुप (Phosphate group) से बने होते हैं।

4. नाइट्रोजन बेस दो प्रकार के वर्ग में बंटे होते हैं जिन्हें प्यूरिन (Purines) (दो-रिंग वाली संरचना) और पिरिमिडिन (Pyrimidines) (एक-रिंग वाली संरचना) कहते हैं। प्यूरिन के अंतर्गत एडेनीन (Adenine) तथा ग्वानीन (Guanine) नाइट्रोजन बेस आते हैं और पिरिमिडिन के अंतर्गत थाइमीन (Thymine) तथा सायटोसीन (Cytosine) नाइट्रोजन बेस आते हैं। DNA में एक श्रृंखला के प्यूरिन बेस दूसरी श्रृंखला के पिरिमिडिन बेस से जुड़े होते हैं। अर्थात एडेनीन दूसरी श्रृंखला के थाइमीन से जुड़ा होता है और सायटोसीन ग्वानीन से।

5. DNA में प्यूरिन और पिरिमिडिन दोनों की संख्या बराबर होती है।

हमारे शरीर में DNA की संख्या करोड़ों के आस पास होती है, तथा इसमें अपनी प्रतिकृति बनाने की क्षमता होती है। DNA प्रतिकृति से ही DNA अपने गुण एक कोशिका से संतति कोशिका में कोशिका विभाजन के समय स्थानांतरित कर देता है और किसी जाति विशेष के गुणों को बनाए रखता है। ज्यादातर DNA प्रतिकृतिकरण तीन प्रकार का होता है: परिक्षेपी, संरक्षी और अर्द्ध संरक्षी। अब प्रश्न ये उठता है कि वास्तव में DNA की प्रतिकृति तीनों में से किस विधि द्वारा होती है। इस बात की पुष्टि के लिये मैथ्यू मेसेल्सन और फ्रैंक्लिन स्टॉल ने ईस्केराइकिया कोलाइ (E. coli) नामक जीवाणु में DNA द्वीगुणन के प्रयोगों से की कि DNA में अर्द्ध संरक्षी प्रतिकृतिकरण होता है।

DNA प्रतिकृति की क्रिया डीएनए के कुछ विशिष्ट स्थानों से शुरू होती है जिनको आरंभन स्थल कहते हैं। डीएनए के दोनों पृथक रज्जुक Y आकार की संरचना बनाते है। जिसे प्रतिकृति द्विशाखा (Replication Fork) कहते हैं। ये दोनों रज्जुक नए सतत रज्जुकों के लिये टेम्पलेट (Template) की भांति कार्य करते हैं। अंत में दोनों नए सतत रज्जुक नाइट्रोजन बेस पुराने रज्जुकों के पूरक नाइट्रोजन बेस के साथ जुड़ जाते हैं और एक नया DNA बनाते हैं। इस पूरी प्रक्रिया में विभिन्न एंज़ाइम अपनी-अपनी विशेष भूमिका निभाते हैं। पुराने डीएनए रज्जुक पर नये रज्जुक का निर्माण डीएनए पालीमरेज एंज़ाइम द्वारा किया जाता है।

संदर्भ:
1.
https://science.howstuffworks.com/life/cellular-microscopic/dna1.htm
2.https://www.khanacademy.org/science/high-school-biology/hs-molecular-genetics/hs-discovery-and-structure-of-dna/a/hs-dna-structure-and-replication-review
3.https://www.sciencehistory.org/historical-profile/james-watson-francis-crick-maurice-wilkins-and-rosalind-franklin
4.https://goo.gl/ovu9EY



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