लखनऊ का ऐतिहासिक आलम बाग

लखनऊ

 05-12-2018 10:46 AM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन

लखनऊ शहर अपनी खास नज़ाकत और तहज़ीब वाली बहु-सांस्कृतिक खूबी, दशहरी आम के बाग़ों तथा चिकन की कढ़ाई के काम के लिये जाना जाता है, साथ ही इसे नवाबों के शहर के रूप में भी जाना जाता है। लखनऊ में नवाबों के समय कई ऐतिहासिक इमारतें बनाई गईं, जो आज भी अपने इतिहास को बयां करती हैं।

लखनऊ के आदर्श नगर और बरहा कॉलोनी के बीच में स्थित आलमबाग गेट (इसे चन्दर नगर भी कहा जाता है) वर्तमान में काफी बुरी हालत में है, आलमबाग का गेट मौजूदा समय में खंडहर बनता जा रहा है। इसके अलावा यह संरक्षित स्मारक कई दुकानों और सब्जी के स्टॉलों के अतिक्रमण की भेंट चढ़ चुकी है। यहां तक कि इस ऐतिहासिक इमारत में मौजूद नवाबी संस्कृति भी आज नहीं दिखाई देती है।

अवध के आखिरी राजा वाजिद अली शाह का विवाह 1837 में पंद्रह वर्ष की उम्र में आलम आरा बेगम से हुआ था। 1847 में वाजिद अली को अवध के शाह के रूप में स्वीकारा गया, तब आलम आरा बेगम को खास महल के रूप में जाना जाने लगा। वाजिद अली द्वारा आरा बेगम के लिए दो मंजिला महल बनवाया गया और ऐसा भी कहा जाता है कि अफज़ल बेगम (नसीर-उद-दीन हैदर के बेटे फरीदोन बख्त उर्फ मुन्ना जान की मां) भी आलम बाग में रहीं थी। 1856 में ब्रिटिश द्वारा अवध में अवैध कब्जा करने के बाद वाजिद अली को क़ैद कर जब कलकत्ता में मटिया बुर्ज ले जाया जा रहा था तो, अपने तनावपूर्ण संबंधों के बावजूद, एक कर्तव्यनिष्ठ पत्नी के रूप में आरा बेगम भी उनके साथ गईं, जहां उनकी कई दूसरी पत्नियों ने उनके साथ जाने से इनकार कर दिया था। वहीं अंग्रेजों द्वारा उनकी अनुपस्थिति में आलम बाग ज़ब्त कर लिया गया और संपत्ति के बदले मुआवज़ा देने से तक इंकार कर दिया गया। 21 सितम्बर 1887 को अपने पति की मृत्यु के सात साल बाद, आरा बेगम की 31 मार्च, 1894 को मटिया बुर्ज में मृत्यु हो गयी।

आलम बाग के उस समय के स्वरुप का अंदाज़ा हमें एक जर्नल (Journal) से मिल सकता है। यह जर्नल था आर्थर मोफ्फाट लैंग का जो कि ब्रिटिश सेना के साथ नवम्बर 1857 में लखनऊ में थे। आर्थर की 6 नवम्बर को जर्नल में की गयी एंट्री (Entry) बताती है कि, “कल रात जो लोग आलम बाग़ से वापस लौटे वे बताते हैं कि वह 500X470 यार्ड की एक बड़ी भूमि पर बना है जिसके हर कोने पर दो मंज़िले गुम्बददार टावर (Tower) बनाये गए हैं। भूमि के केंद्र में बारादरी का निर्माण किया गया है। चरों ओर की दीवार में बीच में एक विशाल दरवाज़ा है और दीवारें 11 फीट ऊंची तथा 2.5 फीट मोटी बनायी गयी हैं।”

हालांकि यह वर्णन एक सैन्य आक्रमण में इस ईमारत की कुशलता को दर्शाने के लिए लिखा गया था, और इससे आलम बाग़ की खूबसूरती का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। परन्तु ऊपर दिया गया चित्र इसकी खूबसूरती को साफ़ दर्शाता है। दरोगा अब्‍बास अली (सहायक नगरपालिका अधिकारी) द्वारा ली गईं लखनऊ की 50 खूबसूरत तस्‍वीरों में इस आलम बाग़ को भी शामिल किया गया था। यह एल्बम सर जॉर्ज कूपर को समर्पित की गयी थी। इसकी छपाई कलकत्ता में करवाई गयी थी तथा सन 1874 में इसे प्रकाशित किया गया था। ऊपर दिखाया गया चित्र इसी एल्बम से लिया गया है।

इस इमारत में गुंबदाकार शैली का स्वरूप भी देखने को मिलता है। आलम बाग ब्रिटिशों के लिए एक मज़बूत किला था, इसके सहारे ब्रिटिशों ने कई लड़ाइयाँ जीती। वहीं 16 मार्च 1858 में लखनऊ में दोबारा कब्जा करने के लिए, आलमबाग पर लगाया गया सेमाफोर (विज़ुअल टेलीग्राफ सिस्टम/Visual Telegraph System) काफी सहायक सिद्ध हुआ। आलम बाग के भीतर, मेजर जनरल हैवेलॉक (जिनकी 24 नवंबर 1857 को खसरा से मृत्यु हो गयी) का एक स्मारक भी मौजूद है।

सन्दर्भ:
1.अंग्रेज़ी पुस्तक: Anwer Abbas, Saiyed. Incredible Lucknow. 2010



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