रूमी दरवाजे की शैली का अनुसरण करता दारुल उलूम नदवतुल उलेमा

लखनऊ

 21-12-2018 10:00 AM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन

नवाबों के शहर के नाम से मशहूर लखनऊ के हर कोने पर नवाबी शानो-शौकत की छाप देखी जा सकती है। वहीं लखनऊ शहर के ट्रेडमार्क (Trademark) के रूप में जाना जाने वाले रूमी (रुमी का मतलब रोमन है) दरवाज़े से तो हम सभी वाकिफ हैं। रूमी दरवाज़े को तुर्की द्वार के नाम से भी जाना जाता है। इस 60 फुट ऊंचे दरवाज़े को सन 1784 में नवाब असफ-उद-दौला के द्वारा बनवाया गया था। ऐसा माना जाता है कि इस दरवाज़े को रूमी दरवाज़ा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसे इस्तांबुल के प्रवेश द्वार जैसा बनाया गया था। इसका फारसी कवि रुमी के साथ कोई संबंध नहीं है, बस ये सच है कि दोनों के नाम अंततः ‘रोम’ (Rome) से निकलते हैं।

वहीं लखनऊ में निर्माणाधीन दारुल उलूम नदवतुल उलेमा की इमारत एक विशिष्ट वास्तुकला की शैली की निरंतरता को दर्शाता है। जैसा कि आप चित्रों में देख सकते हैं, इसका मुख्य प्रवेश द्वार रुमी दरवाज़े की शैली का अनुसरण करता है। जबकि उसके बरामदे के मेहराब में अवध के सम्राट के समय की इमारतों में देखे गए बरामदे से समानता दिखाई देती है। साथ ही इमारत की मुख्य विशेषता एक बड़ा गुंबददार हॉल (Hall), 73' 0" x 40' 0” है, जो चारों ओर से बरामदे से घिरा हुआ है। एकल मंजिल की इस इमारत के हर कोने पर चार अष्टकोणीय टावर भी हैं।

सन 1913 की एक किताब ‘रिपोर्ट ऑन मॉडर्न इंडियन आर्किटेक्चर’ (Report on Modern Indian Architecture) में इस ईमारत के बारे में लिखा गया है, “इसके नवीकरण में अब तक 65,000 रुपये की लागत हो चुकी है, जिसमें से 50,000 रुपये भावलपुर की बेगम द्वारा दिए गए हैं। साथ ही इसके डिज़ाइन खान बहादुर सैय्यद जाफर हुसैन (प्रबंधक, टैंक्स डिवीज़न, झाँसी) द्वारा दिए गये थे। जबकि निर्माण कार्य मुंशी मुहम्मद एहतेशन अली की देखरेख में है, जो इस भवन के सचिव भी हैं।

1893 में कानपुर के मदरसा फैज़-ए-आम में हुए पहले दीक्षांत समारोह के अवसर पर वहाँ मौजूद विद्वानों ने शिक्षण संस्थान बनाने का विचार प्रकट किया। इस संगठन का नाम नदवतुल-उलेमा रखा गया। नदवा का मतलब सभा और समूह है, इस संस्था का नाम नदवा इसलिए रखा गया क्योंकि इसे कानपुर में भारत के महान इस्लामी विद्वानों के एक समूह ने गठित किया था। इस विचार से नदवतुल उलेमा की दारुल उलूम, एक शैक्षणिक निकाय की स्थापना की गयी।

फिर उसके पांच साल बाद 1898 में दारुल उलूम नदवतुल उलेमा को कानपुर से लखनऊ में स्थानान्तरित किया गया तथा इसके पाठ्यक्रम को आधुनिक विज्ञान, व्यावसायिक प्रशिक्षण आदि तक विस्तारित कर दिया गया। यह दुनिया भर से बड़ी संख्या में मुस्लिम छात्रों को आकर्षित करता है। नदवतुल उलेमा हनाफी (मुख्य समूह), शफी और अह्ल अल-हदीथ समेत विद्वानों और छात्रों, दोनों की विविध श्रेणी को प्रोत्साहन देता है।

संदर्भ:
1.https://en.wikipedia.org/wiki/Rumi_Darwaza
2.https://en.wikipedia.org/wiki/Darul_Uloom_Nadwatul_Ulama
3.http://www.nadwatululama.org/



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