जीवन की प्रणाली “दंड और पुरस्कार”

लखनऊ

 16-02-2019 11:31 AM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

“ज़्यादा लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं” ये कहावत एक समय में लोकप्रिय हुआ करती थी। लेकिन क्या वास्तव में बच्चों को मारकर सही गलत के अंतर के बारे में बताया जा सकता है? एक बच्चे को अच्छे आचरण में रहने के लिए मजबूर करना उसके मन में आक्रोश को उत्पन्न करता है और यह आक्रोश उसके वयस्कता में पूर्ण रूप से अभिव्यक्त होता है।

वास्तव में बच्चों के गुस्से और नखरे, खुशामद और चापलूसी या दूसरे के खिलाफ बोलने पर उनकी इच्छाओं को पुर्ण करने से हम उन्हें बिगाड़ते हैं। बच्चों को हमेशा यह शिक्षा देनी चाहिए कि दुनिया में वो अपने मन की नहीं कर सकते हैं। वहीं दूसरी ओर बच्चों को दंडित कर के समझाना कोई अच्छा विकल्प नहीं है, इससे बच्चे की प्रकृति के सबसे सुंदर पहलू “विश्वास की गुणवत्ता” में भी गहरा असर पड़ता है। दंडित करना बच्चों की हर इच्छा को पूर्ण करने से भी बदतर होता है। बच्चे के जीवन में विश्वास की कमी से उसे चिड़चिड़ेपन से गुजरना पड़ सकता है। अनुशासन-बद्ध रहने के लिए दंडित कर के बड़े किए गए बच्चों की तुलना में प्रेम और भरोसे के साथ बड़े किए गए बच्चे अपने जीवन में आयी असफलताओं से डगमगाते नहीं हैं। वैसे प्रकृति का एक तथ्य है कि दंड और पुरस्कार से ही प्राणी सीखता है। वैसे जितना संभव हो प्रकृति को स्वयं ही शिक्षित करने की अनुमति दी जाए। प्रकृति में चीजें इतनी व्यवस्थित होती हैं कि हम जल्द ही अपने अस्तित्व और कल्याण के लिए आवश्यक चीजों के बारे में सीखने लगते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप एक गर्म चूल्हे को छूते हैं, तो उससे आपकी उंगलियाँ जलने लगती हैं। मानव त्वचा तीव्र ऊष्मा नहीं सह सकती है और इस बात को जानने के लिए हमें इस से ज्यादा किसी अतिरिक्त शिक्षा की आवश्यकता नहीं होती है।

वहीं हमारे जीवन के अनगिनत पड़ावों में हम इतना तो जान जाते हैं कि प्राकृतिक नियमों का पालन करने से हम समृद्ध होते हैं और इनका उल्लंघन करने से नुकसान भी हमारा ही होता है। वयस्कों को बच्चों को जागरूक करने के लिए उनकी आवश्यकताओं के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। जैसे आप बच्चे को आदेश देते हैं कि “गर्म चुल्हे को मत छुना”, इससे आप प्रकृति के नियमों का उल्लंघन कर रहें हैं। क्योंकि परिपक्वता आज्ञा से प्राप्त नहीं की जा सकती वरन ये क्रमिक विकास के साथ विकसित होती है। इसलिए बच्चों को किसी चीज के बारे में संपूर्ण ज्ञान दिए बिना उन्हें कोई अधूरा आदेश ना दें इससे आप अपने बच्चे को किसी व्याकुल स्थिति में छोड़ देते हैं। बच्चे के मन में यह बात गहन कर जाती है कि उसे इतनी तेज चेतावनी क्यों दी गई है? और शायद अगली बार जब आप उसके आसपास ना हो तो वह गर्म चुल्हे को छुने की कोशिश करें और अपना हाथ जला ले।

इससे बच्चा प्राकृतिक रूप से सीख तो जाएगा लेकिन वह हर बार प्रयोगात्मक रूप से चीजों को सीखने का प्रयास करेगा। लेकिन इससे ज्यादा उचित होगा कि आप हर आदेश के बाद बच्चे को उसे ना करने के पीछे का एक तर्कपूर्ण स्पष्टीकरण दें कि गर्म चुल्हे को क्यों नहीं छूना चाहिए। सबसे सरल उदाहरण यह है कि जीवन हमें कई कठिन सबक सिखाता है, जैसे दूसरों को चोट पहुंचाना अच्छा क्यों नहीं है; दूसरों के साथ साझा करना अच्छा क्यों है; क्रोध अक्सर आत्म-पराजय का रास्ता पाने के लिए क्यों होता है; भौतिक लाभ अपने आप में संतोषजनक क्यों नहीं है, आदि। हमारे द्वारा दूसरों को दर्द के माध्यम से सबक सीखाया जाता है, लेकिन कई बुद्धिमान माता-पिता या शिक्षक जानते हैं कि जीवन में केवल वास्तविक अनुभव से सीखा जा सकता है, जो काफी दर्दनाक होते हैं।

“ज़्यादा लाड़ प्यार से बच्चे बिगड़ जाते हैं” यह तथ्य मात्र बच्चों पर ही नहीं वरन वयस्कों पर भी लागू होता है यह स्‍वभाविक रूप से सभी के जीवन का हिस्सा होता है और इस नियम के अभाव में हम कभी परिपक्‍व नहीं हो सकते हैं।

एक बार एक सफल व्यवसायी से उसकी सफलता का रहस्य पूछा गया, तो उसने जवाब दिया कि “मैं अपने अधीन रहने वालों को गलतियाँ करने और उनसे सीखने देता हूँ।” वहीं कितने व्यापारी इसके विपरित करते हैं, वे अपने अधीनस्थ की एक गलती करने पर ही उसे निकाल देते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि अधीनस्थ व्यक्ति लड़खड़ाने से डरता है और अपनी रचनात्मक प्रवृत्ति को पूरी तरह से खो देता है। शिक्षा को जबरदस्ती थोपने की जगह प्रोत्साहित करके देना चाहिए ताकि इससे ज्ञान को विकसित किया जा सकें। बच्चों को प्राकृतिक प्रणाली (दंड और पुरस्कार) के माध्यम से विकसित होने देना चाहिए ना कि उनकों उनकी सभी गलतियों के परिणामों से बचाना चाहिए। साथ ही इन परिणामों को समझने में बच्चों की मदद करनी चाहिए ताकि वे हार मानने की बजाए यह समझ सकें की यह बस जीवन की वास्तविकताएं हैं।

प्रकृति के साथ सहयोग करने का एक उत्कृष्ट तरीका यह है कि बच्चे जो भी अनुभव करते हैं, उसकी ओर उनका ध्यान आकर्षित करें। वहीं जब बच्चें अनुभव को समझ जाएं तो उन्हें यह ना कहें कि “देखा? मैंने तुमसे ऐसा कहा था!” बल्कि बच्चों के इन अनुभवों को उनके इस विचार में ही छोड़ दें कि “मैंने खुद से यह सीखा है।” वहीं कोई भी गलत कार्य सबसे पहले हमें न की भगवान के समक्ष, न ही धरती के कानून के समक्ष और न ही हमारे साथियों के समक्ष दोषी बनाता है यह सर्वप्रथम हमारे स्वयं के आंतरिक मन में ही हमें दोषी बना देता है।

संदर्भ :-
1.  SWAMI KRIYANANDA. 2006. Education For Life. Crystal Clarity Publishers.



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