भारतीय संस्कृति में पादुका का धार्मिक महत्व

लखनऊ

 19-03-2019 07:10 AM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

मेरठ से लगभग 115 किलोमीटर दूर स्थित कर्णवास एक ऐतिहासिक शहर है, जिसका नामकरण महाभारत के नायकों में से एक कर्ण के नाम पर किया गया था। वहीं ऐसा दावा किया जाता है कि गाँव में महाभारत के समय के कई मंदिर भी देखने को मिलते हैं। राजा कर्ण अपनी उदारता के लिए काफी प्रसिद्ध थे, इसलिए उन्हें दानवीर कर्ण के नाम से भी जाना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार महाभारत काल में कर्ण द्वारा हर दिन 50 किग्रा सोना दान किया जाता था।

कुंती को ऋषि दुर्वासा द्वारा एक वरदान दिया गया था कि वह किसी भी देवता से एक बच्चे की माँग कर सकती हैं। अविवाहित कुंती ने शक्ति को परखने के लिए उत्सुकता में भगवान सूर्य को बुलाया और उन्होंने भगवान सूर्य से एक पुत्र की मांग की। भगवान् सूर्य के द्वारा उन्हें पुत्र रूप में कर्ण कवच और एक जोड़ी बालियों में सौंप दिया गया। अविवाहित माँ होने के डर से कुंती द्वारा कर्ण को टोकरी में रखकर नदी में बहा दिया गया। यह टोकरी अधिरथ और उनकी पत्नी राधा को मिली, उन्होंने उसे अपने पुत्र के रूप में स्वीकार कर लिया।

कर्णवास में कर्ण का एक मंदिर अभी भी स्थित है। यहाँ पुण्य सलिल गंगा का विस्तार है और साथ ही दानवीर कर्ण की आराध्या माँ कल्याणी का मंदिर भी है। आस-पास के इलाकों में इस गांव की प्रसिद्धि का कारण ये दो मंदिर हैं। ये मंदिर प्राचीन और महाभारत काल के हैं और यहाँ स्थित माँ कल्याणी की मूर्तियाँ लगभग 3000 वर्ष पुरानी हैं। माँ कल्याणी मंदिर को लगभग 400 वर्ष पूर्व डोडिया खेडा के कबीर शाह द्वारा बनवाया गया था।

आज से लगभग 70 वर्ष पहले हाथरस के सेठ बागला कर्णवास में माँ कल्याणी के दर्शन के लिए आये थे, वे निःसंतान थे अतः उन्होंने माँ से प्रार्थना की कि यदि मेरे घर में संतान हो जाए तो मैं यहां माँ का अच्छा सा मंदिर बनवाऊंगा, वहां से जाने के एक वर्ष के अन्दर उनके यहाँ पुत्र का जन्म हुआ इसी उपलक्ष्य में उन्होंने कल्याणी देवी के वर्तमान मंदिर का निर्माण करवाया था।

ऐसा कहा जाता है कि नवीन मंदिर के निर्माण हेतु नींव की खुदाई करते समय काफी गहराई से 3 प्राचीन प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई थी इन मूर्तियों को वहाँ के ब्रह्मणों द्वारा तत्कालीन पुरातत्व संग्रहालय में जांच हेतु भेजा गया, जहाँ इन्हें तीन हजार वर्ष प्राचीन प्रमाणित किया गया था। वैसे तो यहाँ वर्षभर श्रद्धालु आते रहते हैं, किंतु यहाँ विशेषरूप से आश्विन, चेत्र की नवरात्रियो एवं आषाढ़ शुक्ल पक्ष में श्रद्धालुओं की काफी भीड़ रहती है।

साथ ही तपस्थली भूमि एवं पौराणिक तीर्थ होने के नाते कर्णवास में प्राचीन काल से ही अनेक मंदिर एवं पूजा स्थल रहे हैं। कई तो काल के प्रभाव के कारण नष्ट हो चूकें हैं। कर्णवास के अन्य प्रमूख मंदिर निम्न हैं: ललिता माँ का मंदिर, चामुंडा मंदिर, कर्णशिला मंदिर, भैरो मंदिर, भूतेश्वर महादेव मंदिर, बड़े हनुमानजी का मंदिर, नर्मदेश्वर महादेव मंदिर, पंचायती मंदिर, शिवालय, मल्लाहों का मंदिर, शिव मंदिर, महादेव मंदिर और आदि।

संदर्भ :-

1. https://bit.ly/2Y2H5rN
2. http://karanwas.blogspot.com/2013/04/kalyani-devi-mandir-karanwas.html
3. https://hindi.nativeplanet.com/bulandshahr/attractions/karnavas/#overview
4. https://www.govserv.org/IN/Bulandshahr/188014737909278/Karanwas


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