जब भगत सिंह को लाहौर से लखनऊ भगा कर लाई थी एक वीर महिला

लखनऊ

 23-03-2019 07:00 AM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

भारत को यह स्‍वर्णिम स्‍वतंत्रता दिलाने में हमारे अनेक साहसी क्रांतिकारियों का विशेष योगदान रहा। इन्‍होंने स्‍वतंत्रता पाने के लिए अपना संपूर्ण जीवन देश को समर्पित कर दिया। जिनमें से कईयों के नाम आज भी स्‍वर्ण अक्षरों में भारत के इतिहास में अंकित हैं जैसे- भगत सिंह, चन्‍द्रशेखर आजाद, राजगुरू, सुखदेव, भगवती चरण, सुभाष चन्‍द्र बोस, सरदार वल्‍लभ भाई पटेल इत्‍यादि। किंतु कुछ वीर महिला क्रांतिकारी भी थी स्‍वतंत्रता की लड़ाई में जिनके योगदान को आज भूला दिया गया है। एक ऐसी ही बहादुर महिला क्रांतिकारी थी दुर्गा देवी जिन्‍होंने अपनी बुद्ध‍िमत्‍ता से एक बार भगत सिंह और राजगुरू की अंग्रेजों से जान बचाई थी। साथ ही यह कई बार अंग्रेजों से अकेले ही भीड़ गयीं। चन्‍द्रशेखर भी दुर्गा देवी से काफी प्रभावित थे।

दुर्गा देवी का जन्‍म (इलाहबाद) गुजराती परिवार में हुआ था ये अपने माता पिता की इकलौती संतान थीं, इनकी माता के निधन के बाद इनका पालन पोषण इनकी मौसी ने किया तथा पिता ने सन्‍यास ग्रहण कर लिया था। 11 वर्ष की छोटी आयु में, इनका विवाह एक समृद्ध गुजराती परिवार के भगवती चरण वोहरा के साथ हुआ, जो लाहौर में रहते थे। भगवती चरण स्‍वयं एक क्रांतिकारी थे और इनके पिता को रेलवे में अंग्रेजों द्वारा राय की उपाधि दी गयी थी। दुर्गा देवी पहली बार अपने पति के माध्‍यम से क्रांतिकारियों के संपर्क में आयीं। औपनिवेशिक शासन काल के दौरान हो रहे अत्‍याचारों से ये दोनों ही भलि भांति अवगत थे। 1920 के बाद भगवती चरण व्‍यापक सत्‍याग्रह में शामिल हो गये। लाहौर के नेशनल कॉलेज में एक छात्र के रूप में, उन्होंने भगत सिंह, सुखदेव और यशपाल के साथ एक अध्ययन प्रारंभ किया, जिसमें इन्‍होंने दुनिया भर में हो रहे क्रांतिकारी आंदोलनों की छानबीन की। भगत सिंह, सुखदेव और यशपाल का इनके परिवार में आना जाना लगा रहा। कुछ समय बाद इस समूह ने नौजवान भारत सभा की स्थापना की जिसका उद्देश्‍य युवाओं को स्वतंत्रता संग्राम में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित करना और सांप्रदायिकता और अस्पृश्यता जैसी सामाजिक बुराइयों को समाप्त करना था।

इसी दौरान दुर्गा देवी लाहौर के एक गर्ल्स कॉलेज में एक शिक्षिका के रूप में कार्य कर रही थी। राष्ट्रीय स्वतंत्रता के कारण से, वह हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (Hindustan Socialist Republican Association), एक संगठन में शामिल हो गई, जिसका उद्देश्य भारत को ब्रिटिश शासन की बेड़ियों से मुक्त करना था। भगवती सिंह और दुर्गा देवी दोनों ही पारिवारिक रूप से काफी समृद्ध थे तथा इन्‍होंने अपनी पूंजी का अधिकांश हिस्‍सा क्रांतिकारी गतिविधियों में लगा दिया। 1928 में ब्रिटिश सरकार द्वारा एचएसआरए के विरूद्ध क्रूरतापूर्वक दमनकारी अभियान चलाया, जिसने दुर्गा देवी और उनके पति को एक गुप्‍त संगठन के रूप में कार्य करने के लिए विवश कर दिया। किंतु इन्‍होंने अपनी क्रांतिकारी गतिविधियों पर विराम नहीं लगाया। 1928 के दिसंबर की शुरुआत में, भगवती चरण भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की वार्षिक बैठक में भाग लेने के लिए कोलकाता के लिए रवाना हुए तथा आपात स्थिति के लिए अपनी कुछ पूंजी दुर्गा देवी को सौंप गये।

कुछ दिनों बाद, 19 दिसंबर, 1928 को, भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु ने सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन सॉन्डर्स की हत्या कर दी, यह ब्रिटिश पुलिस अधिकारी क्रूर लाठीचार्ज के लिए जिम्मेदार थे, जिसके कारण लाला लाजपत राय जी की मृत्यु हो गई थी। इस घटना को अंजाम देने के बाद यह तीनों सहायता के लिए दुर्गा भाभी के पास पहुंचे, दुर्गा देवी तुरंत उनकी सहायता के लिए तैयार हो गयी। इन्‍होंने पति द्वारा दी गयी पूंजी को इन्‍हें सौंप दिया तथा तत्‍कालीन समाज की मानसिकता की परवाह किये बिना भगत सिंह को लाहौर से भगाने के लिए उनकी पत्‍नी के रूप में अपने तीन साल के बच्‍चे को लेकर लखनऊ के लिए ट्रेन पकड़ ली। अपनी पहचान छिपाने के लिए, उन्होंने अपने बाल छोटे कटवा लिए और पश्चिमी पोशाक पहन ली। इस प्रकार इन्‍होंने अपने साहसी कदम से भगत सिंह और राजगुरू को लाहौर से बाहर पहुंचाया। चंद्रशेखर आज़ाद भी सुखदेव की माँ और बहन की संगती में एक साधु के रूप में महिलाओं को तीर्थ यात्रा पर ले जाते हुए लाहौर से भाग गए। लखनऊ पहुंचने पर, भगत सिंह ने तुरंत भगवती चरण को एक टेलीग्राम भेजा, जिसमें बताया गया कि वह 'दुर्गावती' के साथ कलकत्ता आ रहे हैं, जबकि राजगुरु बनारस जा रहे थे। जब वे दोनों कलकत्ता पहुंचे, तो भगवती चरण भगत सिंह और राजगुरु को भागने में अपनी पत्‍नी की भूमिका को देख आश्‍चर्यचकित और बहुत प्रसन्‍न हुए।

कलकत्ता कांग्रेस के कुछ सत्रों में भाग लेने के बाद, दुर्गा देवी अपने बेटे के साथ वापस लाहौर लौट गईं। भगवती चरण ने कलकत्ता में क्रांतिकारियों से बम बनाना सीखा तथा इन्‍होंने भगत सिंह के साथ मिलकर यहीं पर विधान सभा पर हमले की योजना तैयार की। 8 अप्रैल, 1929 को भगत सिंह ने विधान सभा पर बम गिराकर स्‍वयं को पुलिस के हवाले कर दिया। बाद के महीनों में, पुलिस ने क्रांतिकारियों को बंद करना शुरू कर दिया। लाहौर में, जांचकर्ताओं ने कश्मीर हाउस में एचएसआरए की बम फैक्ट्री का पता लगया, जो भगवती चरण के नाम पर किराए पर ली गयी थी, सुखदेव, जय गोपाल और किशोरी लाल को गिरफ्तार कर लिया गया। भगवती चरण छापे के समय साइट पर नहीं थे, वे वहां से छिप गए।

बड़ी मात्रा में एचएसआरए के क्रांतिकारियों के पकड़े जाने के बाद दुर्गा देवी ने स्‍वयं क्रांतिकारी गतिविधियों का नेतृत्‍व किया। इन्‍होंने पंजाब के पूर्व गवर्नर लॉर्ड हैली की हत्या का प्रयास किया, जो क्रांतिकारियों का कट्टर दुश्मन था। हालांकि गवर्नर बच गए, उनका सहयोगी घायल हो गया।

1929 में, भगवती चरण ने यशपाल के साथ वायसराय की ट्रेन में बम विस्फोट किया। बाद में आजाद, यशपाल, वैशम्पायन, सुखदेव राज, सुशीला और दुर्गा देवी के साथ मिलकर भगवती चरण ने भगत सिंह को जेल से मुक्त कराने के लिए योजना बनायी। 28 मई 1930 को रावी के पास वुडलैंड में एक बम के परीक्षण के दौरान भगवती चरण की मृत्यु हो गई। अपने पति की मृत्‍यु के कुछ समय बाद दुर्गा देवी ने जुलाई 1929 में, लाहौर में भगत सिंह की रिहाई के लिए जुलूस का नेतृत्व किया। 1939 में, यह मारिया मॉन्टेसरी (इटली के अग्रणी शिक्षक) से प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए मद्रास गयी। एक साल बाद, उन्होंने लखनऊ में उत्तर भारत का पहला मोंटेसरी स्कूल खोला, जिसमें वंचित परिवारों के पांच छात्र थे।

आजादी के बाद के वर्षों में, दुर्गा देवी ने 15 अक्टूबर, 1999 को 92 वर्ष की आयु में अंतिम सांस लेने से पहले लखनऊ में

गुमनामी के साथ शांत जीवन व्‍यतित किया। दुर्गा देवी का भारत के स्‍वतंत्रता संग्राम में अतुल्‍य योगदान रहा। उन्‍होंने अपनी वीरता और कौशल से न सिर्फ स्‍वतंत्रता सेनानियों का सहयोग किया बल्कि स्‍वतंत्रता संग्राम में अद्वितीय भूमिका भी निभाई।

संदर्भ:

1. https://bit.ly/2OKSozT
2. https://bit.ly/2vGudd8



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