1849 से 1856 तक लखनऊ के रेजिडेंट (Resident) - विलियम हेनरी स्लीमन

लखनऊ

 16-04-2019 04:33 PM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

औपनिवेशिक भारत में एक दौर ऐसा आया जब लोगों का पैदल यात्रा करना दुष्‍कर हो गया। लूटपाट, हत्‍या, ठगी और चोरी का प्रचलन अपने चरम पर पहुंच गया था। ऐसी स्थिति में आगमन हुआ कर्नल स्लीमन (Colonel Sleeman) का, जो ठगों तथा अपराधियों पर कहर बनकर बरसे। स्लीमन 1830 के दशक में अपने उल्‍लेखनीय कार्यों के लिए जाने जाते हैं। इन्‍होंने अपने अतुलनीय कार्यों के लिए भारतीयों के हृदय में विशेष स्‍थान हासिल किया।

1809 में स्लीमन बंगाल सेना में शामिल हुए तथा 1814-1816 के बीच नेपाल युद्ध में अपनी सेवा दी। 1820 में वे सिविल सेवा में आये और 1825 में कप्तान के पद पर आसीन हुए। 1828 में इन्‍होंने जबलपुर जिले का प्रभार संभाला। 1931 में इन्‍हें अपने सहकर्मी के स्‍थान पर सागर में तैनात किया गया। सहकर्मी के लौटने तक इन्‍होंने सागर में दण्डाधिकारी के कार्यभार को संभाला। इन्‍होंने भाषा पर विशेष कार्य किया तथा विभिन्‍न भाषाओं को सहजता प्रदान की। उर्दू और फ़ारसी में अवध के राजा को संबोधित करने वाले एकमात्र ब्रिटिश (British) अधिकारी थे। अवध पर उनकी 800 पन्नों की रिपोर्ट को आज भी 1800 के दशक के दौरान के राज्य के सबसे सटीक और व्यापक अध्ययनों में से एक माना जाता है। स्लीमन एशिया में डायनासोर (Dinosaur) जीवाश्मों की खोज करने वाले प्रथम व्‍यक्ति बने थे तथा अपनी खोज में प्राप्‍त जीवाश्‍मों को इन्‍होंने कलकत्‍ता के भारतीय संग्रहालयों में भेजा। इन्‍होंने बच्‍चों की दयनीय स्थिति पर भी अपनी लेखनी चलायी। स्लीमन का ब्रिटिश संस्‍कृति के प्रति पूर्ण विश्‍वास था, तथा इन्‍होंने भारतीय संस्‍कृति के प्रति भी उदारता दिखाई। इन्‍होंने अन्‍य ब्रिटिश अधिकारियों की भांति कभी किसी भी घरेलू नौकर या सिपाही के लिए नीग्रो (Negro) या अश्‍वेत शब्‍द का प्रयोग नहीं किया। इन्‍होंने प्रत्‍येक भारतीय नागरिक के लिए सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण रखा।

स्‍लीमन ने आपराधिक जगत में संलग्‍न लोगों को सबक सिखाने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। 1839 में इन्होंने ठगों और डकैतों के दमन के लिए आयुक्त कार्यालय का कार्यभार संभाला। अपने ऑपरेशनों (Operations) के दौरान, इन्‍होंने 1400 से अधिक ठगों को फांसी दी। इनमें से एक चोर ने अपनी पगड़ी से लगभग 900 लोगों की हत्‍या का जुर्म स्‍वीकारा। इन्‍होंने भारतीय ठगों पर तीन पुस्‍तकें लिखी। जिसमें ठगों द्वारा प्रयोग की जाने वाली भाषा का गहनता से वर्णन किया।

स्लीमन ने 1843 से 1849 तक ग्वालियर में और 1849 से 1856 तक लखनऊ में रेजिडेंट (Resident) के रूप में कार्य किया। लखनऊ में यह तीन आत्‍मघाती हमलों से बचे। यह लॉर्ड डलहौजी (Lord Dalhousie) द्वारा अवध पर कब्‍जे के भी विरोधी थे, किंतु इनकी सलाह की अवहेलना की गई। इनका मानना था कि ब्रिटिश सरकार को भारत के केवल उन क्षेत्रों में कब्‍जा करना चाहिए जिनका बुनियादी ढांचा कमजोर है तथा विभिन्‍न आपराधिक गतिविधियों से जूझ रहा हो।

भारत के कई क्षेत्रों को अंग्रेजों ने हड़प सिद्धान्‍त या व्‍यपगत सिद्धान्‍त के तहत कब्‍जा कर लिया था। अवध एकमात्र ऐसा भारतीय राज्‍य था, जिसके शासक वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने ‘असहनीय कुशासन’ के आधार पर हटाया। इन्‍होंने नवाब पर आरोप लगाया कि नवाब ने लॉर्ड वेलेस्ली (Lord Wellesley) के साथ ऐसी प्रशासन व्‍यवस्‍था स्‍थापित करने की संधि की जो प्रजा के अनुकुल हो। किंतु स्थिति बिल्‍कुल इसके विपरित हुई जिससे अवध अपने पतन के कगार पर खड़ा हो गया। फरवरी 1856 में एक उद्घोषणा के माध्‍यम से अवध पर कब्‍जा कर लिया गया।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/William_Henry_Sleeman
2. https://www.gktoday.in/gk/annexation-of-oudh/



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