भगवान बुद्ध के जीवन का अभिन्‍न अंग श्रावस्‍ती, लखनऊ से ज़्यादा दूर नहीं

लखनऊ

 28-05-2019 11:30 AM
धर्म का उदयः 600 ईसापूर्व से 300 ईस्वी तक

लखनऊ से 151 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, श्रावस्ती बौद्ध व जैन दोनों धर्मों का तीर्थ स्थान है। यहाँ बौद्ध धर्मशाला, मठ और मन्दिर स्थित हैं। छठी शताब्दी ईसा पूर्व से छठी शताब्दी ईस्‍वी तक श्रावस्ती कोसल साम्राज्य की राजधानी रहा। इस स्‍थान में भगवान बुद्ध ने अपने जीवन का एक लंबा पड़ाव व्‍यतीत किया। श्रावस्ती को गौतम बुद्ध के जीवनकाल के दौरान प्राचीन भारत के छह सबसे बड़े शहरों में से एक माना जाता था। यह माना जाता है कि उस दौरान श्रावस्ती शहर में लगभग 18 करोड़ लोग निवास करते थे। भगवान बुद्ध लगभग 25 वर्षा ऋतुओं तक यहां रहे। असल में बरसात के मौसम में बौद्ध सन्‍यासियों का संघ एक जगह पर एकत्रित हो जाता है, क्‍योंकि वे इस मौसम में यात्रा नहीं कर सकते थे। बुद्ध अनुयायियों द्वारा अधिकांश त्रिपिटकों (बौद्ध धार्मिक ग्रंथ) का निर्माण भी यहीं किया गया।

भगवान बुद्ध अपने शिष्‍य या अनुयायी अनाथपिंडक के अनुरोध पर यहां आए। अनाथपिंडक ने बुद्ध के आगमन की सूचना सुनकर सोने की मुद्राओं में जेतवन विहार खरीदा तथा यहां मठों का निर्माण कराया। इस विहार का नाम राजकुमार जेतवन के नाम पर रखा गया है। इस विहार के द्वार से थोड़ी ही दूरी पर आनंद बोधि वृक्ष है, जिसे बोधगया में बोधि वृक्ष की एक शाखा के रूप में यहाँ लगाया गया। जेतवन और पुब्बाराम श्रावस्‍ती के प्रमुख मठ हैं। राजा प्रसेनजित ने यहां एक और प्रसिद्ध मठ राजाकरम का निर्माण करवाया, जो जेतवन मठ के विपरीत दिशा में स्थित है। प्रसेनजित बुद्ध के शिष्‍य और बुद्ध के संरक्षक थे।

श्रावस्‍ती भगवान बुद्ध के जुड़वा चमत्‍कार और यहां दिए गए उनके सर्वाधिक उपदेशों के लिए प्रसिद्ध है। एक बार भगवान बुद्ध ने पूर्णिमा के दिन श्रावस्ती में आम के वृक्ष के नीचे चमत्कार दिखाने का वादा किया। किंतु उनके विरोधियों ने उन्‍हें रोकने के लिए सारे आम के वृक्ष उखाड़ दिए, पर पूर्णिमा के दिन वे राजा के बगीचे में गये, एक आम खाया और वह बीज बो दिया, जिससे एक पेड़ अंकुरित हो गया और उसमें तुरंत फूल भी आ गए, जिसे गंडम्बा वृक्ष के नाम से जाना जाता है। इस वृक्ष के पास हवा में चलकर इन्‍होंने अपने शरीर के ऊपरी भाग से ज्‍वाला और नीचले भाग से जल निकाला। वह स्‍थान जहां भगवान बुद्ध ने यह चमत्‍कार किए थे आज भी यहां स्थित है।

प्राचीन श्रावस्ती के अवशेष आधुनिक ‘सहेत-महेत’ नामक स्थान से प्राप्त हुए हैं। आज भी सैकड़ों श्रद्धालु यहां आते हैं और मूलगंध कुटी में पूजा अराधना करते हैं। यहां की कच्‍ची कुटी और पक्की कुटी प्राचीन किलाबंद महेत क्षेत्र का हिस्सा हैं। कच्‍ची कुटी की पहचान अनाथपिंडिका या सुदत्त के स्तूप के रूप में की जाती है, जिसे घनी वनस्‍पति और मिट्टी की पहाड़ियों को काटने के बाद खोजा गया था। इसके विषय में कहा जाता है कि इसमें सभी सुविधाएं उपलब्‍ध थीं। पक्की कुटी अंगुलिमाल (कटी हुई अंगुली की माला पहनने वाला डाकू) का स्तूप है। जो कच्‍ची कुटी से कुछ ही दूरी पर स्थित है। स्तूप का मुख्य आकर्षण डाकू अंगुलिमाल की गुफा है, जिसके विषय में कहा जाता है कि अंगुलिमाल ने बुद्ध के द्वारा मनाए जाने के बाद यहां तपस्या और पश्चात्ताप में अपना जीवन बिताया था।

यह जैन धर्म के विश्वासियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है, क्योंकि शोभनाथ मंदिर को जैन धर्म के तीर्थंकर सम्भवनाथ का जन्मस्थान माना जाता है। अतः यह शहर जैन एवं बौद्ध दोनों ही धर्मों के तीर्थयात्रियों के लिए विशेष महत्‍व रखता है तथा देश-विदेश के श्रद्धालु यहां आते हैं। लखनऊ से श्रावस्‍ती के लिए रेल, बस और टैक्‍सी सुविधाएं उपलब्‍ध हैं, जिनका चयन आप स्‍वेच्‍छा से कर सकते हैं।

संदर्भ:
1.http://lifeisavacation.in/2013/08/12/sravasti/
2.https://www.burmese-art.com/blog/shravasti
3.https://en.wikipedia.org/wiki/Shravasti
4.https://www.rome2rio.com/s/Lucknow/Shravasti
5. https://bit.ly/2VNKUhT



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