समय के साथ स्वाभाविक होते पिता

लखनऊ

 16-06-2019 10:30 AM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

बदलते ज़माने के साथ पिता का स्वरुप भी बदल गया है और हमेशा गम्भीर और कठोर दिखने वाले पिता की जगह अब अपने बच्चों के संग खेलने और मस्ती करने वाले पिता ने ले लिया है। समय के साथ बदलाव तो स्वाभाविक हैं, लेकिन पिता के कर्त्तव्य में कोई बदलाव नहीं होगा और यही हमारी संस्कृति रही है। बदलते ज़माने और रोजगार की जरूरतों की वजह से आज हम में से कई अपने माता-पिता से दूर हो गए हैं, ऐसे में हम उन बुजुर्ग कदमों को चाह कर भी सहारा नहीं दे पा रहे हैं, उनका अकेलापन नहीं दूर कर पा रहे हैं, तो मन में बस एक टीस भर जाता है अपनों के लिए, जो बेहद बेचैन करता है। हालाँकि, आज संयुक्त परिवारों के बिखंडन से बुजुर्ग माँ-बाप की समस्याएं कहीं ज्यादा विकराल हो गयी है।

तो आइये इस पितृ दिवस धन्यवाद दें उनको जिसने अपनी खुशियाँ भूलकर अपने पुरे जीवन को हमारे लिए कुर्बान कर दिया। प्रारंग की तरफ से सभी पिताओं को दिल से सलाम। इस रविवार हम आपके लिए लेकर आयें हैं पॉकेट फिल्म्स (Pocket Films) द्वारा निर्मित और तरुण द्वारा निर्देशित, पिता के प्रेम और त्याग को प्रदर्शित करने वाली कविता जिसे इस चलचित्र के माध्यम से प्रदर्शित किया गया है। यह चलचित्र पिता-पुत्री के संबंध का एक मजबूत बंधन दिखाता है। इसकी शुरुआत कथाकार (कवि) से होती है, जो कविता सुनाती है, इसके साथ ही चलचित्र में स्मरण (Flash Back) दिखाया जाता है, जब वो पांच साल की थी तब कैसे प्यार से उसके पिता ने उसका पालन पोषण किया, अब वह 25 साल की है और अपने पिता से दूर है और स्वतंत्र जीवन जी रही है और अकेले ही सभी चुनौतियों का सामना कर रही है, जो उसे उसके पिता के बलिदानों के बारे में सोचने के लिए मजबूर कर रहा है, कैसे उसके पिता ने उसे इस काबिल बनाया।

सन्दर्भ:-
1. https://www।youtube।com/watch?v=PGblvXeOiTg



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