भारत में फ्रांसीसी उपनिवेश

लखनऊ

 28-06-2019 01:19 PM
उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

भारत में औपनिवेशिक या अंग्रेजी राज्य और उनकी ईस्ट इंडिया कंपनी के बारे में सभी भली भांति जानते हैं लेकिन इसके अतिरिक्त कुछ अन्य यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियां भी हैं जिन्होनें खुद को भारत के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में स्थापित किया था। फ्रांस भी इन औपनिवेशिक शक्तियों में से एक है। भौगोलिक रूप से फ्रांसीसी उपनिवेश में भारतीय उपमहाद्वीपों के अलग-अलग परिक्षेत्र शामिल थे। इन अधिकृत प्रदेशों को मूल रूप से फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा 17वीं शताब्दी में अधिग्रहित किया गया था तथा 1950 और 1954 में इन्हें पुनः भारतीय गणराज्य में शामिल किया गया था। फ्रांसीसी उपनिवेशों में कोरोमंडल तट पर स्थित पांडिचेरी, करिकाल और यानाओन, मालाबार तट पर माहे और बंगाल में चंदननगर शामिल थे। 1936 में इन कॉलोनियों (Colonies) की आबादी कुल 2,98,851 थी, जिनमें से 63% लोग पांडिचेरी में रहते थे।

पहला फ्रांसीसी अभियान 16 वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुआ। फ्रांस ईस्ट इंडिया कंपनी व्यापार में प्रवेश करने वाली अंतिम यूरोपीय कंपनी थी। 1615 में फ्रांस के दो जहाजों को व्यापार हेतु भारत में भेजा गया था। फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी का गठन 1642 में कार्डिनल रिचल्यू (Cardinal Richelieu) के तत्वावधान में हुआ जिसे 1664 में जीन-बैप्टिस्ट कोलबर्ट ने फिर से संगठित किया। 1667 में फ्रांस इंडिया कंपनी ने फ्रांकोइस कैरन की कमान के तहत एक अभियान शुरू किया। 1668 में इन्होनें सूरत पहुंचकर भारत में पहला फ्रांसीसी कारखाना स्थापित किया और 1669 में मसूलिपट्टनम में एक और फ्रांसीसी कारखाना स्थापित किया गया। 1692 में बंगाल के मुगल गवर्नर नवाब शैस्ता खान की अनुमति से चंदननगर की स्थापना की गई। 1673 में फ्रांस ने पांडिचेरी क्षेत्र पर अधिग्रहण किया तथा 4 फरवरी 1673 को एक फ्रांसीसी अधिकारी ने पांडिचेरी के डेनिश लॉज (Danish Lodge) में निवास करना शुरू किया जिससे पांडिचेरी में फ्रांसीसी प्रशासन की शुरूआत हुई। 1674 में, पहले गवर्नर फ्रंकोइस मार्टिन ने पांडिचेरी को फलते-फूलते शहर में बदलने के लिये यहां महत्वाकांक्षी परियोजनाओं की शुरुआत की। 1741 तक अंग्रेजों के समान फ्रांसीसियों के उद्देश्य विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक हो चुके थे। इस अवधि के दौरान फ्रांसीसी ईस्ट इंडिया कंपनी ने 1723 में यानम, 1725 में माहे, और 1739 में कराईकल पर अपना अधिग्रहण किया। 1726 से लेकर 1741 तक पियर क्रिस्टोफ़ ले नोइर और पियर बेनोइट डुमास जैसे समर्थ राज्यपालों ने पांडिचेरी क्षेत्र का विस्तार कर इसे समृद्ध शहर बनाया।

ब्रिटिशों से पराजय और असफल शांति वार्ता के बाद 1754 में फ्रांसीसी भारत से लौट गए। लेकिन फिर भी फ्रांसीसियों ने बंगाल में अपनी व्यापारिक गतिविधि को बढ़ाया और निरंतर हस्तक्षेप करते रहे। 15 अगस्त 1947 को भारत की स्वतंत्रता ने पूर्व ब्रिटिश भारत के साथ फ्रांस की भारतीय संपत्ति के संघ को प्रोत्साहन दिया। 1947 में मछलीपट्टनम (Machilipatnam), कोज़ीकोडे (Kozhikode) और सूरत के लॉजों को भारत को सौंप दिया गया जबकि चंदननगर को 1950 में भारत को सौंपा गया।


फ्रांस वंशावली में हेराल्डिक (Heraldic) प्रतीक भी महत्वपूर्ण है जिसका उपयोग 11वीं शताब्दी में बहुत अधिक किया जाता था। हालांकि 17वीं शताब्दी के बाद से इसका प्रचलन बहुत कम होने लगा था। अंतर्राष्ट्रीय हेराल्ड्री में फ्रांसीसी भाषा के कई शब्दों को लिया गया था। प्रथम फ्रांसीसी साम्राज्य ने हेरालड्री की एक नई प्रणाली शुरू की थी जिसे नेपोलियन हेरालड्री का नाम दिया गया था। इसका प्रयोग आधिकारिक कार्यों और पदों को इंगित करने हेतु प्रतीक के रूप में किया जाता था। फ्रांस के वर्तमान प्रतीक का उपयोग 1953 से किया जा रहा है। मुख्य रूप से यह फ्रांसीसी पासपोर्ट (Passport) के कवर (Cover) पर दिखाई देता है। इसी प्रकार से फ़्लूर-डी-लिस (fleur-de-lys) डिज़ाइन (Design), जोकि कुमुदिनी फूल के समान होता है, का उपयोग सजावटी और प्रतीकात्मक रूप से फ्रांस में आज भी किया जाता है।

व्यापारिक दृष्टिकोण से फ्रांसिसियों के लिये भारत बहुत ही महत्वपूर्ण था। जीन-बैप्टिस टैवर्नियर ने भारत में होप (Hope) हीरे की खोज की और इसे पश्चिमी देशों में ले गये। फ्रांस राष्ट्रीय पुस्तकालय का एक ग्रंथ जिसका शीर्षक हिस्टोयर डेस पीसेस डेस मोनोयेस कुई ओंट आ एट फ्राप्पी डन्स ल'हिंदोस्तान (Histoire des Pieces des Monnoyes qui ont a ete Frappee dans l’Hindoustan) है, में हिंदुस्तान में खोजे गये सिक्कों की कहानी का उल्लेख किया गया है। यह एक प्रबुद्ध पांडुलिपि है जिसे 1773 में अवध की पुरानी राजधानी फैज़ाबाद में तैयार किया गया था और इसके लेखक फ्रांसीसी जीन-बैप्टिस जोसेफ जेंटिल थे।


फ्रांस का प्रभाव लखनऊ पर भी देखा जा सकता है। फ्रांस और अवध का रिश्ता बेहद पुराना है और अवध की जड़ों में फ्रांसीसी प्रभाव स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। ला मार्टीनियर कॉलेज (La Martiniere College) की वास्तुकला अवध और फ्रांस की साझी रवायत का जीता-जागता सबूत है और इन रवायतों को और करीब से जानने का मौका सनतकड़ा लखनऊ समारोह ने दिया जो केसरबाग बारादरी में आयोजित किया गया था। इसी प्रकार एलायंस फ्रांसेइस डी (Alliance Française de) भी लखनऊ में स्थित है जो राज्य का पहला आधिकारिक इंडो-फ्रेंच सांस्कृतिक केंद्र है। यह सिर्फ एक संस्थान नहीं है बल्कि फ्रांस का प्रवेश द्वार है। इसके द्वारा फ्रांस की संस्कृति और इतिहास को भली भांति समझा जा सकता है।

संदर्भ:
1. https://en.wikipedia.org/wiki/French_heraldry
2. https://en.wikipedia.org/wiki/French_India
3. https://www.gktoday.in/gk/the-arrival-of-french-east-india-company/
4. https://bit.ly/2LlLrWZ
5. https://bit.ly/2KMLE5Y
6. https://economictimes.indiatimes.com/blogs/onmyplate/money-history-a-french-connection1/



RECENT POST

  • ब्रिक्स (BRICS) की कमियों और विशेषताओं को उजागर करता है कोविड -19
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     08-07-2020 06:46 PM


  • इंडस वैली और इसकी लैपिडरी
    सभ्यताः 10000 ईसापूर्व से 2000 ईसापूर्व

     08-07-2020 07:43 PM


  • शिकस्ता हस्तलिपि और उसका इतिहास
    ध्वनि 2- भाषायें

     07-07-2020 04:53 PM


  • लखनऊ और चिकनी बलुई मृदा के विभिन्न उपयोग
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     06-07-2020 03:36 PM


  • वह दुर्लभता जो हैली का धूमकेतु है
    खनिज

     04-07-2020 07:21 PM


  • भारत के कंटीले जंगल
    जंगल

     04-07-2020 03:14 PM


  • ऐरावत अदम्य शक्ति का प्रतीक और हाथियों का देवता राजा
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     03-07-2020 11:06 AM


  • मुगल आभूषण और कपड़ों का निरूपण और इतिहास
    द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य

     01-07-2020 11:51 AM


  • लखनऊ की कई जटिल सुगंध
    गंध- ख़ुशबू व इत्र

     01-07-2020 01:17 PM


  • कितना लाभदायक साबित होगा अंतरिक्ष में खनन
    खनिज

     30-06-2020 06:50 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.