उत्तर प्रदेश में पाये गये हैं सबसे अधिक उत्खनन स्थल

लखनऊ

 17-07-2019 01:45 PM
खदान

मानव जाति का इतिहास बहुत पुराना है जिसे भिन्न-भिन्न सभ्यताओं के विकास के साथ स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। पुरातात्विक खुदाई से मिले साक्ष्यों ने मानव जाति के विकास को समझने में और भी अधिक सहायता प्रदान की है। चित्रित धूसर मृदभांड (Painted gray ware culture – पी.जी.डब्ल्यू.) संस्कृति के माध्यम से इस विकास को समझने में और भी अधिक सहायता प्राप्त हुई।

चित्रित धूसर मृदभांड पश्चिमी गंगा के मैदान और भारतीय उपमहाद्वीप पर घग्गर-हकरा घाटी के लौह युग की भारतीय संस्कृति है जो लगभग 1200 ईसा पूर्व से शुरू होकर 600 ईसा पूर्व तक चली। इस दौरान धूमिल भूरे रंग की मिट्टी के बर्तन बनाये गये जिनमें काले रंग के ज्यामितीय पैटर्न (Pattern) को उकेरा गया। गांव और शहरों का निर्माण किया गया जो कि हड़प्पा सभ्यता के शहरों जितने बड़े नहीं थे। इस दौरान घरेलू घोड़ों, हाथी दांत और लोहे की धातु को अधिकाधिक प्रयोग में लाया गया। इस संस्कृति को मध्य और उत्तर वैदिक काल अर्थात कुरु-पंचाल साम्राज्य से जोड़ा जाता है जो सिंधु घाटी सभ्यता के पतन के बाद दक्षिण एशिया में पहला बड़ा राज्य था। इस प्रकार यह संस्कृति मगध साम्राज्य के महाजनपद राज्यों के उदय के साथ जुड़ी हुई है। इस संस्कृति में चावल, गेंहू, जौं का उत्पादन किया गया तथा पालतू पशुओं जैसे भेड़, सूअर और घोड़ों को पाला गया। संस्कृति में छोटी झोपड़ियों से लेकर बड़े मकानों का निर्माण मलबे, मिट्टी या ईंटों से किया गया।

भारत में अब तक लगभग 1100 से भी अधिक पी.जी.डब्ल्यू. स्थल खोजे जा चुके हैं जिनकी संख्या उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक आंकी गयी है। अन्य उत्खनन स्थलों के संदर्भ में भी उत्तरप्रदेश का स्थान पहला है। यहां लगभग 93 अन्वेषण स्थलों को पी.जी.डब्ल्यू. की श्रेणी में रखा गया है। इनमें से 16 स्थल सहारनपुर, 11 स्थल जौनपुर, 9 स्थल आगरा, 7 स्थल अलीगढ़, 5 स्थल हरदोई और 5 स्थल मुजफ्फरनगर में स्थित हैं। बदायूं, मथुरा, फैजाबाद, एटा, बरेली में क्रमशः 4, 4, 4 और 3 स्थल पाये गये हैं। इसी तरह, वाराणसी, सहारनपुर, मथुरा, कन्नौज, बुलंदशहर, बलिया और इलाहाबाद में भी एक-एक स्थल पाये गये हैं।

उत्तरप्रदेश में सबसे पुराने हड़प्पा शहर पाये गये। ये शहर पी.जी.डब्ल्यू. स्थलों के अंतर्गत भी आते हैं क्योंकि इन शहरों में पी.जी.डब्ल्यू. के साक्ष्य भी प्राप्त हुए। उत्तरप्रदेश स्थित आलमगीरपुर जो कि पी.जी.डब्ल्यू. स्थल की श्रेणी में आता है, में खुदाई के फलस्वरूप कुछ साक्ष्य प्राप्त हुए जो 2136 ईसा पूर्व से 1948 ईसा पूर्व के बीच के थे। रेडियोकार्बन डेटिंग (Radiocarbon dating) के माध्यम से इस बात की पुष्टि हुई कि स्थल पर मिले साक्ष्य पी.जी.डब्ल्यू. के शुरुआती चरण की तुलना में बहुत पुराने थे जो हड़प्पा सभ्यता से मिलते जुलते थे। इस खुदाई में विशिष्ट हड़प्पा की मिट्टी के बर्तनों को पाया गया। खुदाई में चीनी मिट्टी से बनी प्लेटों (Plates), कपों (Cups), फूलदान, मनके आदि के अवशेष प्राप्त किये गये।

पुरातत्वविदों के अनुसार उत्तर प्रदेश में स्थित मथुरा सबसे बड़ा पी.जी.डब्ल्यू. स्थल है जो 375 हेक्टेयर भूमि को आवरित करता है। इसी प्रकार जाखेरा सहित कुछ अन्य स्थल पी.जी.डब्ल्यू. के प्रारंभिक शहरीकरण और अर्ध शहरीकरण को प्रदर्शित करते हैं क्योंकि इन स्थलों से सामाजिक संगठन और व्यापार के साक्ष्य प्राप्त हुए जिसमें सोने, तांबे, हाथी दांत और कीमती पत्थरों के गहने शामिल थे। यहां हुई खुदाई में आभूषण (टेराकोटा (Terracotta), पत्थर, कांच आदि) और मानव व पशु मूर्तियां पायी गयी जो यहां के लोगों की कला और शिल्प का प्रतिनिधित्व करती हैं। 2014 में उत्तर प्रदेश स्थित गांव चंदायन में हुई खुदाई में एक मानव कंकाल पाया गया जिसने ताम्बे का मुकुट पहना हुआ था। मुकुट में कार्नेलियन (Carnelian) का एक महत्वपूर्ण मनका भी जुड़ा हुआ था। यह साक्ष्य यह इंगित कर रहे थे कि यह कंकाल हड़प्पा सभ्यता के अंतिम चरण का है। मुकुट इंगित करता है कि कंकाल संभवतः एक स्थानीय मुखिया या ग्राम प्रधान का था। बागपत जिले में भारतीय पुरातत्व विभाग को खुदाई के दौरान चार हज़ार साल पुराने अवशेष मिले। खुदाई में पवित्र कक्ष, भट्टियां, शाही ताबूत, दाल-चावल से भरे मटके, तलवारें, औजार, मुकुट, आकर्षक कलाकृतियां और इंसानों के साथ दफनाई गई जानवरों की हड्डियां प्राप्त हुई। खुदाई में युद्ध में प्रयोग होने वाले रथ, शाही ताबूत, तलवारें, मुकुट, ढाल जैसी प्राचीन चीजें मिली जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि यहां कभी योद्धाओं की फौज रहा करती थी। कब्रों के साथ खुदाई में जानवरों के अवशेष मिले जिससे माना गया कि मरे हुए लोगों की आत्मा की शांति के लिए जानवरों की बलि देकर उनके साथ दफनाया गया होगा। इन अवशेषों को महाभारत काल का माना गया। ये अवशेष हड़प्पा सभ्यता से एकदम अलग थे।

संदर्भ:
1. http://www.isca.co.in/SOC_HU_SCI/book/ISBN%20978-93-84659-20-2.pdf
2. https://bit.ly/2LqG0qk
3. https://bit.ly/2Gfx8Ql
4. https://rightlog.in/2018/06/baghpat-chariot-01/
5. https://en.wikipedia.org/wiki/Alamgirpur



RECENT POST

  • कैसे बचा जा सकता है क्रेडिट और डेबिट कार्ड ठगी से?
    संचार एवं संचार यन्त्र

     22-11-2019 12:00 PM


  • दर्शनशास्त्र में बनाया जा सकता है एक अच्छा करियर
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     21-11-2019 11:46 AM


  • क्या वन आवरण पर भारत में नीति संशोधन की है आवश्यकता
    जंगल

     20-11-2019 12:00 PM


  • नवाचार (Innovation) के माध्यम से ही भविष्य का विकास है सम्भव
    सिद्धान्त I-अवधारणा माप उपकरण (कागज/घड़ी)

     19-11-2019 11:12 AM


  • भारत में कहाँ-कहाँ प्रतिबंधित है, पेपर स्प्रे?
    हथियार व खिलौने

     18-11-2019 01:43 PM


  • भारत में सर्वाधिक पसंद किये जाने वाले उपन्यास
    ध्वनि 2- भाषायें

     17-11-2019 11:44 AM


  • लखनऊ में पाया जा सकता है ब्लैक-बेलीड टर्न, पर कब तक?
    पंछीयाँ

     16-11-2019 11:26 AM


  • लखनऊ का पारंपरिक स्वादिष्ट व्यंजन “पसंदा कबाब”
    स्वाद- खाद्य का इतिहास

     15-11-2019 12:54 PM


  • क्या है मधुमेह टाइप 1 और टाइप 2
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     14-11-2019 12:03 PM


  • शोक मनाने के लिए बनवाया गया था कैसरबाग स्थित सफेद बारादरी
    वास्तुकला 1 वाह्य भवन

     13-11-2019 11:34 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.