कैसे संचार में मदद करते हैं कृत्रिम उपग्रह?

लखनऊ

 28-09-2019 11:55 AM
संचार एवं संचार यन्त्र

यह किसी भी देश के लिए गर्व की बात होती है कि वह किसी उपग्रह को पृथ्वी से किसी अन्य ग्रह पर या अंतरिक्ष में भेजे। इस सिलसिले में भारत भी उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में और अन्य ग्रहों की कक्षा में भेजने में सफल हो पाया है। भारत ने मंगल पर अपने उपग्रह भेजने में सफलता प्राप्त कर ली है तथा चाँद की कक्षा में भी अपना एक उपग्रह भेजा है। इन उपग्रहों के नाम थे मंगलयान, चंद्रयान प्रथम और चंद्रयान द्वितीय। आइये अब जानने की कोशिश करते हैं कि उपग्रह हमें किस प्रकार से संपर्क साधने में मदद करते हैं। संपर्क स्थापित करने वाले उपग्रहों को कम्युनिकेशन सॅटॅलाइट (Communication Satellite) के नाम से जाना जाता है। इनका मुख्य कार्य होता है संपर्क और संचार को बरकरार रखना। संचार उपग्रह एक कृत्रिम उपग्रह होता है। यह एक ट्रांसपोंडर (Transponder) के ज़रिये रेडिओ (Radio) दूरसंचार संकेतों को बढ़ाता है जिससे पृथ्वी पर तमाम जगहों पर बने स्रोत ट्रांसमिटर (Transmitter), जो कि सन्देश भेजने का मूल स्थान होता है, से रिसीवर (Receiver) अर्थात प्राप्ति स्थल के मध्य में एक सम्बन्ध बनता है। संचार उपग्रह टेलीविज़न (Television), टेलीफ़ोन (Telephone), रेडियो, इन्टरनेट (Internet) और सेना द्वारा उपयोग में लायी जाने वाली वस्तुओं को चलाता है।

अब तक कुल 2,134 उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में उपलब्ध हैं जो कि संचार उपग्रह हैं। इनका उपयोग निजी और सरकारी दोनों ही संस्थाओं द्वारा बड़े पैमाने पर किया जाता है। ये उपग्रह एक प्रकार का जाल पृथ्वी की कक्षा में बना कर रखते हैं जिनका प्रमुख कार्य होता है संचार सम्बन्धी सभी प्रकार की तरंगों को पकड़ना और उनको रिसीवर तक पहुंचाना। इसी प्रकार से पृथ्वी पर भी अनेकों ऐसे ही रिसीवर और रेस्पोंडर (Responder) उपलब्ध हैं जो पृथ्वी पर एक प्रकार का जाल बना कर रखते हैं जो कि तरंगों को उपग्रह तक भेजने और उनको प्राप्त करने का कार्य करते हैं।

अब यदि इसके इतिहास की बात की जाए तो सर्वप्रथम भूस्थिर संचार उपग्रह की अवधारणा आर्थर सी. क्लार्क ने दी थी। अक्टूबर 1945 में क्लार्क ने ब्रिटिश पत्रिका वायरलेस वर्ल्ड (Wireless World) में "एक्स्ट्राटेरैस्ट्रियल रीलेज़" (Extraterrestrial Relays) शीर्षक का एक लेख प्रकाशित किया। इस लेख में रेडिओ सिग्नलों आदि की विवेचना की गयी थी। इस प्रकार से आर्थर सी. क्लार्क को संचार उपग्रह के आविष्कारक के रूप में जाना जाता है। उस समय के उपरांत एक ऐसा दौर आया जब दुनिया भर के कई देश अपना-अपना संचार उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में भेजने का कार्य करने लगे और इसी कड़ी में भारत का पहला उपग्रह आर्यभट भी पृथ्वी की कक्षा में पहुँचाया गया। तब से लेकर आज तक भारत अंतरिक्ष की दुनिया में एक बड़े नाम के रूप में उभर कर सामने आया। अब बात करते हैं चंद्रयान की, तो सबसे पहला चंद्रयान सन 2008 में इसरो द्वारा सफलता पूर्वक चन्द्रमा के लिए भेजा गया था। इस चंद्रयान पर कुल 11 रिमोट सेंसिंग (Remote Sensing) वैज्ञानिक उपकरण लगे हुए थे जो कि इसरो (ISRO), नासा (NASA) और एसा (ESA) से सम्बंधित थे। इस यान का उद्देश्य था चन्द्रमा पर पानी की तलाश, खनिजों की तलाश, हाल में हुए ज्वालामुखी विस्फोटों का पता लगाना आदि। चंद्रयान द्वितीय का मुख्य काम था चन्द्रमा की सतह पर अपना लैंडर (Lander) भेजना जिसका नाम था विक्रम। चंद्रयान द्वितीय जीएसएलवी उपग्रह को लेकर उड़ान भरने वाला था और यह चन्द्रमा की कक्षा में प्रेक्षित होकर अपने लैंडर को चन्द्रमा की सतह पर भेजता। यह एक सफल उड़ान थी और चंद्रयान द्वितीय सफलता पूर्वक चन्द्रमा की कक्षा में प्रेक्षित हो गया तथा उसने विक्रम लैंडर को चन्द्रमा की सतह पर भेजा जिसका मुख्य काम था सॉफ्ट लैंडिंग (Soft Landing) करने का और उपग्रह में दिए गए आदेशों के अनुसार कार्य करने का परन्तु कुछ ही दूर जाने के बाद विक्रम लैंडर का संपर्क चंद्रयान से टूट गया और विक्रम की हार्ड लैंडिंग (Hard Landing) हुयी जिसके बाद से उससे संपर्क साधना मुश्किल हो गया। विक्रम से संपर्क टूटने के बाद कई प्रयास किये गए परन्तु यह संभव नहीं हो पाया। विक्रम लैंडर की स्थिति को छोड़ दें तो यह एक सफल मिशन था। चंद्रयान जैसा कि चन्द्रमा की कक्षा में है तो उससे संपर्क स्थापित करने के लिए पृथ्वी से रेडियो तरंगें भेजी जा रही हैं जो कि पृथ्वी की कक्षा में उपस्थित उपग्रह द्वारा प्राप्त की जाती हैं और फिर उसको चंद्रयान में लगे रिसीवर उपग्रह को भेजा जाता है। इस प्रकार से यह पूरा मिशन पृथ्वी से ही कार्यरत है।

संदर्भ:
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Communications_satellite
2. https://bit.ly/2o0SxGB
3. https://www.explainthatstuff.com/satellites.html
चित्र सन्दर्भ:-
1.
https://bit.ly/2nqySiW



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