कुछ न कहते हुए भी बहुत कुछ कहना ही है मुखाभिनय

लखनऊ

 10-12-2019 12:42 PM
द्रिश्य 2- अभिनय कला

प्राचीन काल से ही भारत विभिन्न अभिनय कलाओं का केंद्र रहा है। यह अभिनय छोटे-छोटे शहरों में विभिन्न रूपों जैसे कठपुतली, जादू का खेल, लोकनृत्य आदि के रूप में देखा जा सकता है। लखनऊ जो अपनी वास्तुकला, खान-पान इत्यादि के लिए जाना जाता है, अपने छोटे पैमाने की इन अभिनय कलाओं का भी केंद्र है। यहां के विभिन्न स्थानों पर आप इन कलाओं का लुत्फ़ उठा सकते हैं। इन सभी प्रदर्शन या अभिनय कलाओं में एक रूप माइम एक्ट (Mime act) या मुखाभिनय का भी है जिसका नाम शायद कम ही लोगों ने सुना होगा। किंतु यदि आपने ये नाम नहीं सुना है तो आपको यह जानकर हैरानी होगी कि अभिनय की यह विधा लगभग 3000 साल पुरानी है। अभिनय करने के इस अंदाज़ को मूक अभिनय भी कहा जा सकता है जो वर्तमान में कहीं गायब सा हो गया है। हालांकि विभिन्न संस्थाएं इस कला के महत्व को समझते हुए इसे पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रही हैं।

यह कला इसलिए खास है क्योंकि इसमें संवादों के बिना ही आंखों, भौंहों, होंठों और इशारों की सहायता से अपनी बात दर्शकों तक पहुंचायी जा सकती है। इस प्रकार कुछ न कहते हुए भी यह अभिनय बहुत कुछ कह जाता है। कलाकार प्रायः अपने हावभावों और अपनी शारीरिक भाषा को निखारने के लिए काले रंग की पोशाक पहनते हैं तथा सफेद रंग से अपने चेहरे को रंगते हैं ताकि उनके चेहरे के हावभाव स्पष्ट रूप से दिखें। मुखाभिनय शरीर की भाषा को बहुत महत्व देता है। अभिनय के दौरान घटनाओं से सम्बंधित संगीत भी बजाया जाता है जो प्रदर्शन को और भी अधिक आकर्षक बनाता है। वास्तव में इन अभिनयों का मुख्य उद्देश्य सामाजिक बुराइयों को उजागर करना होता है। थिएटर फेस्टिवल (Theater festival) और कई कॉर्पोरेट (Corporate) प्रशिक्षण कार्यक्रमों ने मुखाभिनय की इस कला को आज भी बनाए रखा है जो माइम और पैंटोमाइम के माध्यम से एक संक्षिप्त नाटक प्रस्तुत करते हैं।

यह अभिनय सूक्ष्म भावों को जागृत करता है तथा कलाकार की याददाश्त, रचनात्मकता और सटीकता में सुधार करने में भी सहायक है। इस अभिनय का वर्णन प्राचीन ग्रंथ, नाट्यशास्त्र में भी किया गया है। भरत नाट्यम की विभिन्न मुद्राओं में इस कला का भी प्रयोग किया जाता है। इस अभिनय की विशेषता यह है कि इसमें समूह के आकार और आयु सीमा के लिए कोई बाध्यता नहीं होती तथा इसका उपयोग कथक-कली जैसी नृत्य शैलियों में भी किया जाता है जिसमें मुख के भावों के माध्यम से अपनी बात दूसरों तक पहुंचाई जाती है। मूक अभिनय कला एक ऐसी दुनिया है जहां बहुत अधिक सांस्कृतिक विविधता है। यह गैर-भाषी कला का एक विशेष रूप है, जिसकी कोई भाषा तो नहीं है किंतु फिर भी यह हमें बहुत कुछ समझा देती है। इस कला का उपयोग जन संचार के एक प्रभावी माध्यम के रूप में किया जा सकता है। वर्तमान में, इस कला का उपयोग दुनिया के विभिन्न हिस्सों में विभिन्न सामाजिक मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के लिए किया जा रहा है।

संदर्भ:
1.
https://www.bbc.com/news/world-asia-india-22949654
2. https://bit.ly/36cCbLY
3. https://bit.ly/2P4a9wr
4. https://bit.ly/2Rxknai
चित्र सन्दर्भ:-
1.
https://bit.ly/2RIktvX
2. https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Nithor_Mime_Artist.jpg
3. https://pxhere.com/en/photo/1197576
4. https://bit.ly/2Pz2F3q



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