लखनऊ में प्राकृतिक असंतुलन का उपाय हो सकती है, मियावाकी तकनीक

लखनऊ

 12-02-2020 02:00 PM
पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

लखनऊ का वन्यावरण लगभग 11.91 प्रतिशत है जबकि मात्र 6 प्रतिशत के लगभग वन्यावरण के साथ उत्तर प्रदेश भारत के सभी राज्यों में नीचे से चौथे स्थान पर आता है। वास्तविक जंगलों की जगह लेते इमारत के जंगलों के दौर में किसने सोचा था कि एक जापानी तकनीक ‘मियावाकी’ (Miyawaki), जिसका मूल सिद्धांत मानो कि भारतीय संस्कृति के ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ और ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ के गुरूमंत्र की भावना को दर्शाता है, वह भारतीय परिवेश में भी कारगर सिद्ध होगी।

आखिर क्या है मियावाकी तकनीक ?
आमतौर पर हम किसी भी हरी चीज़ को हरियाली समझ लेते हैं, झाड़ झंकार को जंगल जैसा कहने लगते हैं पर आमतौर पर किए गए वृक्षारोपण की तुलना में मियावाकी तकनीक से बने जंगलों में 30 गुना ज्यादा पेड़ होते हैं, 30 गुना ज्यादा ऑक्सीजन (Oxygen) उत्सर्जित होती है और 30 गुना ज्यादा कॉर्बन डाईऑक्साइड (Carbon Dioxide) सोखी जाती है। हरियाली की जो सतह इनकी पत्तियों से मिलकर बनती है, वह इन जंगलों में 30 गुना ज्यादा होती है। ज़मीन से लेकर ऊपर तक की सारी जगह हरियाली से भर जाती है। बिलकुल भी जगह बेकार नहीं की जाती।

ये जंगल इतने घने होते हैं कि आप इनमें ना तो चल के जा सकते हैं और न ही इनके अंदर या आरपार कुछ दिखाई दे सकता है। किसी भी नई जगह में इन जंगलों को बनाने के लिए पहले उस इलाके में सर्वेक्षण करके उस जगह के मौसमी पेड़ों की सूची बनाई जाती है जैसे जो देसी प्रजातियां सदियों से वहां उगती चली आ रही हैं, जो बिना किसी देखरेख, बिना किसी पानी की नियमित आपूर्ति के, कई सालों से अपने आप उग रही हैं। इस प्रक्रिया के बाद मिली सूची को चार भागों में बांट दिया जाता है - विशाल पेड़, बड़े पेड़, छोटे पेड़, झाड़ियां। ऐसा करने से एक बहु-स्तरीय जंगल का खाका खींचा जाता है। इसके बाद जंगल की मिट्टी तैयार की जाती है। एक जंगल को बहुत तरीके से लगाने के लिए पहले उसका आधार तैयार करना होता है। किसी भी प्राकृतिक जंगल की ज़मीन में मिट्टी, नमी, पौष्टिकता और मुलायमपन होता है। उसमें बहुत सारे जीव-जंतु और जीवाणु होते हैं। अब ऐसी मिट्टी बनाने के लिए बंजर ज़मीन में कई सारी चीजों को मिलाना होता है।

मिट्टी को खोदकर उसमें तीन तरह की चीजें मिलाते हैं-गन्ने की भूसी, चावल का छिल्का या धान का छिलका (कहीं कहीं उसे हस्क husk भी कहते हैं), कोकोपीट और गोबर की खाद। मिट्टी को एक मीटर खोदकर उसमें ये तत्व मिलाते हैं। इस तरह मियावाकी तकनीक से मिट्टी तैयार की जाती है। इस तरह की मिट्टी पर जैसे ही पानी पड़ेगा वो इसे तुरंत सोख लेगी, इसमें सूक्ष्म जीवाणु पैदा होने शुरू हो जाते हैं। जंगल की मिट्टी की असली जान उसमें रहने वाले जीव जंतु और जीवाष्म होते हैं। लेकिन जंगल की मिट्टी को जागृत करने के लिए इतना ही काफी नहीं है। बंजर भूमि को जागृत करने के लिए जीवामृत का इस्तेमाल किया जाता है। इसको मिट्टी में मिलाने से वह छोटे-छोटे जीवाष्म वापिस आ जाते हैं जो आमतौर पर हरे भरे जंगल की मिट्टी में अपने आप ही मिलते हैं।

इसके बाद पौधों को काफी आस-पास लगा देते हैं। एक स्कवायर मीटर में 3 से 5 पौधे लगाए जाते हैं। ध्यान रखें कि हर तरह का पौधा मिला-जुला के लगाएं। ऐसा ना हो कि एक हिस्से में केवल झाड़ियां हों या बड़े-बड़े पेड़ हों। छोटे बड़े पेड़ों के पौधे सब मिलजुलकर लगें। ऐसा करने से ही एक बहुस्तरीय जंगल लगाया जाता है। ज़मीन के ऊपर की सारी जगह हरियाली से भर दी जाती है। इसके बाद ज़मीन पर एक धान की या सूखी घास की मोटी सी चादर बिछा देते हैं। इस प्रक्रिया को मल्चिंग (Mulching) या मल्च बोलते हैं। इसकी वजह से सूरज की रोशनी ज़मीन तक नहीं पहुंच सकती। वह वाष्पीकरण को रोकती है, ज़मीन की नमी भाप में नहीं तब्दील होती है। इस वजह से ज़मीन की तराई भी कम करनी होती है। यानि पानी की बचत भी होती है।

मल्चिंग की वजह से ज़मीन के अंदर जो छोटे-छोटे घास के बीज होते हैं, उनको धूप नहीं मिलती जिसकी वजह से घास उग नहीं पाती। खरपतवार कम होती है। जो खाद पेड़ों को दी जाती है, वह पेड़ों को ही लगती है, घास या दूसरी चीजों में बेवजह बर्बाद नहीं होती। मलचिंग के बाद पेड़ों को पानी देते रहना होता है। इससे मिट्टी की नमी बनी रहती है और कभी सूखने नहीं पाती है। इस दौरान पेड़ों की कटाई छटाई भी नहीं की जाती क्योंकि यहां जंगल बनाया जा रहा है कोई बाग बगीचा नहीं। कारण ये है कि इस जंगल को बहुत जल्दी आत्मनिर्भर बनना है ताकि इसे बहुत ज्यादा देखरेख की ज़रूरत ना पड़े। इस तरह तैयार की गई मिट्टी में पौधों की जड़ें इतनी तेज़ी से बढ़ती हैं कि एक साल के अंदर ये लगभग तीन मीटर गहरी हो जाती हैं। अचरज की बात ये है कि मिट्टी के अंदर पड़ी ये जड़ें आपस में मिलकर एक अनोखा जाल बना लेती हैं। इसकी वजह से कोई भी पोषण, कोई भी खनिज जो इस मिट्टी में डाला जाता है या पहले से मौजूद होता है वह सिर्फ एक पेड़ को ना मिलकर पूरे जंगल में लगे सभी पेड़ों को एक समान मिल जाता है क्योंकि सारे पेड़ अलग-अलग होते हुए भी अपनी जड़ों के जाल के कारण एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इस जाल के कारण ऐसे जंगलों की मिट्टी बहती भी कम है।

डेढ़-दो साल के भीतर ही ये जंगल इतने घने हो जाते हैं कि सूरज की रोशनी ज़मीन तक नहीं पहुंच पाती। जंगल के नीचे ज़मीन पर हमेशा अंधेरा रहता है, इस कारण अब मलचिंग करने की कोई ज़रूरत नहीं है, मिट्टी को ढककर रखने की भी कोई जरूरत नहीं है। वाष्पीकरण भी अपने आप बंद हो जाता है। जंगल की ज़मीन पर पेड़ों से झड़कर गिरने वाली पत्तियां और टहनियां तेज़ी से गलकर खाद बन जाती हैं। इसलिए यहां अलग से खाद डालने की भी ज़रूरत नहीं है। बढ़ते-बढ़ते ये जंगल दो साल के अंदर पूरी तरह आत्म निर्भर हो जाता है। इस जंगल के सारे पेड़ एक-दूसरे का साथ देते हुए एक कुटुम्ब की तरह आगे बढ़ते हैं। इस समय ये जंगल मानो बारिश के बादलों को अपनी तरफ आकर्षित करने लगते हैं। रोचक बात ये भी है कि इन जंगलों के कारण स्थानीय पक्षियों की संख्या में भी अभूतपूर्व बढ़ोतरी हो जाती है।

भारत में मियावाकी तकनीक का सफल परीक्षण
भारत में टोयोटा (Toyota) कंपनी में काम करने वाले इंजीनियर (Engineer) शुभेंदु शर्मा ने अकीरा मियावाकी को जब मियावाकी तकनीक से अपनी कंपनी के लिए जंगल लगाते देखा, तब वे उनसे बहुत प्रभावित हुए। परिणामस्वरूप उन्होंने 2011 में नौकरी छोड़कर ‘अफोरेस्ट’ (Afforestt) नाम से अपनी कंपनी बनाई और मियावाकी तकनीक से शुभेंदु ने उत्तराखंड में अपने मकान में जंगल लगाया और देखा कि जो ज़मीन का पानी गर्मियों में सूख जाता था, वो पानी सूखना बंद हो गया। घर का तापमान 5 डिग्री तक कम हो गया और पूरे साल पानी मिलना शुरू हो गया। स्थानीय पक्षियों की संख्या भी बढ़ने लगी। घर की आबो हवा साफ हो गई। घर में धूल कम आने लगी। इस जंगल से मौसमी फलों की पैदावार भी जमकर होने लगी। मानो शहर के बीचों बीच किसी को हिल स्टेशन (Hill Station) में रहने का मज़ा आ रहा हो।

मियावाकी तकनीक बनाम साधारण वृक्षारोपण
साधारण वृक्षारोपण ज्यादातर कागजों पर दिखाए गए आकड़ों तक ही सीमित रह जाते हैं। कहने को तो करोड़ों की संख्या में पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन हकीकत में इनमें से अधिकतर पेड़ वृक्षारोपण के तुरंत बाद ही संसाधनों और अदूर्दशिता के कारण सूखकर खत्म हो जाते हैं।
इसके ठीक विपरीत मियावाकी तकनीक को अपनाकर कम संसाधनों और थोड़े से पैसे के साथ ही ग्लोबल वॉर्मिंग (Global Warming) जैसी समस्या पर काबू पाया जा सकता है।

संदर्भ:
1.
https://bit.ly/2HgwP7Z
2. https://daily.jstor.org/the-miyawaki-method-a-better-way-to-build-forests/
3. https://ensia.com/features/japan-reforestation-deforestation-lessons-indonesia-china/
4. https://en.wikipedia.org/wiki/Akira_Miyawaki
5. Youtube Video (Channel Youth ki Awaaz) - https://www.youtube.com/watch?v=uKt5htrDvlk



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