कौन लाया लखनऊ के मलिहाबाद में आम के बागानों को?

लखनऊ

 29-04-2020 04:35 AM
साग-सब्जियाँ

लखनऊ के मलीहाबाद को आम के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहा जाता है। आम की कई किस्में जैसे दशहरी, चौसा, फजली, लखनऊआ, जौहरी, सफेदा, आदि भी यहाँ उगाई जाती हैं। वहीं एक ऐसा समय भी था जब मलीहाबाद में आम नहीं हुआ करते थे। वर्तमान समय में यह उत्तर प्रदेश में 14 आम के क्षेत्रों में से सबसे बड़ा है और यह अधिकतर अफ़रीदी पठानों के वंशजों के स्वामित्व में है, जो लगभग दो सौ साल पहले अफगानिस्तान के खंदर क्षेत्र से यहां आए थे। लखनऊ के नवाबों के शाही संरक्षण में, मलिहाबाद के आम के बागानों को पठानों द्वारा विकसित किया गया था। पठानों द्वारा 1824 के आसपास मलीहाबाद को अपना घर बनाने से पहले यह इलाका पासी समुदाय के लोगों का हुआ करता था। एक प्रचलित किंवदंतियों के अनुसार इस स्थान का नाम दो पासी भाइयों में से एक के नाम ‘माली’ से पड़ा हो सकता है, जबकि दूसरे का साली पासी हो सकता है या फ़ारसी शब्द मलेह से रखा गया हो सकता है। भारत-गंगा के मैदानी इलाक़े के हृदय स्थल में घर बनाने के लिए पेशावर से अफ़गानिस्तान के रास्ते से जाने वाले पठानों के आने के बाद पासियों का दबदबा कम हो गया।

वहीं पहाड़ों से आए पठान फ़कीर मुहम्मद का विभिन्न प्रकार की स्वादिष्ट फसलों की ओर आकर्षण बढ़ने लगा। जिसके चलते उसने शासक से अनुरोध किया कि वे उसे एक सैनिक के रूप में अपने सैन्य कर्तव्यों से मुक्त कर दे, ताकि वह ग्रामीण इलाकों में किसानों के साथ शांति से रह सके और कुछ रसीली जमीनों पर खेती कर सके। शासक द्वारा फ़कीर मुहम्मद की इस इच्छा को स्वीकार कर ली गई और एक बार जब वह मलीहाबाद में बस गए, तो फ़कीर मुहम्मद ने अन्य पठानों को आमंत्रित किया, जो संशोधन और सूखे फलों के संरक्षण और बिक्री में विशेषज्ञ थे। इसी तरह पठानों द्वारा ही यहाँ आम के बगानों को विकसित किया गया था। आज आम के किसान उस महिमा की छाया हैं जो उन्होंने दशकों पहले हासिल की थी। यह स्थानीय बनिया समुदाय के व्यावसायिक अभिचारकों के सहयोग से पहले आम उत्पादकों की लगन और मेहनत थी, जिसने उत्तरप्रदेश में शानदार आम के क्षेत्रों की नींव रखी। आज भी अकेले मलिहाबाद में लगभग 30,000 हेक्टेयर भूमि राज्य से लगभग 12.5 प्रतिशत आम का उत्पादन होता है।

मलिहाबाद में आमों की सर्वाधिक ज्ञात किस्में निम्न हैं:
दशहरी: मध्य ऋतु में उगने वाले यह आम उत्तरी भारत की सबसे लोकप्रिय किस्मों में से एक है। दशहरी आम मध्यम आकार के होते हैं, जिसमें मधुर स्वाद, मीठा, दृढ़ और रेशेदार गूदा होता है। वहीं इसकी गुठली पतली और अच्छी गुणवत्ता वाली होती है।
चौसा: वर्ष के मध्य में पकने वाली ये आम की किस्म जुलाई के दौरान या अगस्त की शुरुआत में परिपक्व होती हैं। इनका आकार बड़ा होता है और वजन लगभग 350 ग्राम तक होता है। ये आम नरम और मीठे गूदे के साथ चमकीले पीले रंग के होते हैं।
लंगड़ा: लंगड़ा आम उत्तर भारत का एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक आम है, जिसका गुदा ठोस, रेशेदार पीले रंग के होते है और स्वाद तारपीन के तेल के समान होता है। लखनुआ सफेदा: जो लोग रसीला फल खाना पसंद करते हैं, उन्हें इससे बेहतर फल कोई और नहीं मिल सकता है।

आम की कुछ दुर्लभ किस्में निम्न हैं :-
मुंजार अमीन: यह किस्म आमतौर पर मौसम के अंत तक उत्पन्न होती है और आम के सामान्य आकार के बजाय लगभग गोल आकार में दिखाई देती है।
नज़ीर पासंद: आमों की ये किस्में बिल्कुल भी रेशक नहीं होती हैं और जब दशहरी आम बाजार से गायब होने लग जाते हैं तब ये बाजार में दिखाई देते हैं।
जापानी लखनुआ: दो देशों के मिश्रण और उनके बीच एकता का प्रतिनिधित्व करने वाली इस आम की किस्म का नाम पेड़ के आकार और उसके खंडों के नाम पर रखा गया है। वहीं इसकी ख़ुशबू, जो खट्टी मीठी होती है इसे अन्य किस्मों से अलग बनाती है।
कच्छा मीठा: आम की यह अनोखी किस्म काफी दुर्लभ है और कच्चे और पके होने पर भी अपने मीठे स्वाद के लिए जानी जाती है।

आमतौर पर आम मीठे होते हैं, हालांकि इनके गूदे का स्वाद और बनावट भिन्न खेती की वजह से थोड़ा अलग-अलग हो सकता है। जैसे हपुस, एक नर्म, गूदेदार, रसदार बनावट के साथ अतिपक्व बेर के समान होते हैं, जबकि अन्य, जैसे टॉमी एटकिंस, एक रेशमी बनावट के साथ एक खरबूजे या एवोकैडो (avocado) की तरह मजबूत होते हैं। वहीं आम के छिलके को कच्चे, पके हुए और आचार के रूप में भी खाया जा सकता है, लेकिन यह अतिसंवेदनशील लोगों में होंठ, मसूड़े या जीभ के संपर्क में आने के बाद त्वक्शोथ उत्पन्न करने की क्षमता रखता है। जैसा कि अधिकांश लोग जानते ही होंगे कि आम भारत, पाकिस्तान और फिलीपींस का राष्ट्रीय फल है और यह बांग्लादेश का राष्ट्रीय वृक्ष भी है। दक्षिण एशिया की संस्कृति में आम का पारंपरिक संदर्भ देखने को मिलता है। अपने संपादकों में, मौर्य सम्राट अशोक द्वारा भी फल-रोपण और शाही सड़कों के किनारे छायादार वृक्षों का उल्लेख किया गया था। मध्ययुगीन भारत में, इंडो-फ़ारसी कवि अमीर खुसरो ने आम को "नागहजा तारिन मेवा हिंदुस्तान" - "हिंदुस्तान का सबसे उचित फल" कहा था। केवल इतना नहीं दिल्ली सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के दरबार में भी आमों का आनंद लिया जाता था। साथ ही बाबर ने भी अपने बाबरनामा में आम की प्रशंसा की, वहीं शेरशाह सूरी ने मुगल सम्राट हुमायूं पर अपनी जीत के बाद चौसा किस्म को विकसित किया था।

साथ ही बागवानी के लिए मुगल संरक्षण ने प्रसिद्ध तोतापुरी सहित हजारों आमों की किस्मों का संशोधन किया, जो ईरान और मध्य एशिया को निर्यात की जाने वाली पहली किस्म थी। ऐसा कहा जाता है कि अकबर (1556-1605) ने बिहार के दरभंगा के लखी बाग में 100,000 पेड़ों का एक आम का बाग लगाया था, जबकि जहाँगीर और शाहजहाँ ने लाहौर और दिल्ली में आम के बाग लगाने और आम पर आधारित मिठाई बनाने का आदेश दिया था। जैन देवी अम्बिका को आम के पेड़ के नीचे बैठे हुए चित्रित किया गया है और आम के फूल सरस्वती पूजा का भी एक अभिन्न अंग हैं। आम के पत्तों का उपयोग भारतीय घरों में शादियों और गणेश चतुर्थी जैसे समारोहों के दौरान दरवाजों को सजाने के लिए किया जाता है। आम के रूपांकन और पैज़्ली (paisley) व्यापक रूप से विभिन्न भारतीय कढ़ाई शैलियों में उपयोग किए जाते हैं, जिन्हें हम कश्मीरी शॉल, कांचीपुरम और रेशम साड़ियों में देख सकते हैं। तमिलनाडु में, आम को उनकी मिठास और स्वाद के लिए, केले और कटहल के साथ तीन शाही फलों में से एक के रूप में जाना जाता है। फलों के इस त्रय को मा-पाला-वज़हाई कहा जाता है। चीन में सांस्कृतिक क्रांति के दौरान आम को लोगों के समक्ष सभापति माओत्से तुंग के लोगों के प्यार के प्रतीक के रूप में लोकप्रिय बनाया गया था।

चित्र (सन्दर्भ):
1.
मुख्य चित्र में इलाहाबाद और आम का सम्बन्ध दिखने का कलात्मक प्रयास किया गया है।, Prarang
2. पेड़ पर लटका हुआ आमों का गुच्छा, Pxhere
3. दुकान पर बिक्री के लिए रखा गया आमों का ढेर, Piseql
4. टोकरी में रखे हुए ताजा आम, Pexels
5. अपने बाग़ में उत्पादित आम को दिखाता बागान का स्वामी, Prarang
संदर्भ :-
1.
https://en.wikipedia.org/wiki/Malihabad
2. https://lucknowobserver.com/mad-about-mangoes/
3. https://en.wikipedia.org/wiki/Mango



RECENT POST

  • भारत में जैविक कृषि आंदोलन व सिद्धांत का विकास, ब्रिटिश कृषि वैज्ञानिक अल्बर्ट हॉवर्ड द्वारा
    भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

     20-05-2022 10:03 AM


  • लखनऊ की वृद्धि के साथ हम निवासियों को नहीं भूलना है सकारात्मक पर्यावरणीय व्यवहार
    नगरीकरण- शहर व शक्ति

     19-05-2022 09:47 AM


  • एक समय जब रेल सफर का मतलब था मिट्टी की सुगंध से भरी कुल्हड़ की स्वादिष्ट चाय
    म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

     18-05-2022 08:47 AM


  • उत्तर प्रदेश में बौद्ध तीर्थ स्थल और उनका महत्व
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     17-05-2022 09:52 AM


  • देववाणी संस्कृत को आज भारत में एक से भी कम प्रतिशत आबादी बोल व् समझ सकती है
    ध्वनि 2- भाषायें

     17-05-2022 02:08 AM


  • बाढ़ नियंत्रण में कितने महत्वपूर्ण हैं, बीवर
    व्यवहारिक

     15-05-2022 03:36 PM


  • प्रारंभिक पारिस्थिति चेतावनी प्रणाली में नाजुक तितलियों का महत्व, लखनऊ में खुला बटरफ्लाई पार्क
    तितलियाँ व कीड़े

     14-05-2022 10:09 AM


  • लखनऊ सहित विश्व में सबसे पुराने और शानदार स्विमिंग पूलों या स्नानागारों का इतिहास
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     13-05-2022 09:41 AM


  • भारत में बढ़ती गर्मी की लहरें बन रही है विशेष वैश्विक चिंता का कारण
    जलवायु व ऋतु

     11-05-2022 09:10 PM


  • लखनऊ में रहने वाले, भाड़े के फ़्रांसीसी सैनिक क्लाउड मार्टिन का दिलचस्प इतिहास
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     11-05-2022 12:11 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id