नवल किशोर प्रेस, लखनऊ में मुद्रित होती है फ़ारसी रामायण

लखनऊ

 01-05-2020 11:45 AM
ध्वनि 2- भाषायें

राम की कहानी इतनी रोचक और प्रेरक है कि न सिर्फ़ हिंदू बल्कि दूसरे धर्म-धर्मांतरों के लोग भी इससे प्रभावित हैं। वाल्मीकि रामायण में ब्रह्मा ने ठीक ही कहा था कि जब तक पृथ्वी पर पहाड़ और नदियों का अस्तित्व रहेगा, रामकथा पूरी दुनिया में तब तक प्रचारित होती रहेगी।लेखकों और कवियों ने आदिकवि वाल्मीकि द्वारा संस्कृत में रचित ‘रामायण’ का अपनी क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवादन करके उसका अपने समय और सांस्कृतिक प्रभाव में पुनर्लेखन का कार्य किया है। इस महाकाव्य पर भारतीय और विदेशी विद्वानों ने बड़ी संख्या में किताबें लिखी हैं।’रामायण’ का कथानक मानवता के लिए इतना हितकारी है कि अकबर महान ने संस्कृत के दूसरे उत्कृष्ट साहित्य के साथ-साथ ‘रामायण’ का फ़ारसी भाषा में अनुवाद कराया। मुल्ला अब्दुल क़ादिर बदायूँनी ने बादशाह के दबाव में बड़े बेमन से फ़ारसी में अनुवाद का यह काम किया। इसके बाद कुछ दूसरे लेखकों और कवियों ने ‘रामायण’ का फ़ारसी में अनुवाद किया क्योंकि उस समय यह अभिजात्य वर्ग और दरबार की भाषा थी।

फ़ारसी में अनुवादित तमाम रामायण में दो प्रमुख हैं। इनमें पहली किताब है - ‘रामायण-ए-मसीह’ जो शेख़ सदुल्लाह मसीह पानीपती द्वारा लिखी गई। वे बादशाह जहांगीर और शाहजहाँ के समकालीन थे। 1899 में इसका प्रकाशन मुंशी नवल किशोर प्रेस, लखनऊ द्वारा किया गया। दूसरी किताब ‘बाल्मीकि रामायण’ एस.मोहर सिंह द्वारा लिखी गई जो महाराजा रणजीत सिंह की सेना में कार्यरत थे।यह किताब 1890 में लाहौर के गणेश प्रकाश प्रेस से प्रकाशित हुई। ‘रामायण-ए-मसीह’ इसलिए चर्चित नहीं हुई क्योंकि यह जहांगीर के समय में लिखी गई थी जबकि मुस्लिम पाठकों ने हिंदू शास्त्रों में रुचि लेना ख़त्म कर दिया था।रामायण पर काम के लिए कट्टरपंथी मुस्लिमों के निशाने पर थे मसीह। उन्होंने अपना पक्ष किताब के शुरू में स्पष्ट किया। कट्टरपंथियों के विरुद्ध उन्होंने ‘दार मज़म्मत-ए-हुसाद’ (ईर्ष्यालुओं की निंदा) शीर्षक से बोला। मसीह ने कहा कि लोगों ने महाकाव्य के शुरू में पैग़म्बर मोहम्मद की तारीफ़ में लिखीं दो नातों पर कोई ध्यान नहीं दिया और ‘पैग़म्बरनामा’ उनका दूसरा महाकाव्य पैग़म्बर के जीवन और कारनामों पर आधारित है। यद्यपि मसीह की रामायण की कहानी मुख्यतः वाल्मीकि रामायण पर आधारित है लेकिन उन्होंने एक बार भी महर्षि वाल्मीकि का नाम नहीं लिया है। हो सकता है कि वह संस्कृत न पढ़ पाते हों और अपनी किताब बदायूँनी का संस्करण पढ़ने के बाद लिखी हो। उन्होंने वाल्मीकि की तरह अपनी किताब को काण्डों में विभाजित नहीं किया बल्कि उसे फ़ारसी के मसनवी अन्दाज़ में लिखा जो अंग्रेज़ी के वीर रस के छन्द के नज़दीक लगती है। उन्होंने सारी कड़ियों या घटनाओं को शीर्षक दिए हैं। उनका लेखन पूरी तरह फ़ारसी शैली का है, कहीं -कहीं अचानक संस्कृत शब्दों का प्रयोग भी मिलता है। वह ऋषि वाल्मीकि को ज़ाहिद कहकर सम्बोधित करते हैं जब वह वन में देवी सीता को आश्रय देते हैं। उन्होंने अपनी कविताओं को इस्लामिक साहित्य से ली गई उपमा और रूपक से अलंकृत किया है।

मसीह के लेखन में मुख्य दोष कालभ्रम का है। वह अपने चरित्रों से ऐसी चीज़ें करवाते हैं जो रामायण में नहीं हैं। उदाहरण के लिए जब रावण सीता का अपहरण कर लेता है, लक्ष्मण उनकी ढूँढ में हर जगह जाते हैं। वह एक तालाब के पास जाकर मछलियों से पूछते हैं कि कहीं उन्होंने सीता को निगल तो नहीं लिया? वे एक आवाज़ में जवाब देती हैं कि उन्होंने सीता को उस तरह नहीं निगला है जैसे उन्होंने यूनुस के साथ अतीत में किया था। जब रावण ने हनुमान की पूँछ में आग लगाई, सीता ने अग्नि देवता से प्रार्थना की कि इस आग को गुलाब के बगीचे में वैसे ही बदल दें जैसे ईश्वर ने तब किया था जब इब्राहीम ख़लील को आग में फेंक दिया गया था। जब राम की मृत्यु की झूठी ख़बर सुनकर सीता बहुत उदास हो गईं तो त्रिजटा उन्हें यह कहकर सांत्वना देती है कि राम को कोई नहीं मार सकता। वह ईसा (क्राइस्ट) की तरह अमर हैं।कुम्भकरण रावण से कहते हैं कि सिकंदर (ऐलेग्ज़ैंडर) की दीवार वह आसानी से तोड़ सकते हैं। जब सुग्रीव कुम्भकरण द्वारा पकड़े गए, तब अंगद हनुमान के पास जाकर उनसे अपने रुस्तम (सुग्रीव ) को दुश्मनों के चंगुल से बचाने की गुहार लगाते हैं। दूसरी ख़ामी मसीह की रामायण में यह है कि यह एक प्रेम की कविता की तरह लिखी गई है, शास्त्र की तरह नहीं। हिंदू कवि सीता के रूप का नख से शिख तक वर्णन नहीं करता। इसका मतलब यह है कि मसीह वाल्मीकि की रामायण नहीं पढ़ सके।बदायूँनी को पढ़ने और अपने हिंदू मित्रों से एक रूपरेखा सुनकर मसीह ने अपनी रचना लिख डाली। फिर भी उनकी किताब उत्कृष्ट कविता की मिसाल है।

मोहर सिंह ने भी अपनी रामायण को पारम्परिक सर्ग-काण्ड में विभाजित नहीं किया है लेकिन सारी घटनाओं को एक शीर्षक के साथ मसनवी के तरीक़े से पेश किया है।वह पूरी तरह से वाल्मीकि का अनुगमन करते हैं और अक्सर उनका नाम बड़े सम्मान से लेते हैं। इससे पता चलता है कि उन्होंने गहराई से वाल्मीकि रामायण का अध्ययन किया है। मसीह और मोहर सिंह अविभाजित पंजाब से सम्बंधित थे और दोनों ने तुलसीदास का कोई उल्लेख नहीं किया। इन दोनों कवियों ने राम सम्बन्धी महाकाव्य परम्परा को आगे बढ़ाया और समाज में भाईचारा बढ़ाया। हमें इस सांस्कृतिक धरोहर के प्रति गर्व महसूस करना चाहिए।

रामायण : आधुनिक विचार मंथन
रामायण के विविध संस्करण , प्रारूप और व्याख्याएँ पाठकों के लिए उपलब्ध हैं। देश-विदेश में इस दिशा में काफ़ी काम हुआ है। लेकिन ए. के. रामानुजन का विद्वतापूर्ण लेख - ‘तीन सौ रामायण और तीन विचार अनुवाद पर’ अपने ढंग की अनोखी खोज है। यह लेख उनके निबंध संग्रह में शामिल है जिसका सम्पादन विनय धाखडकर ने किया और 1999 में इसका प्रकाशन ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस ने किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय में रामानुजन के अनेक रामायण सम्बंधी लेख पर विवाद खड़ा हुआ। यह लेख एक इतिहास सम्बंधी कोर्स का भाग रहा है। 2008 में कुछ दक्षिणपंथी हिंदुत्व विचारधार के कार्यकर्ताओं ने दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग पर आक्रमण कर दिया और माँग की कि यह लेख पठनीय सूची से हटा दिया जाए। इतिहास विभाग के अध्यापकों ने ऐसा करने से मना कर दिया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में समाप्त हुआ जो एक शैक्षिक विशेषज्ञ कमेटी की इस विषय पर राय जानना चाहती थी। कमेटी के चार में से तीन सदस्यों ने राय दी कि लेख विद्यार्थियों को ज़रूर पढ़ना चाहिए। अभी हाल में उपकुलपति और एकेडिमिक काउंसिल (Academic Council) ने इतिहास विभाग और विशेषज्ञ कमेटी की राय की अनदेखी करते हुए लेख को पठनीय सूची से हटा दिया।यह मूल्यवान लेख sacw.net पर जनहित और शैक्षिक उपयोग के लिए उपलब्ध है।

एक बार जब राम अपने सिंहासन पर बैठे थे, उनकी अंगूठी गिर गई। उसने जैसे ही ज़मीन को छुआ, वहाँ गड्ढा बन गया और अंगूठी उसमें ग़ायब हो गई। राम के विश्वासपात्र अनुयायी हनुमान वहीं थे। राम ने उनसे अंगूठी ढूँढ के लाने को कहा। अब हनुमान तो किसी भी छेद में घुस सकते थे, वह कितना ही छोटा क्यों न हो! उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण करके छेद में प्रवेश किया और वह पाताललोक पहुँच गए।वहाँ उपस्थित औरतें चिल्लाने लगीं -‘देखो, कितना छोटा बंदर है, ऊपर से गिरा है।’ उन्होंने हनुमान को पकड़कर एक थाली पर रख दिया। भूतों के राजा को जानवरों को खाना पसंद था तो हनुमान रात के भोजन के रूप में उनके पास भेज दिए गए। उधर पृथ्वी पर राम से मिलने गुरु वशिष्ठ और भगवान ब्रह्मा पहुँचे। उन्होंने कहा कि वे एकांत में राम से बात करना चाहते हैं और नहीं चाहते कि कोई दूसरा सुने। राम राज़ी हो गए। तब उन दोनों ने कहा-‘एक नियम बना दें। हमारी बातचीत के बीच अगर कोई आएगा तो उसका सिर काट दिया जाएगा।’ राम इसके लिए भी राज़ी हो गए।

अब ऐसा कौन विश्वासपात्र था जो द्वार की रक्षा करे! हनुमान अंगूठी ढूँढने गए हुए थे। राम लक्ष्मण से ज़्यादा किसी पर विश्वास नहीं करते थे, उन्होंने लक्ष्मण से द्वार पर पहरा देने को कहा और किसी को भी अंदर आने से मना किया। तभी वहाँ ऋषि विश्वामित्र आए और उन्होंने तुरंत राम से मिलना चाहा। लक्ष्मण ने उन्हें रोका।नाराज़ होकर ऋषि ने आगाह किया कि अगर तुमने राम को मेरे आने की सूचना नहीं दी तो पूरी अयोध्या को श्राप देकर भस्म कर दूँगा। लक्ष्मण ने राम को सूचना दी। राम ने ऋषि विश्वामित्र को अंदर बुला लिया। गुप्त मंत्रणा समाप्त हो चुकी थी। ब्रह्मा और वशिष्ठ राम के पास यह कहने आए थे कि मानवीय संसार में उनका काम समाप्त हो चुका है। राम के रूप में अपने अवतार को अब आपको छोड़ना होगा। यह शरीर त्याग कर फिर से ईश्वरों में शामिल हो जाएँ। लक्ष्मण ने राम से अपना सिर काटने को कहा। राम ने मना किया कि इसकी ज़रूरत नहीं है क्योंकि मंत्रणा पहले ही ख़त्म हो गई थी। लक्ष्मण ने फिर भी आग्रह किया कि ऐसा न करके आपके नाम पर धब्बा लगेगा। आपने अपनी पत्नी को नहीं छोड़ा, उसे वनवास दे दिया। मुझे भी सज़ा दें। लक्ष्मण शेष के अवतार थे ,वह नाग जिस पर विष्णु विश्राम करते थे। उनका समय भी पूरा हो गया था। वह सरयू में जाकर लुप्त हो गए। इसके बाद राम ने अपने अनुयायियों विभीषण, सुग्रीव और दूसरों को बुलाकर लव-कुश के राजतिलक की व्यवस्था की। उसके बाद उन्होंने भी सरयू में जल समाधि ले ली।

उधर पाताल लोक के राजा ने हनुमान से वहाँ आने का कारण पूछा तो हनुमान ने बताया कि वह राम की अंगूठी वापस लेने आए हैं। राजा ने एक अँगूठियों से भरा थाल हनुमान को दिखाया। वे सभी राम की थीं। राजा ने कहा कि जब तुम पृथ्वी पर वापस जाओगे तो राम नहीं मिलेंगें। उनका अवतार समाप्त हो चुका है। जब-जब राम के अवतार का समय पूरा होता है, एक अंगूठी गिर जाती है और मैं उसे उठाकर सहेज लेता हूँ। इसके बाद हनुमान वापस लौट आए। यह कहानी आमतौर पर इसलिए सुनाई जाती है कि इस तरह के हर राम के लिए एक रामायण है। रामायणों की संख्या और दक्षिण-दक्षिणपूर्व एशिया में पिछले 2500 या अधिक वर्षों में इसके प्रभाव आश्चर्यजनक रहे हैं। तीन सौ रामायणों पर ए. के. रामानुजम का शोधपूर्ण लेख रामायण का समग्र इतिहास ,जो भारत और एशिया में पिछले 2500 सालों से अधिक समय में फैला हुआ है, को समझाने में सहायक है।वह तथ्यपरक ढंग से यह बताना चाहते हैं कि राम की कहानी में इतनी विभिन्नता कैसे आई।विभिन्न भाषाओं, समाजों, भौगोलिक स्थलों, धर्मों और ऐतिहासिक कालों में विभाजित इस कहानी को वह मुख्य पाँच कथाओं में केंद्रित मानते हैं।300 रामायणों की गिनती का शीर्षक में प्रयोग प्रो. कामिल बुल्के के शोध से लिया गया है।हालाँकि, रामानुजन रामायण के पाँच प्रारूपों को मान्य समझते हैं- वाल्मीकि, काम्बन, जैन धर्म, थाई Ramakein और दक्षिण भारतीय लोक कथाएँ। रामानुजम की मुख्य मान्यता यह है कि कोई मौलिक रामायण नहीं है और वाल्मीकि रामायण भी उन्हीं वाचिक रामायणों में से एक है जो प्रचलित हैं।

नवल किशोर प्रेस द्वारा मुद्रित सम्पूर्ण पुस्तक उन लोगों द्वारा पढ़ी या डाउनलोड की जा सकती है जो फारसी से जानते हैं -
https://bit.ly/2SoRgWq
इस विषय पर आधारित प्रारंग का अन्य लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

चित्र(सन्दर्भ):
1.
मुख्य चित्र में फ़ारसी रामायण का चित्र दिखाई दे रहा है। (Unsplash)
2. दूसरे चित्र में पर्शियन रामायण को दिखाया गया है। (Prarang)
3. तीसरे चित्र में फ़ारसी रामायण के कुछ संग्रह है। (Prarang, Wikipedia)
सन्दर्भ:
1.
https://m.tribuneindia.com/2002/20021109/windows/look.htm
2. https://bit.ly/2VSTXl2



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