क्या आने वाली पीढ़ी नहीं देख सकेगी लंबे दांतों वाले हाथियों को?

लखनऊ

 25-08-2020 01:56 AM
स्तनधारी

प्राचीन काल से ही हाथियों ने भारत की संस्कृति और परंपरा में एक विशेष स्थान प्राप्त किया है। उन्हें राजघरानों द्वारा परिवहन और युद्ध में साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। इसके अतिरिक्त भगवान गणेश के रूप में भी हाथी को हिंदू धर्म में पूजा जाता है। भारत दुनिया के 17 मेगाडाइवर्स (Megadiverse) देशों में से एक है, जहां दुनिया की 7-8% दर्ज प्रजातियां पायी जाती हैं। इन प्रजातियों में एशियाई शेर, एक सींग वाले राइनो (Rhino), बंगाल के बाघ इत्यादि शामिल हैं। ये सभी जीव न केवल भारत के पर्यावरण इतिहास का अभिन्न अंग हैं, बल्कि कई क्षेत्रीय संस्कृतियों को आकार देने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। वर्तमान समय में अर्थव्यवस्था के विकास या मानव की निजी जरूरतों के लिए इन जीवों का तेजी से बलिदान होता चला जा रहा है।
देश के 70% से भी अधिक लोगों के लिए, हाथी धार्मिक महत्व रखते हैं, लेकिन सबसे निराशाजनक बात तो यह है कि ये विशाल हाथी भी अवैध शिकारियों के चंगुल से नहीं बच पाए हैं। उनके सामने कई तरह के खतरे मौजूद हैं, जैसे कि उनकी वन श्रृंखलाओं का सिकुड़ना, निवास स्थान का विखंडन, शरीर के अंगों के लिए अवैध शिकार, बंदी बनाया जाना, मानवजनित दबाव आदि। आज भारत में लगभग 27,000 जंगली हाथी शेष बचे हैं, एक दशक पहले यह संख्या एक लाख से भी अधिक थी। जंगली हाथियों की इस आबादी में 98% तक गिरावट दर्ज की गयी है। भारत को दुनिया में एशियाई हाथियों की 50% से अधिक आबादी के लिए जाना जाता है। 1995 में स्थापित वन्यजीव एसओएस (SOS) ने भारत में प्रजातियों को बचाने के लिए 2010 में हाथियों के संरक्षण के लिए कार्य करना शुरू कर दिया था।
परियोजना के प्रारंभिक प्रयासों में भारत भर में बंदी हाथियों को बचाने पर ध्यान केंद्रित किया गया था। बंदी बनाए गए इन हाथियों को बंधक द्वारा की जाने वाली अत्यधिक क्रूरता का सामना करना पड़ता है और उनसे अत्यधिक परिश्रम करवाया जाता है और यदि वह बीमार हो जाते हैं, तो उन्हें मार दिया जाता है। इस प्रकार विभिन्न कारकों के कारण हाथियों की संख्या दिन प्रतिदिन घटती जा रही है। लखनऊ के चिडियाघर में भी हाथी देखने को मिलते थे, परंतु कुछ वर्षों पहले यहां के दो हाथियों को केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण द्वारा अन्य राष्ट्रीय उद्यान या अभयारण्य में भेज दिया गया था। उनका कहना था कि हाथियों को घूमने के लिए बहुत अधिक जगह की आवश्यकता होती है क्योंकि वे शाकाहारी होते हैं और यहां के चिड़ियाघर की स्थिति उनके लिए उपयुक्त नहीं है। वहीं एक आकलन के अनुसार, मार्च 2009 तक, पूरे देश में 26 चिड़ियाघरों और 16 सर्कसों में कुल 140 हाथी थे। हाथियों की घटती आबादी का मुख्य कारण है मनुष्यों द्वारा उनके बाहर के बड़े दांतों के लिए उनका अवैध रूप से शिकार किया जाना। हाथियों द्वारा अपने बड़े दांतों का उपयोग आमतौर पर दैनिक जीवन के अधिकांश कार्यों को करने के लिए किया जाता है। जैसे, जमीन से पानी या महत्वपूर्ण खनिजों को निकालने के लिए बड़े दांतों से खुदाई करना, रेशेदार भोजन को सुरक्षित रखने के लिए पेड़ों को छीलना और नरों द्वारा मादाओं के लिए प्रतिस्पर्धा करने में उपयोग करना। हाथी के बड़े दांत केवल उनके लिए ही उपयोगी नहीं होते हैं, बल्कि ये अन्य जानवरों के लिए भी महत्वपूर्ण हैं। हाथियों के बड़े दांत पेड़ों पर निर्भर रहने वाली छोटी प्रजातियों के लिए एक अहम भूमिका निभाते हैं, उदाहरण के लिए, कुछ छिपकली, हाथियों द्वारा खाए गए पेड़ों में घर बनाना पसंद करती हैं और उनके द्वारा बड़े दांतों से खोदे गए पानी का सेवन कई छोटी प्रजातियों द्वारा किया जाता है। लेकिन मनुष्य द्वारा बड़े दांतों के लिए हाथियों के निरंतर शिकार ने बिना बड़े दांत के कई हाथियों की आबादी में काफी वृद्धि कर दी है। इसका उदाहरण अफ्रीका (Africa) के मोजाम्बिक (Mozambique) में गोरोंगोसा नेशनल पार्क (Gorongosa National Park) से लिया जा सकता है। मोजाम्बिक के गोरोंगोसा नेशनल पार्क में भटकते हुए वृद्ध हाथियों ने गृहयुद्ध के अमिट चिह्नों को झेला है, जिसने देश को 15 साल तक जकड़ रखा था, और इसके परिणामस्वरूप बिना बड़े दांत वाले हाथियों का विकास होने लगा। दरसल युद्ध के दौरान इन बेजुबान जानवरों में से लगभग 90% का हथियार बनाने (हाथी के दांतों से) और योद्धाओं को मांस खिलाने के लिए शिकार किया जा रहा था। हाथियों के इस निरंतर शिकार में से केवल बिना बड़े दांत वाले हाथियों का समूह ही बचा हुआ है। वहीं हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि लगभग एक तिहाई मादा हाथियों में 1992 में युद्ध समाप्त होने के बाद पैदा हुई पीढ़ी में बड़े दांतों का विकास नहीं हुआ। आमतौर पर, मादा अफ्रीकी हाथियों में लगभग 2 से 4% तक ही बिना बड़े दांतों के होते हैं। दशकों पहले, गोरोंगोसा में लगभग 4,000 हाथी रहते थे। लेकिन ये संख्याएँ गृहयुद्ध के बाद तीन अंकों में घट गई। वहीं एक नए अप्रकाशित शोध से पता चलता है कि 200 ज्ञात वयस्क मादाएं, 51% जो युद्ध से बची थीं, लगभग 25 वर्ष या उससे अधिक उम्र के बिना बड़े दांतों वाली हैं। वहीं युद्ध के बाद पैदा हुई मादा हाथियों में से 32% बिना बड़े दांतों की हैं। बिना बड़े दांतों वाले हाथियों की यह प्रवृत्ति मोज़ाम्बिक तक सीमित नहीं है, बल्कि जिन देशों ने हाथी दांत के अवैध शिकार के इतिहास को देखा है, वहाँ मादा और उनके मादा बच्चों में यह बदलाव पाया जा रहा है। दक्षिण अफ्रीका में, प्रभाव विशेष रूप से चरम पर रहा है, एडो एलिफेंट नेशनल पार्क (Addo Elephant National Park) में 174 मादा हाथियों में से 98% मादा हाथी 2000 के दशक की शुरुआत में कथित तौर पर बिना बड़े दांत की थीं। साथ ही एशियाई हाथियों में, हाथी दांत के शिकार के लंबे इतिहास के साथ-साथ श्रम के लिए जंगली हाथियों को जंगल से अवैध रूप से ले जाने ने भी बिना बड़े दांतों वाले हाथियों की उच्च संख्या को बढ़ावा दिया है।
अवैध शिकार ने दक्षिणी केन्या (South Kenya) जैसे कुछ भारी शिकार वाले क्षेत्रों में भी हाथी के दांत के आकारों को काफी गंभीर रूप से प्रभावित किया है। ड्यूक यूनिवर्सिटी (Duke University) और केन्या वाइल्डलाइफ सर्विस (Kenya Wildlife Service) द्वारा 2015 में किये गए अध्ययन में 2005 और 2013 में हाथियों के दांत की तुलना 1966 और 1968 के समय के हाथियों के दांत से की और काफी चरितार्थ अंतर पाया। गहन अवैध शिकार के उस दौर में जीवित हाथियों के बड़े दांतों का आकार काफी छोटा हो गया था और यही स्वरूप उनके वंश में दिखाई देता गया। औसतन, 1995 के बाद पैदा हुए नर हाथियों के दांत 1960 के दशक के नर हाथियों की तुलना में 21% छोटे थे, और साथ ही उस अवधि की मादाओं की तुलना में मादा हाथियों के दांत 27% छोटे थे। मानव-प्रभावित बिना बड़े दांतों वाले हाथियों की ये प्रजाति स्वस्थ और अच्छे से जीवन व्यतीत करते हुए देखी गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बाधा के साथ हाथियों के महत्वपूर्ण अनुपात में परिवर्तन हो सकता है, जैसे कि कैसे हाथी और उनके व्यापक समुदाय व्यवहार करते हैं, और वे यह पता लगाना चाहते हैं कि क्या इन जानवरों में अन्य हाथियों की तुलना में बड़ी आवास सीमा है क्योंकि उन्हें खाद्य पदार्थों को खोजने के लिए अधिक जमीन को आवरण करने की आवश्यकता हो सकती है। हाथियों में देखे गए ये बदलाव कई प्रश्नों को भी उठाते हैं जैसे, वे कैसे रहते हैं, कितनी जल्दी चलते हैं, या वे कहाँ जाते हैं, अंततः क्या यह बदलाव हाथी के आस-पास के पारिस्थितिकी तंत्र को प्रभावित करेगा? इन सभी प्रश्नों के उत्तर की खोज के लिए पारिस्थितिकी और आनुवांशिक शोधकर्ताओं द्वारा अध्ययन करना शुरू कर दिया गया है। वहीं चीन और अमेरिका में हाथी दांत के व्यापार पर हालिया प्रतिबंधों से हाथी के दांत की मांग को कम करने में मदद मिली है।

संदर्भ :-
https://www.dnaindia.com/india/report-two-elephants-at-lucknow-zoo-to-go-to-wilds-1314135 https://www.nationalgeographic.com/animals/2018/11/wildlife-watch-news-tuskless-elephants-behavior-change/
https://www.cbsnews.com/news/african-elephants-are-evolving-to-not-grow-tusks-because-of-poaching/
https://www.downtoearth.org.in/blog/wildlife-biodiversity/world-elephant-day-india-s-jumbos-stare-at-a-worrying-future-66127

चित्र सन्दर्भ:
मुख्य चित्र में बड़े दांत (Tusk) के साथ अफ़्रीकी हाथी को दिखाया गया है। (Unsplash)
दूसरे चित्र में हाथी के बड़े दांतों को दिखाया गया है। (Picseql)
तीसरे चित्र में एक जंगली हाथी को उसके बड़े दांतों के साथ दिखाया गया है। (Pexels)
अंतिम चित्र में दक्षिण केन्या के हाथी को बड़े-बड़े दाँतों के साथ दिखाया गया है, जो अब लुप्तप्राय हैं। (Wallpaperflare)



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