अनेक उद्देश्यों को पूर्ण करने में सहायक है जंतुओं के शरीर की धारियां

लखनऊ

 07-09-2020 09:20 AM
शारीरिक

पृथ्वी पर पाये जाने वाले प्रत्येक जंतु की अपनी-अपनी विशेषताएं होती हैं, जिसके कारण वे अपने आप को वातावरण में समायोजित कर पाने में सक्षम हो पाते हैं। आपने ऐसे अनेक जंतु देखे होंगे, जिनके शरीर पर धारियां बनी होती हैं किंतु इसके पीछे छिपे कारण को आप शायद ही जानते होंगे। दरसल जंतुओं के शरीर पर पायी जाने वाली धारियां उन्हें वातावरण के साथ समायोजित होने में मदद करती हैं, जिससे वे अपने अस्तित्व को बनाए रखते हैं। उदाहरण के तौर पर बाघ, जो कि भोजन के लिए अन्य जंतुओं का शिकार करते हैं, के शरीर पर भी ये धारियां पायी जाती हैं, जो उन्हें अपने शिकार तक पहुंचने में मदद करती हैं। बाघ अपने शिकार पर हमला करने के लिए उसका पीछा करता है और इस दौरान उसे अपने आप को भी छिपाए रखना पड़ता है ताकि उसे देखकर दूसरा जीव भाग न जाए। उनका नारंगी रंग उन्हें घास और जमीन के आवरण के साथ मिश्रित करने में मदद करता है, लेकिन इससे वे एक बड़ी नारंगी गेंद के रूप में दिखायी देते, इसलिए काली धारियां इस संरचना के रंग को तोड़ देती हैं, जिससे उन्हें पहचान पाना मुश्किल हो जाता है। जंगल में अधिकांश जानवर और यहां तक मानव भी रंगों और आयामों को नहीं देख पाता है। इसलिए एक ठोस वस्तु को देखना बहुत आसान हो जाता है।

बाघ की धारियों के काले, सफेद, और भूरे रंग, अन्य जानवरों जिनका वे शिकार करते हैं, के लिए छाया की तरह कार्य करते हैं और इससे बाघ को शिकार करने में अत्यधिक लाभ होता है। ऐसा आवश्यक नहीं है कि जंतुओं के शरीर की धारियां केवल छलावरण बनाने का ही काम करती हैं। धारियों का उनके जीवन में और भी महत्व है। कुछ जंतु ऐसे हैं जिनके शरीर की धारियां भले ही उन्हें शिकार करने में मदद न करें लेकिन अन्य उद्देश्यों की पूर्ति अवश्य ही करती हैं। उदाहरण के लिए जेबरा (Zebra) के शरीर की मोटी, काली धारियां उन्हें मध्य अफ्रीका की भीषण गर्मी में ठंडा रखने में सहायता करती हैं। कई अफ्रीकी जानवरों के शरीर पर धारियां होती हैं, लेकिन किसी का भी पैटर्न (Pattern) ज़ेबरा की तरह नहीं है। ज़ेबरा के अद्वितीय काले और सफेद आवरण के उद्देश्य को समझाने के लिए शोधकर्ताओं ने लंबे समय तक संघर्ष किया है। कुछ लोगों ने सुझाव दिया है कि धारियाँ जेबरा को छलावरण में मदद कर सकती हैं और शेरों और अन्य शिकारियों से उन्हें बचा सकती हैं। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि धारियां बीमारी फैलाने वाली मक्खियों को भी जेबरा से दूर रखती हैं। साथ ही धारियां ज़ेबरा के शरीर पर छोटे-छोटे उभारों को उत्पन्न करके शरीर की ऊष्मा को नियंत्रित करती हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने इन स्पष्टीकरणों का परीक्षण किया, और तर्क दिया कि, धारियां जेबरा के लिए अनेक उद्देश्यों को पूर्ण करती हैं।

उल्लेखनीय रूप से, सांख्यिकीय विश्लेषण यह बताता है कि धारियां शरीर को मक्खियों के काटने से बचाता हैं, मुख्य रूप से मक्खियों की आंखों की संरचना के कारण। मक्खियों में इंसान के समान संयुक्त (Compound) आंखों का एक समूह होता है, लेकिन चीजों को देखने का तरीका उससे बहुत अलग है। मक्खियों की अधिकांश प्रजातियां गति, आकार और यहां तक कि रंग का भी पता लगा सकती हैं। हालांकि, वे अपनी आंखों में शंकु (Cones) और छड़ (Rods) का उपयोग नहीं करती हैं। इसके बजाय, उन्होंने छोटे व्यक्तिगत दृश्य रिसेप्टर्स (Receptors) विकसित किए हैं, जिन्हें ओम्माटिडिया (Ommatidia) कहा जाता है। मक्खी की प्रत्येक यौगिक आंख में हजारों ओम्माटिडिया होते हैं, जो मक्खी के लिए दृष्टि का एक बहुत व्यापक क्षेत्र बनाते हैं। हमारी आँखें मांसपेशियों से जुड़ी होती हैं, जो कि हमारी आँखों को स्थानांतरित कर सकती हैं जबकि मक्खी की आंख स्थिर होती है और वह हिल नहीं सकती। प्रत्येक ओम्माटिडिया विभिन्न दिशाओं से जानकारी एकत्र और संसाधित करता है। इसका मतलब है कि मक्खी एक बार में कई अलग-अलग दिशाओं में देख सकती है और इसका मस्तिष्क एक ही समय में इस जानकारी को संसाधित कर सकता है। ज़ेबरा के शरीर का धारीदार पैटर्न मक्खी की आंख के लिए ऑप्टिकल (Optical) भ्रम का एक प्रकार है क्योंकि मक्खी पैटर्न पर ध्यान केंद्रित करने और उसे देखने में असमर्थ होती है। वास्तव में, एक ज़ेबरा पर काली और सफेद धारियों का पैटर्न एक विकासवादी अनुकूलन है, जो जानवरों के लिए लाभदायी है। उत्तरी उत्तर प्रदेश में स्थित दुधवा राष्ट्रीय उद्यान में ऐसे कई बाघ हैं, जिनके शरीर पर धारियां हैं। यह राष्ट्रीय उद्यान 190 वर्ग किलोमीटर के बफर ज़ोन (Buffer Zone) के साथ 490.3 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैला है, जो बाघों के लिए महत्वपूर्ण निवास बनाता है। यह खीरी और लखीमपुर जिलों में दुधवा टाइगर रिजर्व (Dudhwa Tiger Reserve) का हिस्सा है, जो कि भारत-नेपाल सीमा पर स्थित है। यह विविध और उत्पादक तराई पारिस्थितिकी तंत्र के कुछ शेष क्षेत्रों में से एक का प्रतिनिधित्व करता है, जो कि कई लुप्तप्राय प्रजातियों, गीले घास के मैदानों की प्रजातियों आदि का समर्थन करता है। दुधवा, 1879 में एक बाघ अभयारण्य बना।

संदर्भ:
http://www.tigerfdn.com/why-do-tigers-have-stripes/
https://www.livescience.com/49447-zebras-stripes-cooling.html
https://curiosity.com/topics/why-do-so-many-animals-have-stripes-curiosity/
https://www.thoughtco.com/evolution-explains-zebra-stripes-1224579
https://en.wikipedia.org/wiki/Tiger
https://en.wikipedia.org/wiki/Dudhwa_National_Park
चित्र सन्दर्भ :
मुख्य चित्र में ज़ेबरा और बाघ के चित्रों को दिखाया गया है। (Prarang)
दूसरे चित्र में बाघ के शरीर पर उपस्थित धारियों को दिखाया गया है। (Pexels)
तीसरे चित्र में ज़ेबरा के शरीर की धारियां दिखाई गयी हैं। (Pikist)



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