राष्ट्र एकता बनाने में नागरिक धर्म की भूमिका

लखनऊ

 22-10-2020 05:12 PM
विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

विश्व भर में लोगों को संगठित रखने में धर्म की निश्चित रूप से महत्वपूर्ण भूमिका रही है। धर्म की वजह से ही कई प्राचीन सभ्यताएं प्राचीन काल से अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही हैं। धर्म प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक सभी स्तरों पर प्रभावित करता है और साथ ही धर्म किसी भी समाज में एकजुटता का एहसास भी दिलाता है। वास्तव में सभी धर्म हमें ईश्वर या सत्य को समान रूप से दिखाते हैं, धर्मों के बीच बाहरी अंतर केवल आकस्मिक हैं, जबकि उनका आंतरिक भाग एक चीज में निहित है - दिव्य या उच्चतर वास्तविकता के ज्ञान में। सत्य का हिस्सा कला, विज्ञान और मानव संस्कृति के गैर-धार्मिक घटकों में मौजूद है। हिंदू धर्म का सामान्य सिद्धांत सर्व धर्म समभाव है, जिसका शाब्दिक अर्थ है कि सभी धर्म समान हैं और एक दूसरे के साथ सामंजस्य स्थापित कर सकते हैं।
बहाई (Bahá'í) मतों के अनुसार दुनिया के सभी मानव धर्मों का एक ही मूल है। इसके अनुसार कई लोगों ने ईश्वर का संदेश इंसानों तक पहुँचाने के लिए नए धर्मों का प्रतिपादन किया, जो उस समय और परिवेश के लिए उपयुक्त था। इस सार्वभौमिक दृष्टिकोण के अनुसार, मानवता की एकता बहाइयों की केंद्रीय शिक्षाओं में से एक है। बहाई शिक्षाओं में कहा गया है कि चूंकि सभी मनुष्यों को भगवान ने बनाया है, इसलिए भगवान जाति, रंग या धर्म के संबंध में लोगों के बीच कोई अंतर नहीं करते हैं, इसलिए सभी को समान अवसर और उपचार की आवश्यकता है। इसलिए बहाई का दृष्टिकोण मानवता की एकता को बढ़ावा देता है, और बताता है कि लोगों की दृष्टि विश्वव्यापी होनी चाहिए और लोगों को अपने धर्म के साथ साथ पूरी दुनिया से प्रेम करना चाहिए। सभी धर्मों में एक सामान्य आदर्श है, भगवान की पूजा, और सभी धर्म एक ही चीज बताते हैं कि इस विश्व में केवल एक ही भगवान है। मंदिर, चर्च, मस्जिद, विहार एक दूसरे से भिन्न हो सकते हैं। उनमें मूर्ति या प्रतीक भी एक समान नहीं हो सकता है और उनमें किए गए संस्कार अलग हो सकते हैं, लेकिन यहाँ ईश्वर एक ही है। सभी धर्मों का लक्ष्य लोगों को संबंधित परम भक्तों की अलग-अलग विशेषताओं के अनुसार एक ही परमात्मन तक ले जाना है।

महात्मा गांधी भी धर्म के प्रतीकों और तीर्थ स्थलों को राष्ट्रीय एकता के एक बड़े कारक के रूप में देखते थे। महात्मा गांधी का सभी धर्मों की एकता पर दृष्टिकोण को उनके द्वारा दिए गए निम्न उद्धरण में देख सकते हैं: “सत्य और धार्मिकता से बढ़कर कोई धर्म नहीं है।
गांधी, (1957), पृष्ठ 254”
“धर्म मनुष्य को भगवान और मनुष्य को मनुष्य से बांधता है।
हरिजन, 4-5-40, पृष्ठ 117”
“धर्म जो व्यावहारिक मामलों की कोई गिनती नहीं करता है और उन्हें हल करने में मदद नहीं करता है, कोई धर्म नहीं है।
यंग इंडिया (Young India), 7-5-25, प्रष्ठ 164”

नागरिक धर्म संस्कृति के साझा मूल्यों को राष्ट्रीय एकता की भावना में आकार देने में योगदान देता है। इस प्रकार, नागरिक धर्म एक धर्मनिरपेक्ष बहुलतावादी समाज को लाभान्वित करता है क्योंकि यह लोकतंत्र के पवित्र कसौटी को व्यक्त करने का एक साधन बन जाता है। इस संबंध में, धर्म को नागरिक माना जाता है क्योंकि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का उत्पादन और समर्थन करता है। नागरिक धर्म एक देश को काफी लाभान्वित करता है। यह एक और अधिक एकीकृत राष्ट्रीय पहचान बनाने के प्रयास में योगदान देता है, जिससे द्विध्रुवीय होने की प्रवृत्ति को दूर किया जा सके। नागरिक धर्म महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण की क्षमता है, जो सांस्कृतिक अखंडता के अनुरूप है, इस प्रकार राष्ट्रीय उपयोगिता की भावना उत्पन्न करता है।

संदर्भ :-
https://en.wikipedia.org/wiki/Bah%C3%A1%CA%BC%C3%AD_Faith_and_the_unity_of_religion
https://www.mkgandhi.org/voiceoftruth/unityofallreligions.htm
https://www.jstor.org/stable/20752875?seq=1

चित्र सन्दर्भ:
पहली छवि से पता चलता है कि सभी धर्म अपने मूल में एक हैं।(hindu human rights)
दूसरी छवि सर्व धर्म समभाव को दर्शाती है।(hindu human rights)


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