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बहुपतिप्रथा व्यवहार वाला एक विशेष पक्षी - कांस्य पंख वाले जाकाना

लखनऊ

 27-02-2021 10:02 AM
पंछीयाँ
हमारे आसपास ना जाने कितने ही प्रकार के पक्षी रहते हैं। वैसे आपने कई तरह के पक्षियों को देखा ही होगा पर आप खुद ही नहीं जानते होंगे कि आपने अब तक पक्षियों की कितनी प्रजातियों को देखा है। इनकी सुन्दर और रंगीन बनावट के कारण ये सभी का मन मोह लेते हैं। ऐसा ही एक सुन्दर पक्षी है जो एक अपनी एक अलग पहचान रखता है। ये इतना सुन्दर है कि इनके बारे में जानने के बाद आप अपने जीवन में इसे एक बार जरूर देखना चाहेंगे। हम बात कर रहे है कांस्य पंख वाले जाकाना (Bronze-Winged Jacana) की, इनके पंखों का कांस्य रंग और इनके शरीर की बनावट इनको सुन्दरता प्रदान करती है। इसे वैज्ञानिकों द्वारा मेटोपिडियस इंडिकस (Metopidius Indicus) नाम दिया गया है, जोकि जाकनिडी (Jacanidae) परिवार का एक बगुला है। यह पक्षी दक्षिण और दक्षिण पूर्व एशिया में पाया जाता है, जो वंश मेटोपिडियस (Metopidius) की एकमात्र प्रजाति है। अन्य जाकानाओं की तरह यह भी तैरती हुई जलीय वनस्पति पर विचरण करता है, इस पक्षी की मुख्य विशेषता यह है कि इसके पैर तथा पैरों की उंगलियां बहुत लम्बी होती हैं जोकि पानी में इसके वजन को फैलाती है और डूबने से बचाते हैं, ये इनको जलीय वनस्पति में विचरण करने के लिए संतुलन प्रदान करती है।

लखनऊ में भी इन पक्षियों को जलीय वनस्पति की सतह पर विचरण करते देखा जा सकता है। कांस्य पंख वाले जाकाना को 1790 में पक्षी विज्ञानी जॉन लैथम (John Latham) द्वारा औपचारिक रूप से वर्णित किया गया था और द्विपद नामपद्धति (binomial name) में पार्रा इंडिका (Parra Indica) नाम दिया गया था। उन्होंने इसे अन्य सभी जाकानों के साथ जीनस पार्रा (Parra) में रखा। इसके बाद 1832 में जर्मन प्राणी विज्ञानी जोहान जॉर्ज वैगलर (Johann Georg Wagler) द्वारा इसे इसकी विशेषताओं के कारण मेटोपिडियस वंश में रखा गया। यह प्रजाति व्यापक रूप से भारतीय उपमहाद्वीप (लेकिन श्रीलंका या पश्चिमी पाकिस्तान नहीं) और दक्षिण पूर्व एशिया में कम ऊंचाई वाले स्थानों पर पायी जाती है। ये पानी में जलकुंभी जैसे खरपतवारों से घिरे दलदली क्षेत्रों का उपयोग करने में सक्षम होते हैं और प्रजनन के समय ये इपोमिया एक्वाटिका (Ipomoea Aquatica) द्वारा प्रदान किए गए आवरण का उपयोग करते हैं। ये पक्षी मुख्य रूप से भोजन के लिए पौधों पर निर्भर रहते हैं, परंतु तैरती हुई जलीय वनस्पति या पानी की सतह से कीड़ो और अन्य अकशेरुकीय जीवों का शिकार भी कर लेते हैं। विभिन्न गतिविधियों के लिए ये पक्षी सीक-सीक-सीक (Seek-Seek-Seek) की ध्वनि उत्पन्न करते हैं और जब भी इन्हें खतरा महसूस होता है तो ये पानी में खुद को डूबा कर छिपा लेते हैं।
कांस्य-पंख वाले ये पक्षी शरीर में बड़े तथा छोटी पूंछ वाले होते हैं, जोकि कुछ दूरी से देखने पर काले रंग के दिखाई देते हैं (सुपरसिलियम (Supercilium) को छोड़कर)। ये पक्षी लगभग 29 सेंटीमीटर तक बढ़ सकते हैं। नर और मादा पक्षी समान होते हैं, किंतु मादा पक्षी नर पक्षी से थोड़ी बड़ी होती हैं और इनमें बहुपतिप्रथा (polyandrous) पाई जाती है। इनके पंख हरे रंग की चमक के साथ कांस्य रंग के होते हैं जबकि सिर, गर्दन और स्तन प्रायः काले रंग के होते हैं तथा आंख से गर्दन के पीछे तक थोड़ा हिस्सा सफ़ेद रंग का होता हैं। अन्य जाकानाओं की तरह इसमें 10 पूंछ के पंख होते हैं और तेल ग्रंथि (Oil Gland) गुच्छेदार होती है। इन पक्षियों की पूंछ काले टर्मिनल बैंड (terminal band) के साथ मोटी और लाल-भूरे रंग की होती है, जबकि चोंच हरे-पीले रंग की होती है जिसका आधार और ऊपरी जबड़ा (Upper Mandible) लाल होता है। इसका ललाट लाल बैंगनी रंग का और पैर हरे होता है, जिनमें उंगलियां लंबी और सीधी तथा नाखून उंगली की तुलना में लंबे होते हैं। युवा पक्षियों में ऊपरी भाग भूरे रंग का और सिर पर एक मुकुट होता है और ये जलीय वनस्पतियों पर अकेले या जोड़े में विचरण करते है।
इनमें अंडों को सेने तथा स्थानों की रक्षा करने का कार्य नर पक्षी को सौंपा जाता है। संकट या भय की स्थिति में नर पक्षी युवा पक्षियों को अपने पंखों के नीचे रखकर इधर-उधर ले जाने में सक्षम होते हैं। वजनी नर पक्षी अपने पंखों को फैलाकर तथा गर्दन को खींचकर अन्य नर पक्षियों से अपने क्षेत्र की रक्षा करते हैं। क्षेत्र के रखरखाव की गतिविधियाँ लगभग 9 से 11 बजे तक होती है। ये अपना घोंसला जलीय वनस्पति में मौजूद पिस्टिया (Pistia), निम्फाइड्स (Nymphoides), हाइड्रिला (Hydrilla) आदि के पत्तों पर बनाते हैं, परन्तु ये अंडे कमल के पौधे के पत्तों पर भी दे सकते हैं। अंडे बहुत ही शंक्वाकार, अनियमित काले ज़िग-ज़ैग (Zig-Zag) चिह्नों के साथ चमकदार भूरे रंग के होते हैं, जोकि 29 दिनों में तैयार हो जाते हैं। जब ये बच्चे लगभग दस सप्ताह के हो जाते हैं, तो वे अपने पिता से स्वतंत्र हो जाते हैं। इनमें प्रजनन का मौसम बारिश के बाद शुरू होता है (भारत में जून से सितंबर तक, लेकिन राजस्थान में मार्च में होने वाली बारिश में प्रजनन होता है)।
इनकी एक अन्य विशेषता यह है कि ये पक्षी विपरीत लिंग भूमिकाएं प्रदर्शित करते हैं, जैसे मादा आकार में बड़ी तथा पॉलीएंड्रस (Polyandrous) होती है। पॉलीएंड्रस एक संभोग पैटर्न (Pattern) है, जिसमें मादा पक्षी एकल प्रजनन काल में एक से अधिक नर के साथ संभोग करती हैं। अपने अंडों के समूह को सेने (Incubate) तथा अन्य मादा पक्षियों से प्रतिस्पर्धा करते हुए वे नर पक्षियों के लिये हरम (Harem) भी बनाती है। एक हरम में एक या चार नर पक्षी हो सकते हैं। मादा पक्षी अपने-अपने क्षेत्रों का निर्माण भी करती है। प्रत्येक महिला क्षेत्र में एक से चार नर उनके व्यक्तिगत क्षेत्र के साथ शामिल होते हैं। अपने क्षेत्रीय पुरुषों के अलावा, मादा अन्य पुरुषों के साथ भी संभोग कर सकती हैं। नर मादाओं का ध्यान आकर्षित करने के लिये चिल्लाहट (Yelling) की आवाज निकालते हैं। मादाएं नर की गुणवत्ता का आकलन करने के लिये इसी चिल्लाहट की आवाज का सहारा लेती है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3uEA5BJ
https://bit.ly/3dKyowd
https://bit.ly/3aS3TCG
https://bit.ly/2ZQgDDC

चित्र संदर्भ:
मुख्य तस्वीर में कांस्य पंख वाले जाकाना को दिखाया गया है। (विकिमीडिया)
दूसरी तस्वीर में दिखाया गया है कि कांस्य पंख वाले जाकाना कहाँ पाया जाता है। (विकिमीडिया)
तीसरी तस्वीर में कांस्य पंख वाले जाकाना को उड़ते हुए दिखाया गया है। (flicker)


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