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खेल-खेल में अर्थव्यवस्था सुधारने का नुस्खा।

लखनऊ

 25-03-2021 10:10 AM
हथियार व खिलौने
जब हम खिलौनों की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में एक ऐसे बच्चे का चित्र उभरता है, जो कुछ अलग-अलग प्रकार की आकृतियों से खेल रहा होता है। और बेहद उत्सुकता से उन्हें जोड़ और तोड़ रहा है। परन्तु क्या खेल-खिलौने केवल बचपन के मोहताज है। बिल्कुल नहीं! खिलौने हर वर्ग, हर उम्र के व्यक्ति के लिए हो सकते है। ये बात अलग है कि बढ़ती उम्र के साथ वो खिलौने थोड़ा जटिल और कीमती होने लगते है। जहां बच्चों के खिलोने गुड्डा-गुड्डी अथवा कोई खास प्रकार की ध्वनि निकलने वाला यन्त्र होता है। वही उम्र में बड़े लोगों के लिए कंप्यूटर गेम, उनकी नयी कार इत्यादि खिलोने की श्रेणी में आते हैं। खिलौने किसी भी बच्चे के शारीरिक और मानसिक विकास का एक बेहद अहम पहलू होते हैं। कुछ खिलौने शारीरिक तथा कुछ मानसिक चुनौती देते हैं। और यह बात तो हम सभी जानते है की चुनौतियां हमें परिपक्वा बनाती हैं। यहाँ हम ऐसे खिलौनों के बारे में जानेंगे जो छोटे बच्चों के लिए बनाए गए हों।
यूँ तो खिलौने पूरी दुनिया में बेहद प्राचीन काल से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। लेकिन भारत में खिलौनों का इतिहास बहुत प्राचीन है। इनके उत्पादन में भारत का अपना इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। पुरात्तव विभाग को लगभग 5000 हजार साल पुराने खिलौने भारत के बहु-गोलीय क्षेत्रों में मिले हैंहड़प्पा और मोहन जोदड़ो जैसी बेहद समृद्ध और प्राचीन सभ्यताओं से गुद्दा-गुड़िया, नृत्यांगनाओं, छोटी गाड़ियों आदि खिलोनों के अवशेष मिले हैं। जिससे स्पष्ट हो जाता है, की हमारे देश में कई दशकों पहले भी खिलौने बेहद प्रचलन में थे। और तब भी बच्चों के लिए खासा महत्वपूर्ण रखते थे।
यह ज़रूरी नहीं है कि खिलौने केवल बच्चों के मनोरंजन हेतु बनाये गए हो। ये किसी भी देश अथवा संस्कृति को बचाये रखते हैं। प्राचीन समय से ही लोग खिलोनो के माध्यम से अपने संस्कृति और पहनावे को खेल-खेल में मनोरंजक तरीके से अगली पीढ़ी या अन्य संस्कृति में प्रसारित करते हैं। रामायण और महाभारत के पात्रों का रूप आज भी खिलौनों को दिया जाता है। ताकि लोग उनके गुणों और आकार को आसानी से समझ सकें। आज भी कठपुतलियों का चलन कई जगहों पर सामान्य है। कठपुतली एक स्पष्ट उदाहरण है कि किस तरह से मनोरंजन रूप में खिलौने द्वारा किसी संस्कृति का विस्तार किया जाता है।
कुछ समय पहले तक खिलौना उत्पादन में भारत के सामने चीन से आयात होने वाले खिलौने एक चुनौती बने हुए थे। चीन से खरीदा जाने वाला खिलौना सस्ता तो मालूम होता है। परंतु यह बिलकुल भी टिकाऊ नहीं होता है। साथ ही इसे बनाने में जिन केमिकल्स का इस्तेमाल होता है, वह छोटे बच्चों की सेहत के लिए बेहद हानिकारक साबित हो सकते हैं। इसी प्रकार की कई अन्य दिक्कतों का हवाला देते हुए भारत सरकार ने चीन से निर्यात होने वाले खिलौनों पर रोक लगा दी। रोक लगाने की देर थी कि यहां भारत का खिलौना उद्योग चमक उठा। भारत में उत्पादित होने वाले खिलौने टिकाऊ भी होते है। साथ ही बदलते समय के साथ इन्हें बच्चों के लिए रुचिकर भी बनाया जा रहा है। और कारीगर इस बात का भी खासा ख्याल रख रहे है, कि खिलौने ग्राहकों के लिए सुलभ और सस्ते हो ताकि गरीब वर्ग का व्यक्ति भी उनका खर्च आसानी से वहन कर सके।
राज्य उत्तर प्रदेश में व्यापारियों में नयी रौनक है। वाराणसी और मिर्ज़ापुर जो की उत्तर प्रदेश के प्राचीनतम शहरों में से एक है। अपने लाह के बर्तनों और खिलौनों के कारण जाना जाता है। यहाँ बनाने वाले खिलौने प्राकर्तिक लकड़ी से बनाये जाते हैं। ये रंगीन खिलौने बेहद आकर्षक होते है बच्चो को भी लुभाते हैं। लकड़ी के शिल्प कला और नक्काशी में उत्तर प्रदेश के चित्रकूट का कोई शानी नहीं है। यहाँ बनने वाले खिलौने पारंपरिकता और आधुनिकता के चित्रित उदाहरण होते हैं। खिलोनो की बढ़ती मांग की आपूर्ति अगर देश के ही अलग-अलग राज्यों से की जाये तो यह राज्यों की अर्थव्यस्था में एक मजबूत स्तम्भ की भांति खड़ा हो सकता है। साथ ही देश में व्याप्त बेरोज़गारी को कुछ हद तक कम भी कर सकता है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3sxCOvj
https://eoivienna.gov.in/?pdf11699?000
https://bit.ly/31h44SM

चित्र संदर्भ:
मुख्य चित्र में ओडिशा शिल्प संग्रहालय में लकड़ी के खिलौने दिखाए गए हैं। (विकिमीडिया)
दूसरी तस्वीर में एक व्यक्ति को लकड़ी के खिलौने बेचते हुए दिखाया गया है। (फ़्लिकर)
तीसरी तस्वीर में लकड़ी के खिलौने दिखाया गया है। (फ़्लिकर)


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