नृत्य- एक पारंपरिक और धार्मिक अभ्यास

लखनऊ

 06-05-2021 09:25 AM
ध्वनि 1- स्पन्दन से ध्वनिद्रिश्य 2- अभिनय कला द्रिश्य 3 कला व सौन्दर्य विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

यह तो हम सभी जानते हैं कि कला के विभिन्न स्वरूप होते हैं और नृत्य उनमें से एक है। नृत्य को कला के साथ-साथ साधना, योग और अनुशासन से भी जोड़ कर देखा जाता है। अलग-अलग देशों में नृत्य के अलग-अलग प्रकार मौजूद हैं जो वहाँ की जीवन-शैली और धार्मिक मान्यताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं और अपनी-अपनी सांस्कृतिक पहचान को दर्शाते हैं। नृत्य प्राचीन काल से ही अस्तित्व में है जिसका वर्णन कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। लुप्त हुई मानव सभ्यताओं के प्राप्त हुए अवशेषों में भी उस समय के नृत्य के प्रमाण खोजे गए हैं। उदाहरण के लिए भारत में मिले लगभग 5,000 साल पुराने भीमबेटका (Bhimbetka) शैल आश्रयों के चित्रों,सिंधु घाटी सभ्यता की दीवारों के अवशेषों,और मिस्र के पिरामिडों (Pyramids) पर बनी विभिन्न प्रकार के नृत्य-अवस्थाओं और नर्तकों की चित्रकारी इस बात का सबूत हैं कि उस काल में भी नृत्य लोगों के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा था।

समारोह और अनुष्ठानों आदि में नृत्य विशेष भूमिका निभाते थे। नृत्य मनोरंजन के एक साधन के अलावा पारंपरिक रीति-रिवाजों को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का एक अच्छा माध्यम माना जाता था। कुछ मिथकों के अनुसार नृत्य का उपयोग कभी-कभी विपरीत लिंग के प्रति अपनी भावनाएँ व्यक्त करने के लिए भी किया जाता था। वैसे तो नृत्य से जुड़ी कई पांडुलिपियाँ प्राप्त हुई हैं परंतु नृत्य-कला का विस्तृत अध्ययन प्राचीन भरत मुनि द्वारा रचित नाट्यशास्त्र में मिलता है।नृत्य-अभिनय की जटिल तकनीकों, साथ ही रस और भाव प्रणालियों को नाट्यशास्त्र में संहिताबद्ध किया गया है। इसलिए इस शास्त्र को सबसे प्राचीन और बड़ा शास्त्र माना जाता है।


हिंदू शास्त्र के अनुसार सम्पूर्ण ब्रह्मांड में नृत्य की उत्पत्ति भगवान शिव के एक रूप नटराज के नृत्य के साथ हुई।हिंदू धर्म में नृत्य एक मंदिर के धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा हुआ करता था, विशेष रूप से दक्षिण और पूर्वी भारत में, जहाँ पुजारिन या देवदासियां नृत्य के माध्यम से ईश्वर की अराधना करती थीं। समय के साथ मंदिर नृत्य ने दक्षिण भारतीय शास्त्रीय नृत्य-कला का रूप ले लिया जिसे आज भी हिंदू धर्म के कई कर्मकांडों का हिस्सा होने के कारण पवित्र समझा जाता है।
ईसाई धर्म में नृत्य का विशेष महत्व है। यह हमेशा से कई ईसाइयों के सामाजिक जीवन का हिस्सा रहा है लेकिन साथ ही यह लंबे समय से चर्च (Church) में विवादास्पद भी रहा है। ईसाई गीत बॉलरूम (Ballroom), कंट्री (Country), रॉक एंड रोल (Rock & Roll), लैटिन (Latin), नाइट क्लब (Night Club) और बैलीडांस (Bellydance) सहित अन्य नृत्य और संगीत कई वर्षों से एक-दूसरे से जुड़े हैं। पारंपरिक नृत्य के कई उदाहरण आधुनिक रोमन (Roman) और कैथोलिक (Catholic) समुदायों में मिल सकते हैं।
सेंगमु (Seungmu) एक कोरियाई (Korean) नृत्य है जो बौद्ध भिक्षुओं द्वारा प्रस्तुत किया जाता है। यह सबसे प्रसिद्ध कोरियाई पारंपरिक नृत्यों में से एक है और 1969 में इसे दक्षिण कोरिया के महत्वपूर्ण अमूर्त सांस्कृतिक संपत्ति संख्या 27 के रूप में नामित किया गया था।
सिंह नृत्य चीनी (Chinese) संस्कृति और अन्य एशियाई देशों में पारंपरिक नृत्य का एक रूप है जिसे सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है जिसमें कलाकार शेर की चाल की नकल करते हैं। यह नृत्य आमतौर पर चीनी नव वर्ष, अन्य चीनी पारंपरिक, सांस्कृतिक और धार्मिक त्योहारों, व्यवसायिक उद्घाटन कार्यक्रमों, विशेष समारोहों जैसे शादी जैसे महत्वपूर्ण अवसरों पर प्रस्तुत किया जाता है।
यहूदी धर्म से जुड़ा यहूदी नृत्य खुशी और अन्य सांप्रदायिक भावनाओं की अभिव्यक्ति का एक माध्यम माना जाता है। इस्लाम धर्म में नृत्य को लेकर अलग-अलग विचार हैं, लेकिन घेरे में किया जाने वाला नृत्य इस्लामी हाड़ा नृत्यों का हिस्सा है।मुस्लिम धर्म में सूफ़ी (Sufi) और दरवेश (Darvesh) नृत्य का महत्वपूर्ण स्थान है। इसे अहंकार त्याग कर प्रेम, भक्ति और सेवा की भावना से जुड़ा माना जाता है। जो ईश्वर तक पहुँचने का एक माध्यम है।रूमी (Rumi) द्वारा स्थापित मेवलेवी ऑर्डर (The Mevlevi Order) की परंपरा में, भक्तों द्वारा समा (पूजा समारोह) के भीतर परमानंद सूफी भँवर का अभ्यास किया जाता है।
20 वीं शताब्दी में, पवित्र नृत्य को बर्नहार्ड वोसियन (Bernhard Wosien) जैसे कोरियोग्राफरों (choreographers) द्वारा सामुदायिक भावना के विकास के एक साधन के रूप में पुनर्जीवित किया गया। नृत्य के पारंपरिक रूप को देख कर यह कहा जा सकता है कि नृत्य मात्र मन की प्रसन्नता व्यक्त करने का माध्यम नहीं बल्कि यह साधना का एक ऐसा रूप है जो साफ-सुथरी वेश-भूषाधारण किए प्रशिक्षित नर्तकों द्वारा प्रस्तुत किया जाता है जिन्होंने नियमित अभ्यास से संगीत, भाव और चाल को एक सूत्र में पिरोया है। फिर चाहे वह कोई धार्मिक पर्वहो या ओलंपिक खेलों (Olympic games) का अयोजन या समापन समारोह।साथ ही, नर्तक को एक अनुशासित कलाकार की संज्ञा दी जाती है।इसमें नर्तक के शरीर के प्रत्येक अंग और उनकी एक-एक हरकत को सटीक और सुव्यवस्थित ढंग से प्रस्तुत किया जाना आवश्यक होता है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3gY727I
https://bit.ly/33bzBGp
https://bit.ly/3tdRgbg
https://bit.ly/3eJQmxU

चित्र संदर्भ :-
1.नटराज का एक चित्रण (Pexels)
2.भीमबेटका का एक चित्रण (Wikimedia)
3 .नटराज का एक चित्रण (Wikimedia)


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