अपने उत्तम इत्र के लिए विशेष रूप से जाना जाता है लखनऊ

लखनऊ

 27-05-2021 09:32 AM
म्रिदभाण्ड से काँच व आभूषण

लखनऊ की संस्कृति बहुत परिष्कृत और उत्कृष्ट है,जिसे अपने उत्तम इत्र के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है।इत्र फारसी शब्द 'अत्र' से व्युत्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ है सुगंध। लखनऊ में इत्र या अत्तर का प्रयोग 19वीं शताब्दी से होता आ रहा है। ऐसा कहा जाता है कि मुगल साम्राज्ञी, नूरजहाँ (Nur Jahan) गुलाब जल से सुगंधित पानी में स्नान करती थी, और इस प्रकार लोगों को फूलों से सुगंधित तेल निकालने के लिए प्रोत्साहित करती थी। माना जाता है, कि सुगंध प्राप्त करने के लिए प्राकृतिक पदार्थों का उपयोग करने की शुरूआत तपस्वियों द्वारा की गयी थी,जिन्होंने आग के समक्ष अपने ध्यान के दौरान पौधों की जड़ों और अन्य भागों को आग में जलाया। इस प्रकार एक महक उत्पन्न होती थी, जो कुछ समय के लिए बनी रहती थी। यह सुगंध आस-पास के ग्रामीणों को फूलों के साथ प्रयोग करने के लिए प्रेरित करती थी। जब लोगों ने इत्र बनाना सीख लिया, तब उन्होंने इसे नवाबों के सामने पेश किया।नवाबों के महल में जब भी कोई मेहमान आता,तो उसके आने से पूर्व महल के हॉल और अन्य हिस्सों में सुगंधित इत्रों का छिड़काव कर दिया जाता। चूँकि,इत्र में चिकित्सीय गुण भी होते हैं, इसलिए सार्वजनिक स्थानों पर इनका छिड़काव स्वास्थ्य सम्बंधी आराम भी देता है।
भारत में इत्र का विस्तार मुख्य रूप से तब किया गया, जब आनंद तथा विलासपूर्ण जीवन जीने के लिए इत्र बनाने की कला का विकास हुआ। इसमें 15वीं शताब्दी के एक शासक की विशेष भूमिका रही, जो एक अच्छे जीवन में विश्वास करता था।सन् 1469 में जब घियाथ शाही, मालवा सल्तनत का शासक बना, तब उसने दुनिया के सारे सुख प्राप्त करने का फैसला किया। इन सभी सुखों में ‘सुगंध का सुख’ भी शामिल था तथा नीमतनामा (Ni’matnama) या बुक ऑफ डिलाइट्स (Book Of Delights) इसका महत्वपूर्ण साक्ष्य है।इस पुस्तक का अधिकांश भाग सुगंध से प्राप्त होने वाले आनंद का वर्णन करती है। इसमें सुगंध प्राप्त करने के लिए गुलाब-जल और सुगंधित तेल को आसवित करने के कई सुझाव दिये गये हैं।इसके अलावा सुगंध उत्पन्न करने वाली अनेकों वस्तुओं जैसे धूपबत्ती,सुगंधित लेप आदि के निर्माण की भी विभिन्न विधियां इसमें बतायी गयी हैं। इसी प्रकार से पुस्तक ‘इत्र - ऐ नवरस शाही’ (Itr-I Nawras Shahi) में भी जीवन में सुगंध के महत्व का वर्णन मिलता है।19वीं शताब्दी के शुरुआती दिनों के हैदराबादी विवरण लखलाख (Lakhlakha) में भी सुगंधित वस्तुओं के निर्माण की विधियां विस्तार पूर्वक बतायी गयी हैं।लखनऊ में इत्र निर्माण की कला का विस्तार मुगल काल में सबसे अधिक देखने को मिला, क्यों कि नवाबों के संरक्षण में इत्र उद्योग का विकास किया गया।शममा (Shamama) और मजमुआ (Majmua)जो कि सबसे जटिल और परिष्कृत इत्रों में से एक हैं, का आविष्कार लखनऊ में ही हुआ था।
लखनऊ के नवाबों के जीवन में सुगंध का महत्व इतना अधिक बढ़ गया था, कि सुगंध देने वाले पदार्थों का उपयोग विभिन्न प्रकार के व्यंजनों में भी किया जाने लगा।कोरमा और कबाब से लेकर रोटी, चावल और मिठाई तक सभी में किसी विशिष्ट सुगंध को अवश्य जोड़ा गया। शाही लोगों के लिए बनाए गए व्यंजनों और सामान्य लोगों के व्यंजनों में एक बड़ा अंतर महक का भी था।खाने में सुगंध का उपयोग करने का विचार यूनानी चिकित्सा से प्रभावित था, जिसके अनुसार सुगंध के लिए उपयोग की गयी सामग्री पाचन तंत्र को ठंडक देती है।कन्नौज में, इत्र के सबसे बड़े खरीदारों में से एक खाद्य उद्योग और गुटखा निर्माता थे।जहां भारत में भोजन में सुगंध को महत्व कई वर्षों पूर्व से ही दिया जा रहा है, वहीं पश्चिमी देशों के रसोइये भी अब व्यंजनों में सुगंध को महत्व देने लगे हैं।उनका मानना है, कि खाने की महक स्वाद से अधिक प्रभावी होती है, क्यों कि महक के साथ सभी इंद्रियां सक्रिय हो जाती हैं, जो व्यक्ति को पुरानी यादों और विभिन्न मनोदशाओं से जोड़ती हैं।
लखनऊ के निकट स्थित कन्नौज को भारत में इत्र निर्माण का मुख्य केंद्र माना जाता है। यहां आज भी उन लोगों द्वारा इत्र निर्माण का कार्य किया जा रहा है, जिनके पूर्वजों ने लखनऊ के अंतिम नवाब वाजिद अली शाह (Wajd Ali Shah) के लिए इत्र निर्माण का कार्य किया था। यहां विभिन्न प्रयोजनों के लिए हर प्रकार के इत्र तैयार किए गए, जिनमें सर्दियों के मौसम के लिए शममा जेफ्रॉन तथा गर्मियों के लिए चमेली, गुलाब आदि की सुगंध वाले इत्र शामिल थे।इत्र निर्माण में व्यक्तिगत स्वभाव या स्वास्थ्य का भी विशेष ध्यान रखा गया। जैसे फेफड़ों और आंखों के संक्रमण को कम करने के लिए गुलाब इत्र,पेट दर्द कम करने के लिए केवड़ा इत्र तथा सिरदर्द कम करने के लिए शममा इत्र को प्राथमिकता दी गयी।वर्तमान समय में लखनऊ में ऐसे कई इत्र केंद्र मौजूद हैं, जो आपको आपकी पसंद के अनुसार इत्र बनाकर दे सकते हैं। इसके लिए आपको बस अपनी पसंदीदा महक जैसे वुडी, फ्लोरल आदि का चयन कर उन्हें अपना ऑर्डर देना है। पसंदीदा महक के साथ आपको ऐसा इत्र तैयार करके दिया जाएगा, जैसा कि आप चाहते हैं।
लखनऊ के प्रसिद्ध इत्र केंद्रों में सुगंधको (Sugandhco), फ्रेगरेंटर्स एरोमा लैब प्राइवेट लिमिटेड (Fragrantor’s Aroma Lab Pvt Ltd), सुगन्ध व्यापार (Sugandh Vyapar), इजहारसंस (Izharsons) शामिल हैं। सुगंधको इत्र केंद्र, में आपको इत्र की अनेकों किस्में उपलब्ध हो जाएंगी, जिनका मूल्य 500 रुपये से लेकर 12,000 रुपये तक हो सकता है। फ्रेगरेंटर्स एरोमा लैब प्राइवेट लिमिटेड इत्र केंद्र, में पहले से निर्मित इत्र की कीमत 150 रुपये से लेकर 10,000 रुपये तक हो सकती है। यह केंद्र आपको 50 मिली लीटर तक की न्यूनतम मात्रा वाला इत्र भी तैयार करके दे सकता है। सुगन्ध व्यापार इत्र केंद्र से भी आप अपना पसंदीदा निजी इत्र खरीद सकते हैं। इत्र की 10 मिली लीटर की मात्रा इस केंद्र में 300 रुपये में उपलब्ध है। इसी प्रकार इत्र केंद्र इजहारसंस में 10 मिली लीटर की न्यूनतम मात्रा वाला इत्र आपको 200 रुपये में उपलब्ध हो जाएगा। इजहारसंस को मोगरा फूल की सुगंध वाले इत्र के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इसके अलावा यहां विभिन्न प्रकार के फूलों और मिश्रित फूलों की सुगंध से बने इत्र मौजूद हैं। इत्र जितना अधिक सांद्र होगा, उसकी कीमत भी उतनी ही अधिक होगी। आप अपनी पसंद के अनुसार इन केंद्रों से अपना निजी इत्र प्राप्त कर सकते हैं।चूंकि, आज कल अल्कोहल आधारित इत्रों का निर्माण बहुत अधिक किया जा रहा है, इसलिए इत्र बनाने की कला को सदियों बाद भी विलासिता से भरे बाजार में अपनी प्रासंगिकता को बनाए रखने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।अल्कोहल आधारित इत्र किसी भी आधुनिक इत्र केंद्र में मिल सकते हैं, किंतु यह प्राकृतिक रूप से बनाए गए इत्रों का मुकाबला नहीं कर सकते। चूंकि,प्राकृतिक इत्रों में रसायनों का इस्तेमाल नहीं होता, इसलिए इनकी महक कई दिनों तक बनी रहती है, जो इन्हें अल्कोहल आधारित इत्रों से अलग बनाती है।

संदर्भ:
https://bit.ly/2SqJ4YA
https://bit.ly/34amoy2
https://bit.ly/3hPF7qI
https://bit.ly/3bQzp47
https://bit.ly/2RxY4Up

चित्र संदर्भ
1. लखनऊ के इत्र विक्रेता का एक चित्रण (youtube)
2. इत्र संग्रह का एक चित्रण (flickr)
3. लखनऊ के प्रसिद्ध इत्र केंद्रों में से एक सुगंधको का एक चित्रण (youtube)


RECENT POST

  • देववाणी संस्कृत को आज भारत में एक से भी कम प्रतिशत आबादी बोल व् समझ सकती है
    ध्वनि 2- भाषायें

     17-05-2022 02:08 AM


  • बाढ़ नियंत्रण में कितने महत्वपूर्ण हैं, बीवर
    व्यवहारिक

     15-05-2022 03:36 PM


  • प्रारंभिक पारिस्थिति चेतावनी प्रणाली में नाजुक तितलियों का महत्व, लखनऊ में खुला बटरफ्लाई पार्क
    तितलियाँ व कीड़े

     14-05-2022 10:09 AM


  • लखनऊ सहित विश्व में सबसे पुराने और शानदार स्विमिंग पूलों या स्नानागारों का इतिहास
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     13-05-2022 09:41 AM


  • भारत में बढ़ती गर्मी की लहरें बन रही है विशेष वैश्विक चिंता का कारण
    जलवायु व ऋतु

     11-05-2022 09:10 PM


  • लखनऊ में रहने वाले, भाड़े के फ़्रांसीसी सैनिक क्लाउड मार्टिन का दिलचस्प इतिहास
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     11-05-2022 12:11 PM


  • तेजी से उत्‍परिवर्तित होते वायरस एक गंभीर समस्‍या हो सकते हैं
    कीटाणु,एक कोशीय जीव,क्रोमिस्टा, व शैवाल

     10-05-2022 09:02 AM


  • 1947 से भारत में मेडिकल कॉलेज की सीटों में केवल 14 गुना वृद्धि, अब कोविड लाया बदलाव
    आधुनिक राज्य: 1947 से अब तक

     09-05-2022 08:55 AM


  • वियतनामी लोककथाओं का महत्वपूर्ण हिस्सा है, कछुआ
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     08-05-2022 07:38 AM


  • राष्ट्र कवि रबिन्द्रनाथ टैगोर की कविताएं हैं विश्व भर में भारतीय संस्कृति की पहचान
    द्रिश्य 2- अभिनय कला

     07-05-2022 10:52 AM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id