जलवायु परिवर्तन और गरीबी उन्मूलन में एक अहम भूमिका निभाती है मिट्टी

लखनऊ

 01-06-2021 08:50 AM
भूमि प्रकार (खेतिहर व बंजर)

पृथ्वी पर जीवन के लिए आवश्यक घटकों में से एक घटक मिट्टी भी है, क्यों कि पेड़ - पौधे (जिन पर मनुष्य और अन्य जीव भोजन, ऑक्सीजन आदि महत्वपूर्ण चीजों के लिए निर्भर है) मिट्टी पर ही उगते हैं, तथा भूमिगत जल का अधिकांश भाग मिट्टी द्वारा अवशोषित किया जाता है।मिट्टी एक जीवित इकाई है, जो सूक्ष्म जीवों को आश्रय प्रदान करती है, इसलिए मिट्टी में मौजूद जीवों की विविधता स्थल पारिस्थितिकी तंत्र के संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ होते हैं, जो उसके अच्छे स्वास्थ्य के संकेतक हैं। यदि मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की मात्रा कम हो जाए, तो मिट्टी की गुणवत्ता खराब हो जाती है। लखनऊ में मिट्टी के प्रकारों में एक विस्तृत विविधता देखने को मिलती है।
यहां पायी जाने वाली मिट्टियों में दोमट मिट्टी, बलुई दोमट मिट्टी, सिल्टी दोमट मिट्टी, सिल्ट दोमट मिट्टी, सिल्टी चिकनी दोमट मिट्टी, चिकनी दोमट मिट्टी, सिल्टी चिकनी मिट्टी आदि शामिल हैं, जो कुल 199715 हेक्टेयर क्षेत्र को आवरित करती हैं। यहां खेती का कुल क्षेत्र 138148 हेक्टेयर है, जबकि उसर भूमि का क्षेत्र 24725 हेक्टेयर है। यहां कुल सिंचित क्षेत्र 124 हजार हेक्टेयर (कुल बुवाई क्षेत्र का 90%) क्षेत्र को आवरित करता है।
मिट्टी हमारे पर्यावरण का अभिन्न अंग है, जो जलवायु परिवर्तन और गरीबी के उन्मूलन में भी एक अहम भूमिका निभाती है।कार्बन डाई ऑक्साइड गैस, जो कि एक प्रमुख ग्रीन हाउस गैस है,का संग्रहण मिट्टी द्वारा किया जाता है। पृथ्वी की मिट्टी में लगभग 2,500 गीगाटन कार्बन मौजूद है, जो वायुमंडल में मौजूद कार्बन की मात्रा से तीन गुना अधिक तथा सभी जीवित पौधों और जानवरों में मौजूद कार्बन से चार गुना अधिक है। यदि मिट्टी, वायुमंडल से कार्बन डाई ऑक्साइड का संग्रहण न करे, तो वायुमंडल में इसकी मात्रा बढ़ती जाएगी तथा ग्रीन हाउस प्रभाव उत्पन्न होगा, जिससे पृथ्वी का तापमान निरंतर बढ़ता जाएगा। मिट्टी द्वारा कार्बन का संग्रहण वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को कम करने का एक बहुत ही प्रभावी प्राकृतिक तरीका है, जिसमें अधिक ऊर्जा और लागत की आवश्यकता नहीं होती है। इस प्रकार जलवायु परिवर्तन को कम करने में मिट्टी अत्यंत सहायक सिद्ध होती है। इसी प्रकार से गरीबी उन्मूलन में मिट्टी की भूमिका की बात करें, तो यह फसलों की उत्पादकता से जुड़ी हुई है।मिट्टी में ऐसे कई तत्व मौजूद होते हैं, जो मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं।उर्वरता बढ़ने से फसलों की पैदावार और गुणवत्ता भी बढ़ती है।यदि पैदावार अच्छी गुणवत्ता के साथ अधिक होती है, तो इससे कृषि कार्य से जुड़े लोगों की आय में वृद्धि होती है।इसके अलावा अच्छी पैदावार का असर लोगों के स्वास्थ्य पर भी होता है।इस प्रकार मिट्टी की उर्वरता और गरीबी उन्मूलन के बीच सीधा संबंध दिखायी देता है।यदि मिट्टी की उर्वरता अच्छी होगी तो,पैदावार भी अच्छी होगी,जिसका मतलब है, कि खेती से जुड़े विभिन्न किसानों और श्रमिकों को लाभ प्राप्त होगा।
वर्तमान समय में ऐसे अनेकों कारण हैं, जिनकी वजह से मिट्टी की गुणवत्ता में निरंतर कमी आ रही है। इन सभी कारणों में मुख्य कारण मानव की विभिन्न गतिविधियां है। पृथ्वी पर पौधों को जीवन देने वाली लगभग आधी भूमि को मानव द्वारा फसल भूमि, चरागाह, औद्योगिक भूमि आदि में बदल दिया गया है, जिससे मिट्टी की कार्बन धारण क्षमता 50 से 70 प्रतिशत कम हो चुकी है।इसके प्रभाव से ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन में लगभग एक चौथाई की वृद्धि हुई है। भूमि के दुरुपयोग और मिट्टी के कुप्रबंधन ने मिट्टी के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है। फसल अवशेषों को जलाना, अत्यधिक जुताई, अत्यधिक सिंचाई, रसायनों का अंधाधुंध उपयोग आदि कारक मिट्टी के स्वास्थ्य को खराब कर रहे हैं, जिससे फसल की पैदावार कम और स्थिर हो रही है। भारत में ऐसी भूमि जो खेती के लिए उपयोग की जाती है, मरुस्थल में बदलने लगी है और इस समस्या का मुख्य कारण हरित क्रांति भी है। यह समस्या मुख्य रूप से हरित क्रांति की प्रमुख फसलों जैसे-गेहूं और धान से उत्पन्न हुई है।पृथ्वी का लगभग 40 प्रतिशत भूमि क्षेत्र शुष्क भूमि का है, तथा मरुस्थलीकरण का सबसे अधिक प्रभाव इस भूमि पर पड़ रहा है, जो दुनिया भर में 2 अरब से अधिक लोगों को आवास प्रदान करती है।विश्व के कुल शुष्क भूमि क्षेत्र में से लगभग 120 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल वाली भूमि मरुस्थलीकरण से प्रभावित है। लगभग 10-20 प्रतिशत शुष्क भूमि पहले ही खराब हो चुकी है। तेजी से फैलते मरुस्थलीकरण के कारण दुनिया भर में शुष्क भूमि में रहने वाले एक अरब से अधिक लोगों को खतरा है।मरुस्थलीकरण का अर्थ है, मृत भूमि। अर्थात एक ऐसी भूमि जिस पर फसल या पेड़-पौधे नहीं उग सकते। हालांकि, यह आवश्यक नहीं है, कि भूमि स्थायी रूप से मरूस्थल में बदल जाए। उदाहरण के लिए, खेती की गई भूमि लगभग हर साल या हर फसल के मौसम के बाद मृत हो जाती है, क्यों कि मिट्टी में पोषक तत्वों का भंडार समाप्त हो जाता है। रासायनिक उर्वरकों के माध्यम से जब मिट्टी को पोषक तत्व उपलब्ध होते हैं, तब मिट्टी को एक नया जीवन मिलता है। किंतु यदि रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग किया जाता है, तो मरूस्थलीकरण लंबे समय तक रह सकता है।हरित क्रांति की कुछ फसलों ने कुछ ही वर्षों में मिट्टी की उर्वरता को समाप्त किया है।
मिट्टी के स्वास्थ्य को बनाए रखने के लिए स्वतंत्रता से पूर्व तथा स्वतंत्रता के बाद से अनेकों प्रयास किए जा रहे हैं, जिनके तहत अनेकों योजनाएं या नीतियां संचालित की गयी हैं।इन योजनाओं या नीतियों में 1947-48 का दामोदर घाटी निगम अधिनियम, 1953 में केंद्रीय मृदा संरक्षण बोर्ड के कार्यों की शुरुआत, 1961 में नदी घाटी योजनाओं का शुभारंभ, 1973-74 में ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा सूखा संभावित क्षेत्र कार्यक्रम का संचालन, 1977-78 में ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा मरुस्थल विकास कार्यक्रम की शुरूआत, 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का संचालन, 2015 में प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना की शुरुआत आदि शामिल हैं। 1994 में, मरुस्थलीकरण का मुकाबला करने के लिए संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन (United Nations Convention to Combat Desertification - UNCCD) में भारत शामिल हुआ और 2030 तक वह कम से कम 260 लाख हेक्टेयर भूमि क्षरण को कम करने के लिए प्रतिबद्ध है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3fuRg2S
https://bit.ly/3i6Pab0
https://bit.ly/3hXK1Cj
https://bit.ly/3fO3VwY
https://bit.ly/3c2MzLs
https://bit.ly/3uqZIEx

चित्र संदर्भ
1. खेती करती महिलाओं का एक चित्रण (wikimedia)
2. एक विशिष्ट मिट्टी की ऊर्ध्वाधर संरचना। लाल भूमध्यसागरीय मिट्टी का एक चित्रण (wikimedia)
3. गहरे रंग की ऊपरी मिट्टी और लाल रंग की उप-मृदा परतें आर्द्र उपोष्णकटिबंधीय जलवायु क्षेत्रों के लिए विशिष्ट होती हैं जिसका एक चित्रण (wikimedia)


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