उत्तर प्रदेश के राज्य पक्षी सारस की वास्तविक दशा

लखनऊ

 10-06-2021 09:58 AM
पंछीयाँ

भारत में प्राचीन काल से, सारस न केवल अपनी अत्यधिक निष्ठा के लिए बल्कि प्रजनन काल के मौसम से पहले और उसके दौरान किए जाने वाले नाटकीय नृत्य अनुष्ठानों के लिए भी जाना जाता हैं। हर नर किसी न किसी मादा को प्रसन्न करने के लिए नृत्य करता है। जैसे ही किसी मादा को किसी नर का नृत्य पसंद आता है, वह भी उसके साथ नृत्य करती दिखाई देती है। सारस पक्षी का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक महत्व भी है। सारस को अकबरनामा, या अकबर की पुस्तक के पन्नों पर चित्रित पाया गया है, जो तीसरे मुगल सम्राट (1556-1605) अकबर के शासनकाल का आधिकारिक इतिहास है। सारस को उड़ने वाली दुनिया की सबसे लम्बी तथा भारत में सबसे बड़ी चिड़िया होने का गौरव प्राप्त है। जन्तु विज्ञान ने इसको ग्रूस एंटिगोन (Grus Antigone) का नाम दिया है तथा यह ग्रइफार्मिस (Gruiformes) गण (Order) के ग्रइडी (Gruidae) परिवार (Family) का एक प्रमुख सदस्य है। यह मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप (Indian subcontinent), दक्षिण पूर्व एशिया (Asia) और ऑस्ट्रेलिया (Australia) के कुछ हिस्सों में पाया जाता है। भारतीय सारस मध्य तथा उत्तरी भारत एवं नेपाल तथा पाकिस्तान में पाया जाता हैं। इसकी दो अन्य प्रजातियां दक्षिण पूर्वी एशिया तथा अस्ट्रेलिया में पायी जाती हैं, परंतु ये प्रजातियां लगभग विलुप्त हो चुकी हैं और भारतीय सारस की दशा भी अब बेहद चिंतनीय है। यह विश्व का सबसे लंबा उड़ने वाला पक्षी है, इसकी लंबाई 1.8 मीटर तक होती है। इसके शरीर का रंग भूरा और मटमैला सफेद होता है, इसकी गर्दन का उपरी हिस्सा लाल रंग का होता है, जो की इस पक्षी को खूबसूरत बना देता है, सारस क्रेन में नर और मादा दोनों एक जैसे होते हैं, नर सारस क्रेन मादा से थोड़ा बड़ा होता है। सारस को कई देशों में निष्ठा एवं दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
यह अपने दाम्पत्य प्रेम के लिए विश्व प्रसिद्ध है, कहा जाता है कि सारस का जोड़ा सदैव एक दूसरे के साथ ही रहता है और यदि दुर्भाग्यवश इनमें से किसी एक की मृत्यु हो जाये तो दूसरा उसके वियोग में खाना-पीना तक छोड़ देता है, जिस कारण कुछ समय पश्चात् उसकी भी मृत्यु हो जाती है। यह खूबसूरत परिंदे भारत में पश्चिम बंगाल, आसाम, गुजरात, पंजाब, और उत्तर प्रदेश में पाए जाते हैं, बहुत कम मात्रा में यह बिहार और राजस्थान में भी देखे गए हैं। सारस क्रेन को पानी वाला दलदली इलाका पसंद होता है यह एक सर्वाहारी पक्षी है यह मेंढक, कीड़े-मकोड़े, सरीसृप, मछलियां, अंडे, छोटे फल, बीज, और पौधों की जड़ें सब कुछ खा लेते हैं। यह हमेशा मैदानों, दलदली भूमि, कृषि योग्य भूमि, खेतों, खुले मैदान, पानी से भरे धान के खेतों के बीच एवं पोखरों के आसपास ही अपने घोंसले बनाते हैं। इस घोंसले के लिए वे घास, पत्तों, तिनकों एवं सरकंडों (मोटी घास) का इस्तेमाल करते हैं। लंबी दूरी का प्रवास करने वाले कई अन्य क्रेन के विपरीत, सारस बड़े पैमाने पर गैर-प्रवासी हैं और कुछ ही अपेक्षाकृत कम दूरी के पलायन करते हैं। बरसात के मौसम के दौरान (जून से सितम्बर‌ के मध्य) इनका मुख्य ब्रीडिंग सीजन (breeding season) होता है, तब ही ये अंडे देते है और एक बड़ा घोंसला ज्यादातर धान के खेतों के निकट कीचड़ व उथले पानी युक्त नम भूमि में बनाते है जो पानी मे एक छोटे से द्वीप (लैगून- lagoon) जैसा दिखता है। इनके घोसले का आकार लगभग 2 मीटर चौड़ा व पानी से लगभग 1 मीटर तक ऊँचा हो सकता है। सामान्यतयः इनके घोंसले में एक या दो ही अंडे दिखाई देते है। हाल ही में वन विभाग के एक सर्वेक्षण से पता चला है कि जिले में सारस की मामूली वृद्धि दर्ज की गई है, और इसे गौतमबुद्धनगर में भी देखा गया है। 25 जून 2019 को जिला वन विभाग की ग्रीष्मकालीन जनगणना ने गौतमबुद्धनगर में पांच वन श्रेणी और आर्द्रभूमि पर कुल 140 सारस क्रेन की उपस्थिति दर्ज की, जिनमें 114 वयस्क और 26 चूज़े थे। दिसंबर 2018 में में हुई शीतकालीन जनगणना में इनकी जनसंख्या 113 सारस क्रेन दर्ज की गई थी, जिनमें से कुल 94 वयस्क और नौ चूजे थे। हालांकि यह वृद्धि प्रभावशाली नहीं है परंतु यह एक अच्छा संकेत है कि इनकी संख्या बढ़ रही है, क्योंकि यह प्रजाति संकट में है। इसे अंतर्राष्ट्रीय संघ (International Union for Conservation of Nature-IUCN) की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची के अंतर्गत 'सुभेद्य' (Vulnerable) के रूप में वर्गीकृत किया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार नेपाल (Nepal), पाकिस्तान (Pakistan), वियतनाम (Vietnam), कंबोडिया (Cambodia), लाओस (Laos) और थाईलैंड (Thailand) के निचले इलाकों में लगभग 1,500 सारस रहते हैं, जबकि ये अब बांग्लादेश में विलुप्त हैं और ऑस्ट्रेलिया में लगभग 2,500 सारस क्रेन हैं। सारस उत्तर प्रदेश का राज्य पक्षी है क्योंकि भारत में सारस की 70 प्रतिशत आबादी राज्य में ही पाई जाती है। दिलचस्प बात यह है कि उत्तर प्रदेश लगभग 23 करोड़ की घनी आबादी वाला और सघन खेती वाला प्रदेश है, और फिर भी सारस के लिए एक आदर्श घर है। प्रदेश में कई नदियां और सहायक नदियां है, जो इस क्षेत्र को प्राकृतिक रूप से अच्छी तरह से सिंचती हैं और ये जलमार्ग लगातार आर्द्रभूमियों को ताज़ा और संरक्षित करते हैं। इन्ही अनुकूल परिस्थितियों ने उत्तर प्रदेश को सारस के लिए एक आदर्श घर बनाया है। सर्वेक्षणों ने स्पष्ट रूप से दिखाया कि उत्तर प्रदेश ने भारत में इस प्रजाति की अधिकांश आबादी की मेजबानी की है। जब उत्तर प्रदेश वन विभाग ने 20 जून, 2010 को अपनी पहली राज्य-व्यापी सरस गणना की, तो उसे 12,246 समृद्ध वयस्क मिले। वन विभाग द्वारा 2018 में किए गए एक सर्वेक्षण में लगभग 16,000 से अधिक सारस पाए गए। आधिकारिक आंकड़ों पर भरोसा किया जाए, तो हाल के वर्षों में संरक्षण के प्रयासों के कारण यह आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है; 2013 में, केवल 12,000 सारस क्रेन दर्ज किए गए थे, जबकि 2015 में, संख्या बढ़कर 13,332 और 2016 में बढ़कर 14,389 हो गई। राष्ट्रीय स्तर पर हाल के वर्षों में सारस क्रेन का कोई व्यापक सर्वेक्षण नहीं होने के कारण, पक्षीविज्ञानियों ने अनुमान लगाया है कि देश भर में सारस की आबादी लगभग 25,000 है। लेकिन इनकी दशा अब भी बेहद चिंतनीय है क्यों कि लगातार घटते प्राकृतिक आवास, जलवायु परिवर्तन, सूखा व अत्यधिक मानव गतिविधियों के कारण इनकी जनसंख्या व इनके प्राकृतिकवास अब लगतार सिकुड़ रहे है। वाइल्डलाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया (डब्ल्यूटीआई) (Wildlife Trust of India) भारतीय सारस ही एक मात्र ऐसी प्रजाति है जो स्थायी रूप से भारत में ही अपने अण्डे देते है तथा रहते हैं।
परंतु जागरूकता की कमी से इनके घटते प्राकृतिक वास सहित भोजन की कमी व रासायनिक केमिकल के प्रयोगों से, बिजली के तारों में उलझकर मरने, नमस्थलों में गर्मियों में पानी की कमी व कभी अवैध शिकार से भी इनकी जनसंख्या कभी कभी प्रभावित होती रहती है। इसके अतिरिक्त प्रदूषित जल, प्रदूषित वातावरण एवं कम होते हुए जंगल भी इनकी असमय मृत्यु तथा घटती हुए संख्या का एक बड़ा कारण बनी हुई है। मानव गतिविधियों, निवास स्थान में हानि, जंगली कुत्तों, नेवलों और सांपों द्वारा शिकार होना ये सब इन प्रजातियों के लिए प्रमुख खतरों के रूप में गिने जाते हैं। इन प्रमुख खतरों से सबसे बड़ा खतरा सारस के अंडों को होता है, सारस के चूज़ों का शिकार और व्यापार, भोजन, औषधीय उद्देश्यों के लिए अंडे और चूज़ों को पकड़ना आदि से भी इस प्रजाति को खतरा है। इनके अंडों की सुरक्षा के लिए स्थानीय लोगों को ज़िम्मेदारी दी गई है। इसका परिणाम भी काफी बेहतर देखा गया है और विगत कुछ वर्षों में लगभग 90% की सफलता के साथ 650 से अधिक घोंसले स्थानीय लोगों को शामिल करके संरक्षित किए गए हैं। इसके अलावा टाटा ट्रस्ट (Tata Trusts) और यू.पी. के सहयोग से डब्ल्यूटीआई द्वारा पूर्वांचल के 10 जिलों में सारस क्रेन संरक्षण परियोजना (Sarus Crane Conservation Project) चल रही है। परंतु इन प्रयासों के बावजूद भी सारस विलुप्त होने की स्थिति में है। चूंकि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा घोषित हमारा राज्य पक्षी सारस हम सबकी एक अमूल्य धरोहर है अतः इस पक्षी के संरक्षण में आम जनता की भी भागीदारी बनती है। स्थानीय लोगों को सरस की देखभाल करने के लिए प्रेरित किया जाये तो इनकी आबादी फिर से संतुलित हो सकती है।

संदर्भ:
https://bit.ly/34ZxyGp
https://bit.ly/3pynYDY
https://bit.ly/3pyo1Qa
https://bit.ly/2pS6kkh
https://bit.ly/2CBXI3M

चित्र संदर्भ
1. सारस पक्षी का एक चित्रण (wikimedia)
2. भारतीय सारस पक्षियों का एक चित्रण (Youtube)
3. सारस पक्षी के समूह का एक चित्रण (flickr)


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