पहले भारतीय स्‍वतंत्रता संग्राम की साक्ष्‍य रही है भव्‍य राजसी दिलकुशा कोठी

लखनऊ

 15-07-2021 07:54 AM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन

दिलकुशा कोठी पुराने लखनऊ शहर के बाहरी इलाके में स्थित एक औपनिवेशिक काल की इमारत है, जो अब छावनी क्षेत्र में स्थित है। यह 1800 ईस्वी के आसपास नवाब सआदत अली खान के मित्र गोर ओस्ली (Gore Ouseley) द्वारा बनायी गयी थी और नवाब नासिर-उद-दीन हैदर (1827-1937 ईस्वी) के शासनकाल के दौरान इसका विस्तार किया गया था।प्रारंभ में अवध के नवाब शिकार के दौरान इस इमारत पर विश्राम करते थे, जिसे बाद में ग्रीष्म सेहतगाह या समर रिसॉर्ट (Summer Resort) के रूप में उपयोग किया जाने लगा। यहां बेगमें (नवाबों की पत्नियां) आराम करने और पिकनिक के लिए आया करती थीं। इस कोठी में अन्‍य नवाबी भवनों की भांति महिलाओं के लिए अलग से विशेष कमरे नहीं बनाए गए थे।
कहा जाता है कि 1830 में यह स्‍थान एक अंग्रेज द्वारा गुब्‍बरा चढ़ाई या बलून एसेन्‍ट (Balloon Ascent) के लिए चुना गया था। कोठी के निकट स्थित कॉन्सटैंशिया (Constantia) महल जो बाद में ला मार्टिनियर बॉयज कॉलेज (La Martinière Boys' College) बना, में फ्रेंचमैन क्लाउड मार्टिन (Frenchman Claude Martin) ने बलून एसेन्‍ट की व्‍यवस्‍था करवायी किंतु इसकी चढ़ाई से पूर्व उनकी मृत्यु हो गई। 1830 में नवाब नासिर-उद-दीन हैदर और उनके दरबारियों ने इस चढ़ाई का आनंद लिया।रोज़ी लेवेलिन जोन्स (ए फैटल फ्रेंडशिप के लेखक) (Rosie Llewellyn Jones (author of A Fatal Friendship)) के अनुसार, दिलकुशा नॉर्थएम्बरलैंड (Northumderland) में सर जॉन वानब्रुग (Sir John Vanbrugh) द्वारा बनाई गयी एक अंग्रेजी इमारत सीटन डीयावेल (Seaton Deiavel) की लगभग एक सटीक प्रतिकृति है। दिलकुशा कोठी को 1864-1865 के फोटोग्राफर (photographer) सैमुअल बॉर्न (Samuel Bourne) द्वारा एक दुर्लभ प्रारंभिक एल्बम प्रिंट (album print) में चित्रित किया गया है।
तीन मंजिला इस इमारत में छोटे-छोटे तहखाने बनाए गए थे। इसके अष्‍टकोणीय स्‍तंभ इसे एक अद्भुत सौंदर्य देते हैं। इसका मुख्‍य द्वार दो स्‍तभों से सटा हुआ है, जिसकी ऊंचाई दूसरी मंजिल की इमारत की छत तक है। इसके कटघरे पर दो महिलाओं की मूर्तियों का निर्माण किया गया था। दीवारों पर विभिन्‍न सजावट की गयी थी, पारंपरिक भारतीय वास्‍तुकला के समान इस कोठी के अंदर भी आंगन नहीं था। इसके बाहर बना सुव्‍यवस्थित बगीचा इसकी खूबसूरती पर चार चांद लगा देता है। इस इमारत का विस्‍तार अन्‍य पारंपरिक इमारतों के समान विशाल क्षेत्र तक नहीं था, किंतु यह उनकी तुलना में ज्‍यादा लंबी थी। ब्रिटिश वास्‍तुकला शैली बारोक (Baroque) से निर्मित इस इमारत के आज अवशेष ही शेष रह गए हैं। जिनमें कुछ स्‍तंभ और बाहृय दीवारें शामिल हैं किंतु इसके व्‍यापक उद्यान आज भी सुरक्षित हैं। अपनी खूबसूरती के कारण आज भी यह पर्यटकों का आकर्षण का केन्‍द्र बनी हुयी है। इस शानदार संरचना ने एक प्रसिद्ध ब्रिटिश अभिनेत्री मैरी लिनली टेलर (Mary Linley Taylor) को भी आकर्षित किया, जो कि इससे प्रभावित होकर सियोल (Seoul) में अपने घर का नाम इसके नाम पर रखा।
द टाइम्स (The Times) के बहुचर्चित संवाददाता विलियम हॉवर्ड रसेल (William Howard Russell) ने 1858 में लिखा न रोम (Rome), न एथेंस (Athens), न कांस्टेंटिनोपल (Constantinople) और न कोई शहर जिन्‍हें मैंने देखा है,वे मुझे लखनऊ जितने आकर्षक और सुंदर लगे।एक समय में लखनऊ की दिलकुशा कोठी औपनिवेशिक काल के दौरान एक भव्‍य राजसी इमारत थी, जो आज उस दौरान हुयी तीन बड़ी घटनाओं की साक्ष्‍य है। पहली 14 नवंबर, 1857 को, जब भारत में ब्रिटिश (British) सेना के कमांडर-इन-चीफ कॉलिन कैंपबेल (Commander-in-Chief Colin Campbell) ने विद्रोह के दौरान भारतीय सिपाहियों से इसे छीन लिया था, दूसरी जब विद्रोहियों ने इसे अंग्रेजों से वापस ले लिया, और तीसरी 3 मार्च, 1858 कोजब कैंपबेल (Campbell) द्वारा इसे पुनः प्राप्‍त कर लिया गया।
कैंपबेल ने इसे बेगम हज़रत महल (Begum Hazrat Mahal), जो कैसर बाग से राज्य पर शासन कर रही थी, पर अंतिम हमले के लिए आधार के रूप में प्रयोग किया, इस समय बेगम हज़रत महल का पुत्र मात्र 11 वर्ष की उम्र में गद्दी पर बैठा था। राजा, वाजिद अली शाह की अनुपस्थिति में, अंग्रेजों द्वारा इसे अपदस्थ कर दिया गया। कैंपबेल ने 5,000 घुड़सवारों सहित 50,000 सैनिकों के साथ दिलकुशा कोठी पर हमला बोल दिया, जिसके परिणामस्वरूप विद्रोहियों (स्वतंत्रता सेनानियों) की हार हुई।1857 के भारतीय विद्रोह के दौरान भारतीय सिपाहियों और ब्रिटिश सेना के बीच हुयी तोपबारी से यह इमारत क्षतिग्रस्त हो गई थी। बाद में, दिलकुशा कोठी को ब्रिटिश कमांड डिवीजन (British Command Division) के जनरल के निवास के रूप में उपयोग किया गया। जब पुरानी छावनी को भंग कर दिया गया था, तो परिरणामत: नई छावनी की स्थापना के लिए 1862 में दिलकुशा के आसपास के क्षेत्र पर कब्जा कर लिया गया। आज दिलकुशा कोठी का दौरा करने पर, आप इसे और इस स्थान पर हुई घटनाओं का अनुभव कर सकते हैं। इस इमारत में पसरा सन्‍नाटा आज भी उस दौरान हुयी त्रासदी का शोक मनाता है। एक खालीपन सा यहां के वातावरण में व्याप्त है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3e63kXa
https://bit.ly/3hVJbEj
https://bit.ly/3wvFk6o

चित्र संदर्भ
1. प्राचीन दिलकुशा कोठी लखनऊ का एक चित्रण (Old Indian Photos)
2. 1864-1865 के फोटोग्राफर (photographer) सैमुअल बॉर्न (Samuel Bourne) द्वारा एक दुर्लभ प्रारंभिक एल्बम प्रिंट (album print) में चित्रित किया गया है (wikimedia)
3. दिलकुशा कोठी लखनऊ का एक रंगीन चित्रण (wikimedia)



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