शहर के मास्टर प्लान में शामिल किया जाना चाहिए मलिन बस्तियों का विकास

लखनऊ

 18-07-2021 06:09 PM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

शब्द "स्लम" (Slum) या मलिन बस्ती का प्रयोग अक्सर शहरों में मौजूद उन अनौपचारिक बस्तियों का वर्णन करने के लिए किया जाता है, जहां रहने की सुविधा अपर्याप्त,खराब और बेहद दयनीय होती है। वहां अक्सर बहुत भीड़भाड़ होती है, तथा लोग एक छोटी सी जगह में रहने को मजबूर होते हैं। इन बस्तियों में बुनियादी नगरपालिका सेवाओं जैसे पीने और अन्य कार्यों के लिए पानी, स्वच्छता, कचरा संग्रह, जल निकासी,सड़कों पर लाइटों की सुविधा, पक्के फुटपाथ आदि का अभाव होता है। ऐसे क्षेत्रों में रहने वाले लोगों की स्कूलों, अस्पतालों या सार्वजनिक स्थलों तक पहुंच आसान नहीं होती है। यहां रहने वाले लोगों के पास यहां रहने के लिए कोई कानूनी प्रमाण भी नहीं है।यहां बनाए गए घरों को या तो खराब गुणवत्ता वाली सामग्री से बनाया जाता है, या फिर बुनियादी रखरखाव की कमी के कारण वे बेहद खराब हो गए हैं।
19वीं और 20वीं शताब्दी के अंत तक संयुक्त राज्य अमेरिका (United States) और यूरोप (Europe) में मलिन बस्तियां आम हो गईं थीं। यूं तो मलिन या झुग्गी बस्तियाँ मुख्य रूप से विकासशील देशों के शहरी क्षेत्रों में पाई जाती हैं, लेकिन विकसित अर्थव्यवस्थाओं में भी झुग्गी बस्तियाँ मौजूद हैं। दुनिया का सबसे बड़ा स्लम शहर मेक्सिको (Mexico) में स्थित नेज़ा-चाल्को-इक्टापालुका (Neza-Chalco- Ixtapaluca) क्षेत्र में है।
मलिन बस्तियों के निर्माण और उसके विस्तार के लिए अनेकों कारक उत्तरदायी हैं, जिनमें गरीबी, उच्च बेरोजगारी, आर्थिक अस्थिरता और अवसाद, लोगों का ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों में पलायन, प्राकृतिक आपदा, सामाजिक संघर्ष, अनौपचारिक अर्थव्यवस्था, राजनीति आदि शामिल हैं।2011 की जनगणना के अनुसार लखनऊ शहर की कुल आबादी 2,817,105 है, जबकि शहरी या महानगरीय आबादी 2,902,920 है। यहां मलिन बस्तियों की कुल संख्या 65,629 है, जिसमें 364,941 की जनसंख्या निवास करती है। 2011 की जनगणना के आधार पर यह आबादी लखनऊ की कुल जनसंख्या का लगभग 12.95% हिस्सा है।ये मलिन बस्तियाँ लखनऊ शहर के शहरीकरण के स्तर को समझने में एक संकेतक के रूप में कार्य करती हैं, क्यों कि मलिन बस्तियों का निर्माण शहरीकरण के साथ प्रमुखता से जुड़ा हुआ है। लोग रोजगार की तलाश में तथा अच्छा जीवन व्यतीत करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से शहरों की ओर पलायन करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप मलिन बस्तियों का विस्तार बढ़ता जा रहा है।
वर्ष 2014 में लखनऊ शहर में झुग्गी बस्तियों का एक गुणात्मक और मात्रात्मक खोजपूर्ण अध्ययन किया गया, जिसमें पाया गया कि लखनऊ में वास्तव में ऐसी 787 मलिन बस्तियां हैं, जहां 10 लाख से भी अधिक लोग निवास कर रहे हैं। लगभग 50 परिवारों ने सार्वजनिक भूमि का अतिक्रमण करके एक झुग्गी का निर्माण किया था। इस प्रकार 10 प्रमुख झुग्गी क्षेत्रों की पहचान की गई। यहं एक झुग्गी कम से कम 20 घरों का एक संघनित व्यवस्थापन है। इन स्थानों में पीने योग्य स्वच्छ पानी, आवाजाही के लिए उपयुक्त सड़क, बिजली, शौचालय तथा अन्य स्वच्छता सेवाओं का अभाव है।यहां रहने वाले 90 प्रतिशत से अधिक लोग बेहतर रोजगार और बेहतर जीवन के लिए ग्रामीण क्षेत्रों से आकर यहां स्थापित हुए हैं।
वर्तमान समय में पूरा विश्व कोरोना महामारी की चपेट में है, तथा शहरी झुग्गी-झोपड़ियों की आबादी कोरोना विषाणु के संक्रमण के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है।भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (Indian Council of Medical Research – ICMR) के अनुसार महामारी का प्रसार ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में शहरी क्षेत्रों में 1.09 गुना और शहरी झुग्गियों में 1.89 गुना अधिक है। संक्रमण मृत्यु दर 0.08 पर बहुत कम है। शहरी आबादी के एक बड़े हिस्से के पास ऐसी अनेकों सुविधाएं मौजूद हैं, जिनकी मदद से वे शारीरिक दूरी, स्वच्छता, आवश्यक और गैर-आवश्यक चीजों तक पहुंच सुनिश्चित करने में सक्षम हैं। वे घर से कार्य करने और महामारी से खुद की सुरक्षा करने में समर्थ है, लेकिन मलिन बस्तियों में रहने वाली आबादी इस कठिन समय में अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही है। आमतौर पर उन्हें ही महामारी को फैलाने के लिए दोषी ठहराया जाता है। हालांकि महामारी के कारण उत्पन्न हुई चुनौतियों का सामना करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने शहरों के लिए अनेकों योजनाएं संचालित की हैं, लेकिन मलिन बस्ती में रहने वाली आबादी को इससे दूर रखा गया है। तालाबंदी की वजह से यहां रहने वाले लोगों का जीवन संकट में आ गया है। इस समस्या को हल करने के लिए सरकार को तुरंत ही एक सुनियोजित प्रतिक्रिया तंत्र अपनाना होगा। मलिन बस्तियों की स्थिति को सुधारने में इनका उन्नयन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।झुग्गी बस्तियों के उन्नयन का मुख्य कारण यह है कि यहां रहने वाले लोगों को भी बुनियादी गरिमा के साथ सभ्य परिस्थितियों में जीने का मौलिक अधिकार है।यदि मलिन बस्तियों को बढ़ने दिया जाता है, तो सरकारें आबादी पर नियंत्रण खो सकती हैं और झुग्गी-बस्तियां अपराध और बीमारी का क्षेत्र बन जाती हैं जो पूरे शहर को प्रभावित करती हैं।मलिन बस्तियों को अपग्रेड करने या उन्हें हटाने से समावेश,आर्थिक विकास,जीवन की गुणवत्ता आदि को बढ़ावा मिलता है तथा गरीबों को आश्रय प्रदान होता है। मलिन बस्तियों को अपग्रेड करने से पूरे शहर के मुद्दों को हल किया जा सकता है। किंतु मलिन बस्तियों से सम्बंधित समस्याओं को हल करने से पहले इनकी अधिक सरल और सार्वभौमिक परिभाषा का होना आवश्यक है। साथ ही शहरी नियोजन में अधिक स्पष्टता और पारदर्शिता भी लानी होगी।
सभी लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए विकास के एक सहभागी दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, इसलिए ऊपरी स्तरों के साथ-साथ जमीनी स्तर के विकास के लिए समान दृष्टिकोण बहुत जरूरी है।गरीबों और हाशिए पर रहने वालों को शहर के मास्टर प्लान में शामिल किया जाना चाहिए तथा बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने के लिए क्या कार्य किए जा सकते हैं, इन्हें पहचानने और निष्पादित करने के लिए एक विशेष नोडल एजेंसी (Nodal agency) स्थापित करना आवश्यक है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3wK8wqb
https://bit.ly/2U8QqkJ
https://bit.ly/3rcgVSh
https://bit.ly/3kv7mN3
https://bit.ly/3hKQxff

चित्र संदर्भ
1. महाराष्ट्र धारावी में मलिन बस्ती का एक चित्रण (wikimedia)
2. लखनऊ की मलिन बस्तियोंमें शहरी विकास मैट्रिक्स का आकलन करने के दौरान चंदर महादेवी द्वारा लिया गया एक चित्रण (flickr)
3. स्लोवाकिया में पार्टिज़न्स्के (Partizánske in Slovakia) - 1938 में स्थापित एक विशिष्ट नियोजित यूरोपीय औद्योगिक शहर का एक उदाहरण, जिसमें एक जूता बनाने का कारखाना है जिसमें व्यावहारिक रूप से शहर के सभी वयस्क निवासी कार्यरत थे जिसका एक चित्रण (wikimedia)



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