मनुष्य को सांसारिक चक्र से मुक्ति का मार्ग बतलाती है, विष्णु भक्त गजेंद्र की कथा

लखनऊ

 28-07-2021 10:15 AM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

हिंदू ग्रंथ की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि, यह केवल पुस्तकों में लिखे कुछ श्लोकों तक सीमित नहीं है, वरन इन ग्रंथों के प्रत्येक श्लोक में लिखा एक-एक शब्द जीवन को उसके सर्वोच्च स्तर पर जीने का मार्ग प्रसस्थ करता है। साथ ही विभिन्न ग्रंथों में अनेक स्थानों पर ईश्वर द्वारा हमें यह भी आश्वस्त किया गया है कि, हम जीवन के संघर्ष में कदापि अकेले नहीं हैं, ईश्वर हमेशा किसी न किसी रूप में हमारी सहायता करने के लिए आ ही जाता है। उक्त कथन की सत्यता हिंदू धर्म की एक पवित्र पुस्तक, भागवत पुराण के 8 वें स्कंद की एक पौराणिक कथा से प्रमाणित होती है। इस आशापूर्ण कथा का उच्चारण गजेंद्र मोक्ष (संस्कृत: गजेंद्र मोक्षः) या गजेंद्र की मुक्ति के नाम से किया जाता है। यह कहानी परीक्षित के आग्रह पर शुक (Shuka) ने राजा परीक्षित को सुनाई थी।
प्राचीन समय की बात है, द्रविड़ देश में इंद्रद्युम्न नामक एक पाण्ड्यवंशी राजा राज्य करते थे। वे अपना अधिकांश समय ईश्वर की पूजा,आराधना में व्यतीत करते थे और अपने इष्ट परमभगवान् विष्णु के बहुत बड़े भक्त थे। हालांकि राजा इंद्रद्युम्न अपना समय राजकार्य में कम ही दे पाते थे, किंतु फिर भी उनके राज में राज्य की प्रजा अपना जीवन सुख और शांति से व्यतीत कर रही थी। राजा कहते भी थे कि, उनके राज्य की व्यवस्था भगवान् विष्णु करते हैं। हर गुजरते क्षण के साथ राजा इंद्रद्युम्न के भगवान् विष्णु की आराधना करने की लालसा निरंतर बढ़ती ही गई। अतः वे समस्त राज-पाठ को त्याग कर मलय-पर्वत पर ही रहने लगे, जहां वे निरंतर परमब्रह्म परमात्मा की आराधना में तल्लीन रहते। शीघ्र ही उनके सिर के बाल भी जटा के रूप में परिवर्तित हो गए। उन्हें केवल श्री हरि के चरण-कमलों में मधुकर बने रहने की सुध रहती, इसके अलावा उन्हें कुछ भी सांसारिक मोह न भाता था। यहाँ तक की उन्हें अपने राज्य, कोष, प्रजा तथा पत्नी आदि किसी प्राणी या पदार्थ की बिलकुल भी सुध न थी।
एक सुबह राजा इन्द्रद्युम्न प्रतिदिन की भांति स्नानोपरांत (नहाने के बाद) श्री हरी की उपासना में मग्न थे, और उन्हें बाहरी जगत का तनिक भी भान न था। संयोगवश उसी समय महर्षि अगस्त्य अपने समस्त शिष्यों के साथ उनके स्थान पर पहुँचे, परंतु चूँकि मौनव्रती राजा इंद्रद्युम्न परम प्रभु के ध्यान में मग्न थे, जिस कारण वे ऋषि अगस्त्य का अघ्र्य और स्वागत न कर सके। जिसे देखकर महर्षि अगस्त्य अत्यंत क्रोधित हो गए, और उन्होंने इंद्रद्युम्न को शाप दे दिया- "इस राजा ने गुरुजनो से शिक्षा नहीं ग्रहण की है, और अभिमानवश परोपकार से निवृत होकर मनमानी कर रहा है। ऋषियों का अपमान करने वाला यह राजा हाथी के समान जड़बुद्धि है इसलिए इसे घोर अज्ञानमयी हाथी की योनि प्राप्त हो।" महर्षि अगत्स्य भगवान की स्तुति में मग्न इंद्रद्युम्न को यह शाप देकर वहाँ से प्रस्थान कर गए। राजा इन्द्रद्युम्न ने इसे भी श्री भगवान विष्णु का आदेश मानते हुए स्वीकार कर प्रभु चरण में अपना शीश रख दिया।
क्षीराब्धि में त्रिकुट नामक दस सहस्र योजन लम्बा, चौड़ा और ऊंचा एक सुंदर और विशाल पर्वत था। त्रिकुट पर्वत के तराई क्षेत्र में भगवान वरुण द्वारा स्थापित ऋतुमान नामक खेल का मैदान था जिसके चारों ओर सुन्दर पुष्पों और फूलों से लदे वृक्ष सुशोभित रहते थे। इसी मैदान के समीप पर्वतश्रेष्ठ त्रिकुट के गहन वन में हथनियों के साथ गजेन्द्र नामक अत्यंत शक्तिशाली और पराक्रमी हाथी रहता था। एक बार गजेंद्र और उसके साथियों को तृषाधिक्य (बहुत तीव्र प्यास लगी) अतः वह निकट के सरोवर से आ रही कमल की ख़ुशबू को सूंघकर उस सरोवर के करीब जा पहुँचा, जहाँ जाकर वे सभी आनंद से ओतप्रोत हो गए और गजेन्द्र ने उस सरोवर के निर्मल, शीतल और मीठे जल में प्रवेश किया, जहाँ पहले तो उसने जल पीकर अपनी प्यास बुझाई जिसके पश्चात् शीतल जल में स्नान कर अपनी थकान को भी दूर किया। आख़िर में वे वह अपने साथी हाथियों के साथ जल में बड़े आनंद से खेलने लगा, और अपनी सूंड में जल भरकर उसकी फुहारों से हथिनियों को स्नान भी कराने लगा। साथ ही अपनी सूंड को हवा में उठाकर ज़ोर से चिंघाड़ने लगा। तभी अचानक जल में कहीं से एक विशालकाय मगरमच्छ आया और उसने गजेंद्र के पैर को पकड़ लिया। गजेंद्र ने अपना पैर छुड़ाने के लिए पूरा ज़ोर लगाया, साथ ही उसकी सहायता के लिए साथी हथनियों ने भी जल में प्रवेश कर लिया। सभी ज़ोर से चिंघाड़ने लगे, और उसे मगरमच्छ से छुड़ाने के लिए पूरा ज़ोर लगा दिया किंतु इस प्रयास में सभी लोग बुरी तरह विफल रहे।
दरअसल गजेंद्र पिछले जन्म में वही हरिभक्त राजा इंद्रद्युम्न थे, जिन्हे महर्षि अगत्स्य ने हाथी बनने का श्राप दिया था। जल में मगरमच्छ के जबड़े में फंसे गजेन्द्र स्वयं को बहार की ओर खींचते किंतु ग्राह गजेन्द्र को पुनः जल के भीतर खींच लेता। माना जाता है कि गजेन्द्र और ग्राह का संघर्ष एक सहस्र (100) वर्ष तक चलता रहा। अंततः गजेन्द्र का शरीर शिथिल हो गया। उसके शरीर में अब पहले जैसी शक्ति और मन में उत्साह नहीं रहा। दूसरी ओर जलचर होने के कारण, ग्राह (मगरमच्छ) की शक्ति में कोई कमी नहीं आई. वरन उसकी शक्ति निरंतर बढ़ती ही गई। वह भरपूर ताकत और उत्साह से पूरी शक्ति लगाकर गजेन्द्र को खींचने लगा। दूसरी ओर शक्ति और पराक्रम के साथ ही अहंकार भी चूर-चूर हो गया। किंतु पूर्व जन्म की निरंतर विष्णु आराधना के फलस्वरूप उसे भगवत्स्मृति हो आई, और गजेन्द्र मन को एकाग्र कर पूर्वजन्म में सीखे श्रेष्ठ स्रोत द्वारा परम प्रभु की स्तुति करने लगा। गजेन्द्र की स्तुति सुनकर भगवान विष्णु गरुड़ पर सवार होकर अत्यंत शीघ्रता से उस सरोवर के तट पर पहुँचे। जीवन से निराश तथा पीड़ा से छटपटाते गजेन्द्र ने जब हाथ में चक्र लिए गरुड़ारूढ़ भगवान विष्णु को तेज़ी से अपनी ओर आते देखा तो उसने अपनी सूंड पर एक कमल का एक सुन्दर पुष्प ऊपर उठाया और बड़े कष्ट से कहा-"नारायण! जगद्गुरो! भगवान! आपको नमस्कार है।" अपने भक्त की पीड़ा को देखकर भगवान विष्णु गरुड़ की पीठ से उतरे और अपने सुदर्शन चक्र से मगमच्छ का मुंह फाड़कर गजेन्द्र अर्थात राजा इंद्रद्युम्न को मुक्त कर दिया।
भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र के स्पर्श से पाप मुक्त होकर, अभिशप्त मगरमच्छ (हूहू) गन्धर्व ने प्रभु की परिक्रमा की और उनके चरण-कमलों की वंदना कर अपने लोक को प्रस्थान कर दिया। भगवान विष्णु ने गजेन्द्र का उद्धार कर उसे अपना पार्षद बना लिया। गजेन्द्र की स्तुति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने सबके समक्ष कहा-"प्यारे गजेन्द्र! जो लोग ब्रह्म मुहूर्त में उठकर तुम्हारी की हुई स्तुति से मेरा वंदन करेंगे, उन्हें मैं मृत्यु के समय निर्मल बुद्धि का दान करूँगा।"
शुक्लांबरधरं विष्णुं शशि वर्णं चतुर्भुजं।
प्रसन्न वदनं ध्यायेत् सर्व विघ्नोपशान्तये॥

ऐसा कहकर भगवान विष्णु ने गजेंद्र को पार्षद के रूप में चुनकर अपने गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को प्रस्थान कर दिया। गजेंद्र की कहानी वैष्णववाद में एक अभिन्न विषय है और प्रतीकात्मक रूप से गजेंद्र आदमी है, मगरमच्छ पाप है और झील का गंदा पानी संसार है। अतः गजेंद्र मोक्ष का प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि, इंसान की अज्ञानता, इच्छाएँ, मगरमच्छ के सामान होती हैं जो उसे इस संसार चक्र में फंसा देती हैं। इंसान को तब तक मुक्ति नहीं मिलती जब तक अभिमान लोभ और मोह इत्यादि को त्यागकर वह ख़ुद को ईश्वर के चरणों में समर्पित न कर दे।

संदर्भ
https://bit.ly/3iT78ww
https://bit.ly/3x88icy
https://bit.ly/3j6ab4T

चित्र संदर्भ
1.गजेंद्र मोक्ष का एक चित्रण (wikimedia)
2.गिद्ध को मगर के चंगुल के बचाने हेतु दौड़ते हुए आते भगवान विष्णु का एक चित्रण (wikimedia)
3.गजेंद्र मोक्ष का एक चित्रण (wikimedia)



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