सर पैट्रिक गेडेस चाहते थे लखनऊ की प्रकृति और संस्कृति की मौलिक एकता को कायम रखना

लखनऊ

 30-07-2021 10:45 AM
नगरीकरण- शहर व शक्ति

किसी भी शहर की बनावट, रखरखाव, निर्माण शैली, शासन व्यवस्था तथा शहरवासियों को प्रदान की जाने वाली सुविधाएँ वहां के नागरिकों की जीवनशैली को काफी हद तक प्रभावित करती हैं, और वर्तमान समय में पर्यावरण संबंधी समस्याओं को देखते हुए हमारे शहरों को पर्यावरण के अनुकूल बनाने की सख्त आवश्यकता नज़र आ रही है। सर पैट्रिक गेडेस (Sir Patrick Geddes) शहरों के निर्माण में स्थानीय संस्कृति, वास्तु शास्त्र और पर्यावरण की अहम् भूमिका को बहुत पहले ही समझ चुके थे।
सर पैट्रिक गेडेस (जीवनकाल: 1854-1932) एक प्रसिद्द समाजशास्त्री, जीवविज्ञानी, शिक्षक, और नगर योजनाकार (शहरों के व्यवस्थागत निर्माण की योजना बनाने वाले) थे। पैट्रिक गेडेस ने ही मद्रास प्रेसीडेंसी (Madras Presidency) के कस्बों को देखने के बाद 'मंदिर-शहर' शब्द गढ़ा। कई विद्वानों के लिए, 'तमिल देश' (तमिलकम या प्राचीन तमिल देश प्राचीन तमिल लोगों द्वारा बसाए गए भौगोलिक क्षेत्र को संदर्भित करता है) के मंदिर ऐसे स्थान हैं, जो स्वयं में विशिष्ट शैलियों का अनुकरणीय का वर्णन करता है। कई लोग इसे एक पवित्र स्थान के रूप में मानते हैं। परंतु कुछ लोगों जैसे अग्रणी नगर जनाकार पैट्रिक गेडेस के लिए मंदिर ऐसा स्थान अथवा भवन हैं, जो बस्तियों को एक साथ रखते हैं, तथा उन्हें एक केंद्र बिंदु प्रदान करते हैं। भवनों इमारतों और नगर निमार्ण में गहरी रुचि और समझ रखने वाला यह व्यक्ति, भारतीय मेहमान के तौर पर भारतीय वास्तुकला के बारीक बिंदुओं की सराहना भी कर सकता था, परंतु उसने यहाँ के शहरों को एकता और चरित्र प्रदाता के रूप में देखा। उन्होंने श्रीरंगम (जिसे अब थिरुवरंगम कहा जाता है, तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली शहर में एक द्वीप ) की बहुत प्रशंसा की, क्यों की यहां पर संकेंद्रित (concentric) दीवारों का निर्माण करके बढ़ती आबादी को समायोजित किया गया था। मदुरै के चौड़े रथ- सड़कों के संदर्भ में उन्होंने कहा, "मैं शहरों के विकास के सन्दर्भ में इससे अधिक उपयोगी कुछ नहीं सोच सकता की जहां मंदिर, अधिकारीयों और नगरपालिका नियोजन कार्यालय का रास्ता एक ही हो"। श्रीरंगम को "आदर्शवाद और नया सीखने के माहौल के संदर्भ में आदर्श माना जाता है "। गेडेस के लिए, भारत उनके अपने सिद्धांतों की खोज और पुष्टि का केंद्र बन गया था । 1914 में, प्रथम विश्व युद्ध के समय उन्हें शहरों के विकास पर उनकी लोकप्रिय प्रदर्शनी के आधार पर भारत में मद्रास (अब चेन्नई) आने के लिए आमंत्रित किया गया था। इस दौरान उन्होंने पूरे देश में भ्रमण करते हुए, भारत में और भारत के बाहर लगभग 10 साल बिताए।
उन्होंने ब्रिटिश अधिकारियों को पाइप्ड पानी , सीवरेज, और सीधी पक्की सड़कों के साथ भारतीय शहरों को 'सुधार' करने की आवश्यकता के बारे में कई सुझाव दिए। साथ ही उन्होंने यह भी यह भी सुझाव दिया कि भारतीयों से शहरों के सुधार के संदर्भ में बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यहाँ आकर उन्होंने पाया की भारतीयों के लिए जलवायु , घुमावदार गलियों और चौड़ी सीधी सड़कों की तुलना में कई अधिक मायने रखती हैं, साथ ही यहाँ की गलियों में ठहराव के लिए पेड़ों का भी उपयोग किया गया था, जहाँ भारतीय महिलाएं, पुरुष और बच्चे किसी फैले हुए बरगद के पेड़ के नीचे आराम करते हुए दिख जाते थे, आराम करने के लिए ऐसे पेड़ कई जगहों जैसे तालाब के पास या एक नदी के किनारे, सड़क के चौराहों पर दिख जाते थे। यह पेड़ (संभवतः वह पेड़ों के नीचे बैठने के लिए बने गोल अथवा चौड़ी आकृतियों को कह रहे थे) पर्यावरण के साथ-साथ लोगों की आपसी समझ को मजबूत करने तथा सांस्कृतिक एकता बढ़ाने का भी काम करते थे।
1916 में, गेडेस ने हमारे शहर लखनऊ की शहरी आकृति विज्ञान का मूल्यांकन करते हुए एक विस्तृत रिपोर्ट लिखी। उन्होंने पूर्व आधुनिक भारत की विविध शहरी और नागरिक परंपराओं की सराहना की, परंतु वे भारतीय शहरों के 'ऐतिहासिक सार' के बड़े हिस्से के विध्वंस पर हैरान थे। उदाहरण के लिए, माछी भवन (Macchi Bhawan), जो किसी तरह नेपियर योजना से बच गया था, परंतु उसे भी 1891 में ध्वस्त कर दिया गया। गेडेस उन अड़ियल कानूनों से भी नाखुश थे, जिसने घरों और दुकानों की लेआउट और अग्रभाग को प्रतिबंधित कर दिया था। लखनऊ के संदर्भ में उन्होंने सलाह दी कि सड़कों को इस तरह से बनाया जाना चाहिए, कि पुराने शहर और गली के वैभव को बहाल रखा जा सके। भारतीय शहरों को जैविक अर्थात पर्यावरण के अनुरूप मानने वाले गिने-चुने लोगों में गेडेस भी थे। वे स्वदेशी कारीगरों के समर्थक थे और उनके द्वारा बनाई गई, भव्य इमारतों के लिए उनकी प्रशंसा भी करते थे। हमारे शहर लखनऊ का प्रमुख आकर्षण हजरतगंज है, जो की आज शहर का प्रमुख शॉपिंग क्षेत्र है। जहां बाजारों के अलावा, इसमें शॉपिंग कॉम्प्लेक्स, रेस्तरां, होटल, थिएटर और कार्यालय भी शामिल हैं। ब्रिटिश राज के दौरान यह क्षेत्र विक्टोरिया गंज (Victoria Street) के नाम से जाना जाता था।
फरवरी और मार्च 19I6 के दौरान इस क्षेत्र के शहर नियोजन के संदर्भ में गेडेस और मैकिन्टोश (Rene Mackintosh) (रेने मैकिन्टोश स्कॉटलैंड के एक प्रसिद्ध वास्तुकार थे) ने कई बिंदुओं पर चर्चाएं की उनके द्वारा विक्टोरिया स्ट्रीट के सुधार के संदर्भ में टाउन प्लानिंग की रिपोर्ट को 1916-18 में प्रकाशित किया गया था। जिनमे से कुछ प्रमुख बिंदु निम्नवत हैं :-
1. रिपोर्ट की शुरुआत में ही यातायात की स्थिति के प्रबंधन पर चर्चा की गई थी।
2. उन्होंने चौड़ी सड़क को संकरा करके आर्केड (Arcade) (वृक्षों से ढंका हुआ मार्ग) के लिए सड़क के किनारे अतिरिक्त
2 फीट के औसत स्थान की रियायत की मांग की जिसमे पेड़ों और झाड़ियों को उगाया जाना था।
3. उनका मानना था कि, धूप और बारिश दोनों स्थितियों में आर्केड पैदल यात्रियों द्वारा निश्चित रूप से पसंद किया जाएगा।
4. मेहराबदार इमारतों की वास्तुकला के संबंध में गेडेस ने केवल यह टिप्पणी की कि, वे विभिन्न प्रकार के डिजाइनों में दो या तीन मंजिला ऊंचे होने चाहिए, क्योंकि कोई भी 'पूरी तरह से सीधा और समान संरेखण, नियमित और सम्मानजनक, मीलों तक लगातार आनंद नहीं दे सकता है। (अर्थात कम ऊंचाई के कारण अन्य इमारतों को भी लंबी दूरी से भी आसानी से देखा जा सकता है।)
लखनऊ में उन्होंने संरचनाओं की 'पुराने शिल्प कौशल और सुंदरता' की बड़ी सराहना की उनके अनुसार यह शहर के आवास रूपों के अनुकूल है। उन्होंने सुझाव दिया कि, स्थानीय कारीगरों को अपनी अनूठी विशेषज्ञता का अभ्यास करने की अनुमति दी जानी चाहिए। परंतु यह अफ़सोस की बात है कि उनकी सलाह अनसुनी हो गई। उनके लिए 'जीवन को समग्रता (किसी एक वस्तु में सब कुछ) में देखना' ही समाधान था। उन्होंने समझा कि जीवन, प्रकृति और संस्कृति दोनों के उद्भव के लिए मौलिक प्रक्रिया है। प्रकृति और संस्कृति की मौलिक एकता के संदर्भ में गेडेस ने तर्क दिया कि 'अर्थशास्त्र के जैविक सिद्धांतों का मुख्य उद्देश्य भोजन और आश्रय नहीं बल्कि संस्कृति और शिक्षा थी'।

संदर्भ
https://bit.ly/3f6Sxg2
https://bit.ly/3xdNIaO
https://bit.ly/2Vj4bgR
shorturl.at/fjH09

चित्र संदर्भ
1. पैट्रिक गेडेस, विक्टोरिया गुंज में एक अज्ञात फोटोग्राफर द्वारा ली गई मेहराबदार कार्यालय या गोदाम की तस्वीर (flickr,http://surl.li/abcip)
2. पैट्रिक गेडेस की एक चित्रकारी (art.uk)
3. लखनऊ के लिए आर्केड: पैट्रिक गेडेस, चार्ल्स रेनी मैकिन्टोश ( Patrick Geddes, Charles Rennie Mackintosh) द्वारा शहर का पुनर्निर्माण का एक चित्रण (http://surl.li/abcip)



RECENT POST

  • लखनऊ सहित कुछ चुनिंदा चिड़ियाघरों में ही शेष बचे हैं, शानदार जिराफ
    स्तनधारी

     12-08-2022 08:28 AM


  • ऑनलाइन खरीदारी के बजाए लखनऊ के रौनकदार बाज़ारों में सजी हुई राखिये खरीदने का मज़ा ही कुछ और है
    संचार एवं संचार यन्त्र

     11-08-2022 10:20 AM


  • गांधीजी के पसंदीदा लेखक, संत व् कवि, नरसिंह मेहता की गुजराती साहित्य में महत्वपूर्ण भूमिका
    मध्यकाल 1450 ईस्वी से 1780 ईस्वी तक

     10-08-2022 10:04 AM


  • मुहर्रम के विभिन्न महत्वपूर्ण अनुष्ठानों को 19 वीं शताब्दी की कंपनी पेंटिंग शैली में दर्शाया गया
    विचार I - धर्म (मिथक / अनुष्ठान)

     09-08-2022 10:25 AM


  • राष्ट्रीय हथकरघा दिवस विशेष: साड़ियाँ ने की बैंकिग संवाददाता सखियों व् बुनकरों के बीच नई पहल
    स्पर्शः रचना व कपड़े

     08-08-2022 08:55 AM


  • अंतरिक्ष से दिखाई देती है,भारत और पाकिस्तान के बीच मानव निर्मित सीमा
    द्रिश्य 1 लेंस/तस्वीर उतारना

     07-08-2022 12:06 PM


  • भारतीय संख्या प्रणाली का वैश्विक स्तर पर योगदान
    विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

     06-08-2022 10:25 AM


  • कैसे स्वचालित ट्रैफिक लाइट लखनऊ को पैदल यात्रियों के अनुकूल व् आज की तेज़ गति की सडकों को सुरक्षित बनाती
    य़ातायात और व्यायाम व व्यायामशाला

     05-08-2022 11:23 AM


  • ब्रिटिश सैनिक व् प्रशासक द्वारा लिखी पुस्तक, अवध में अंग्रेजी हुकूमत की करती खिलाफत
    उपनिवेश व विश्वयुद्ध 1780 ईस्वी से 1947 ईस्वी तक

     04-08-2022 06:26 PM


  • पाकिस्तान, चीन की सीमाओं तक फैली हुई, काराकोरम पर्वत श्रृंखला की विशेषताएं व् प्राचीन व्याख्या
    पर्वत, चोटी व पठार

     03-08-2022 06:11 PM






  • © - 2017 All content on this website, such as text, graphics, logos, button icons, software, images and its selection, arrangement, presentation & overall design, is the property of Indoeuropeans India Pvt. Ltd. and protected by international copyright laws.

    login_user_id