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बहुमुखी औषधीय गुणों का धनी लसोड़ा वृक्ष

लखनऊ

 23-08-2021 11:33 AM
पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

लसोड़ा मुख्य रूप से एशिया (Asia) और विश्‍व भर के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाता है। यह पूर्व में म्यांमार (Myanmar) से लेकर पश्चिम में लेबनान (Lebanon) और सीरिया (Syria) तक प्राकृतिक रूप से उगता है और बहुतायत से बढ़ता है। यह मैदानी इलाकों में समुद्र तल से लगभग 200 मीटर ऊपर शुरू होता है और पहाड़ियों में लगभग 1,500 मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है। कॉर्डिया मायक्सा (Cordia myxa) बोरेज (borage) परिवार, बोरागिनेसी (Boraginaceae) में फूलों के पौधे की एक प्रजाति है। यह एक मध्यम आकार की चौड़ी पत्ती वाला पर्णपाती वृक्ष है। लसोरा (Lasora), लिसोडा (Lisodaa), गोंडी (Gondi), नारुविली (Naruvili), और सबेस्टन प्लम (Sabestan Plum) कॉर्डिया डाइकोटोमा (Cordia dichotoma) या कॉर्डिया मायक्सा (Cordia myxa) के कुछ सामान्य नाम हैं, जो पूरे भारत में पाया जाने वाला एक सामान्‍य पेड़ है। प्राचीन काल से पेड़ के विभिन्न भागों का उपयोग आंतरिक और बाह्य रूप से औषधीय प्रयोजनों के लिए किया जाता आ रहा है।
लसोड़े के पेड़ का उपयोग पारंपरिक रूप से अपच, बुखार, दाद, अल्सर, सिरदर्द, फेफड़ों के रोगों और प्लीहा आदि के उपचार में किया जाता है। इसकी पत्तियों, फलों, छाल और बीजों में एंटीडायबिटिक (antidiabetic), एंटीअल्सर (antiulcer), एंटी-इंफ्लेमेटरी(anti-inflammatory), इम्यून-मॉड्यूलेटर (immune-modulator)और एनाल्जेसिक (analgesic) गतिविधियों को प्रदर्शित करने के लिए सूचित किया गया है।
फलों को ताजा, सूखा और अचार बनाकर खाया जा सकता है। मिस्र (Egypt) में सूखे मेवे आज भी मसाला बाजारों में सपिस्तान (sapistan) के रूप में बेचे जाते हैं, और दवा के रूप में उपयोग किए जाते हैं। यूनानी दवा में सपिस्तान को गर्म और दुसरी डिग्री का शुष्क माना जाता है। फलों के उत्तेजनात्‍मक प्रभाव का प्रतिकार करने के लिए रेचक (purgative) के सहायक के रूप में उपयोग किया जाता है। त्वचा संबंधि रोगों के उपचार हेतु इसकी छाल का उपयोग किया जाता है। यह रक्‍तएवं पित्‍त संबंधि दोषों को भी शांत करता है। पेड़ की छाल अमा दोष में मदद करती है। अमा एक चयापचय रहित अपशिष्ट है जिसका उपयोग शरीर द्वारा नहीं किया जाता है। यह चिपचिपा, गीला, ठंडा, मीठा और शरीर में अधिकांश रोगों का मूल कारण होता है, जो वायु या कफ (या दोनों) की अधिकता से उत्पन्न होता है। छाल में गैलिक एसिड (Gallic acid), बी-सिटोस्टेरॉल (b-sitosterol) होता है, और पित्त और कफ को कम करता है। औषधीय प्रयोजन के लिए छाल के काढ़े का उपयोग किया जाता है।
इसके कुछ अन्‍य औषधीय उपयोग:
1. इसकी छाल और कच्चे फलों का उपयोग हल्के टॉनिक (tonic) के रूप में किया जाता है।
2. नारियल के दूध के साथ छाल का रस गंभीर पेट के दर्द से राहत देता है।
3. इसकी छाल को अनार के छिलके के साथ जुलाब के उपचार हेतु दिया जाता है।
4. छाल पथरी, जुकाम आद‍ि में भी उपयोगी है।
5. छाल का काढ़ा अपच और बुखार में उपयोगी होता है।
6. बाहरी रूप से सिक्त (moistened) छाल को फोड़े, और ट्यूमर (tumors) पर लगाया जाता है। चूर्ण के रूप में इसका उपयोग मुंह के छालों के इलाज के लिए किया जाता है।
7. दांतों को मजबूत बनाने के लिए इसकी छाल को दांतों पर मला जाता है।
8.पाउडर की छाल को हाथों और पैरों पर खुजली वाली त्वचा पर लगाया जाता है।
9. फल की गुठली दाद में एक अच्छा उपाय है। इनका चूर्ण बनाकर तेल में मिलाकर दाद पर लगाया जाता है।
10. पत्ते अल्सर और सिरदर्द में एक सहायक के रूप में उपयोगी होते हैं।
लसोड़ा लगभग 50 से 60 वर्षों में परिपक्व हो जाता है, जब केंद्र की ऊंचाई पर इसका घेरा लगभग 1 से 1.5 मीटर होता है। इसका तना समान्‍यत: सीधा और बेलनाकार होता है, जिसकी ऊंचाई लगभग 3 से 4 मीटर होती है। शाखाएँ सभी दिशाओं में फैली हुई होती हैं। जब यह पूरी तरह से बड़े हो जाते हैं, तो पेड़ की कुल ऊंचाई लगभग 10 से 15 मीटर तक हो जाती है। कम अनुकूलित जलवायु या प्रतिकूलित वातावरण में, हालांकि, इसकी वृद्धि कम होती है और यह कुछ टेढ़ा रूप प्राप्त कर सकता है। और इससे भी बुरे वातावरण में यह एक छोटी झाड़ी के समान भी रह सकता है। लसुड़े की छाल भूरे रंग की होती है जिसमें अनुदैर्ध्य और ऊर्ध्वाधर दरारें पड़ी होती हैं। परिपक्व होने वाले पेड़ की मुख्य शीर्ष की छाल में प्रमुख दरारों को देखकर पेड़ को दूर से ही आसानी से पहचाना जा सकता है। लसुड़े की पत्तियाँ चौड़ी, अंडाकार, वैकल्पिक और डंठल वाली होती हैं, जो 7 से 15 सेमी x 5 से 10 सेमी तक फैलती हैं। बाहरी रूप में ये ऊपर से चमकदार और नीचे प्यूब्सेंट (pubescent) होती हैं। युवा पत्ते रोएंदार होते हैं। ताजा पत्ते मवेशियों के लिए चारे के रूप में काफी उपयोगी होते हैं । इनका उपयोग बिड़ी और चेरूट लपेटने के लिए भी किया जाता है। लसुड़े के पेड़ में मार्च-अप्रैल में फूल आते हैं। पुष्पक्रम, ज्यादातर आवधिक, सफेद रंग का होता है। प्रत्‍येक फूल लगभग 5 मिमी व्यास का होता है। कुछ जगहों पर ये थोड़े रोएंदार वाले और सफेद होते हैं। पर्णपाती पौधा होने के कारण इस प्रजाति में एक ही पेड़ पर नर और मादा फूल लगते हैं। एक स्वतंत्र फूल का कैलेक्स (calyx) भाग लगभग 8 मिमी लंबा और चिकना होता है। यह अपनी कली के फूल के रूप में खुलने पर अनियमित रूप से विभाजित हो जाता है। इसके तंतु रोंए वाले होते हैं।लसुड़ा के फल जुलाई-अगस्त में दिखने लगते हैं। यह एक प्रकार का ड्रूप (drupe) (कठोर फल), हल्के पीले से भूरे या गुलाबी रंग के भी होते हैं। पकने के समय इनका रंग गहरा हो जाता है। श्लेष्मा जैसे चिपचिपे गोंद से भरा होने के कारण, गूदा कुछ पारदर्शी होता है। पूरी तरह से पकने पर गूदा स्वाद में काफी मीठा हो जाता है। आधे पके फल के गूदे को कार्यालयों में पेपर ग्लू (paper glue) के विकल्प के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।
पौधे की कई उपयोगिताओं को ध्यान में रखते हुए शुष्क क्षेत्र में भी व्यापक रूप से इसकी खेती की जाती है। प्रजाति चीन के लिए स्वदेशी है और निचले मैदानों और उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में व्यापक रूप से खेती इसकी जाती है। हालांकि यह पौधा गहरी चिकनी दोमट और रेतीली मिट्टी में अच्छी तरह से फलता-फूलता है, फिर भी यह लगभग 100 से 150 सेमी वार्षिक वर्षा वाले क्षेत्रों में बेहतर होता है।

संदर्भ:
https://bit.ly/2XKuwWf
https://bit.ly/3miIPvm
https://bit.ly/3iZ0SVj
https://bit.ly/3sLSJHj

चित्र संदर्भ
1. बहुमुखी औषधीय गुणों का धनी लसोड़ा वृक्ष का एक चित्रण (flickr)
2. अदरक के साथ ताइवानी (लसोड़ा) कॉर्डिया डाइकोटोमा (Cordia dichotoma) फलों का एक जार का एक चित्रण (wikimedia)
3. लसोड़ा के बीजों का एक चित्रण (flickr)



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