लखनऊ के हरित आवरण हेतु, स्थानीय स्वदेशी वृक्ष ही पारिस्थितिकी तंत्र के लिए सबसे उपयुक्त

लखनऊ

 24-05-2022 07:37 AM
पेड़, झाड़ियाँ, बेल व लतायें

स्मिथसोनियन पर्यावरण अनुसंधान केंद्र (Smithsonian Environmental Research Center), ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय (Oxford University) के साथ-साथ फ्रेंच नेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर सस्टेनेबल डेवलपमेंट (French National Research Institute for Sustainable Development) के शोधकर्ताओं के एक अंतरराष्ट्रीय समूह द्वारा जारी की गई एक रिपोर्ट के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण 1980 के दशक की तुलना में वर्षावन के पेड़ दोगुनी तेजी से सूख रहे हैं और मर रहे हैं। उत्तरी क्वींसलैंड (Queensland) के नम उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में 81 विभिन्न प्रजातियों के 74,135 पेड़ों के डेटासेट का उपयोग करते हुए शोधकर्ता 1971 से 2019 तक लगभग 50 वर्षों के डेटा का निरीक्षण कर रहे हैं। जिसमें 24 वन भूखंडों को भी सम्मिलित किया गया है। उन्होंने इस बात का पता लगाया है कि इन वर्षों की अवधि में सभी भूखंडों और प्रजातियों का वार्षिक वृक्ष मृत्यु दर औसतन दोगुना हो गया है। चक्रवात जैसी प्राकृतिक आपदाओं और तेज हवा द्वारा होने वाली वृक्षों की मृत्यु के लिए बाढ़ करने के बाद भी, वृक्ष मृत्यु दर उच्च स्तर पर ही रहा। इस विषय पर शोधकर्ताओं का कहना है कि, ऐसा इसलिए है क्योंकि 1980 के दशक से अत्याधिक ग्लोबल वार्मिंग के कारण उत्तरी क्वींसलैंड के वातावरण में दुनिया के अन्य हिस्सों के वातावरण की तुलना में काफी अधिक 'सुखाने की शक्ति' है। वातावरण के सूखने के साथ ही पेड़ों से नमी भी तेजी से सूख रही है, जिससे पेड़ों में पानी की उपस्थिति में भारी गिरावट आ रही है और उनकी मौत हो रही है। यह अंततः ग्रह को और अधिक गर्म करने का परिणाम देगा। इसीलिए स्थानीय जैव विविधता को समायोजित करने की बहुत ज्यादा आवश्यकता पड़ रही है।
वास्तव में स्वदेशी पेड़ों को बहुत कम देखभाल की आवश्यकता होती है और वे कीटनाशकों के बिना भी स्वस्थ रूप से पनप सकते हैं, इसके साथ ही वे स्थानीय जीवों को भी अपनी ओर आकर्षित करते हैं जो एक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं। हरित आवरण को मानव स्वास्थ्य और कल्याण के लिए आवश्यक माना जाता है। जलवायु परिवर्तन की रफ्तार को धीमा करने के लिए शहर में अत्याधिक हरियाली का होना एक महत्वपूर्ण उपाय है, लेकिन इसके साथ-साथ सही प्रकार की वनस्पति को होना भी बहुत महत्वपूर्ण है। हालांकि सभी पेड़ सुंदर हैं, लेकिन उन स्थानीय प्रजातियों से संबंधित पेड़ों की एक विशेष सुंदरता होती है। मध्य भारत के जंगलों में पलास के पेड़ों की खूबसूरती, हिमालयी कश्मीर के चिनार के पेड़ की खूबसूरती के समान ही है ठीक उसी तरह पश्चिमी घाट में जंगली अदरक, हिमाचल प्रदेश में जंगली गुलाब या सिक्किम में ऑर्किड (Orchid) जितना सुंदर है। प्रत्येक प्रजाति अपने स्वयं के प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए पूरी तरह से अनुकूल है और मानवीय हस्तक्षेप के बिना स्वच्छंद रूप से फलती-फूलती है। मुंबई के लोगों ने अपने आरे के जंगलों को बचाने के लिए अपने वर्षों के संघर्ष में प्रकृति के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन किया है। "आरे बचाओ आंदोलन" (Save Aarey Movement) के अभियान में नेताओं, महिलाओं और युवाओं और यहां तक ​​कि महाराष्ट्र के युवा पर्यावरण मंत्री आदित्य ठाकरे ने भी हिस्सा लेकर प्रकृति के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित किया है।
गुलमोहर (Gulmohar) की खोज अंग्रेजो द्वारा 19वीं सदी में मेडागास्कर (Madagascar) में की गई थी। गुलमोहर की सुंदरता अविश्वसनीय है। यह पूरी तरह से प्राकृतिक और शुष्क जलवायु के लिए तथा पर्णपाती जंगलों के लिए अनुकूल होते हैं। गुलमोहर और अन्य कुछ मुख्य विदेशी पेड़ मानसून की हवा और बारिश में बड़ी संख्या में गिरते हैं। कभी-कभी वे संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं और यहां तक ​​कि कभी कभी तो ऐसे स्थिति उत्पन्न हो जाती है कि मानव जीवन को भी इनसे खतरा होता है। अन्य विदेशी पेड़ जैसे यूकेलिप्टस (Eucalyptus), ऑस्ट्रेलिया (Australia) के मूल निवासी और वहां के स्थानिक कोआला भालू (Koala Bear) के प्रिय हैं, लेकिन भारत में स्थानीय पक्षियों और जानवरों के लिए दुर्गम हैं। इन सबके बावजूद 2009 तक, मुंबई नगर निगम के उद्यान विभाग ने स्थानीय प्रजातियों के पक्ष में विदेशी पेड़ लगाना जारी रखा। जिसके परिणामस्वरूप मुंबई के सार्वजनिक स्थानों पर विदेशी ताड़ के पेड़ और अफ्रीकी ट्यूलिप (African Tulip) के पेड़ सामान्य रूप से पाए जाते हैं। उनकी सुंदरता और आकर्षण, लोगों को विदेशों में बिताई छुट्टियों के कुछ महत्वपूर्ण पलों की याद दिला देते हैं।
स्थानीय पेड़ प्राकृतिक वृक्षारोपण के साथ-साथ झाड़ियों, लताओं, घासों, जंगली फूलों की संपत्ति एवं सुंदरता और जैव विविधता के बिना अधूरे माने जाते हैं क्योंकि ये सभी एक साथ मिलकर एक समग्र पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं। सामान्य स्थानीय पौधे लगाने के लिए पौधों का चयन करने के लिए हमें कई प्रकार के विकल्प मिलते हैं जैसे हिबिस्कस (Hibiscus), इक्सोरा (Ixora), बालसम (Balsam), चमेली (Jasmine), सोन-चंपा (Son-champa) और कई अन्य प्रकार के पौधे जिन्हें निरंतर देखभाल या कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं होती है। यहां प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले पानी और सूरज की सही मात्रा के कारण हवाई हिबिस्कस या सिंगापुर (Singapore) चंपा के विपरीत, स्थानीय पौधे प्रचुर मात्रा में फूलते हैं। हिबिस्कस वह वनस्पति है जिसमें स्थानीय पक्षी और जानवर सबसे अच्छे और स्वस्थ रूप से पनपते हैं।
इज़राइल (Israel) और दुबई (Dubai) जैसे देशों में, ड्रिप सिंचाई प्रणाली के कारण हरे-भरे फूलों के बगीचों को खिलने और रेगिस्तान होने के बावजूद वहां पनपने का अवसर प्राप्त हुआ है। जो किसी असाधारण अजूबे से कम नही है। ऐसे विदेशी उद्यानों को अक्सर निरंतर देखभाल की आवश्यकता होती है और ये आमतौर पर स्थानीय जैव विविधता या पारिस्थितिक तंत्र का समर्थन नहीं करते हैं।
कई पौधों को फैलने के लिए मानवीय हस्तक्षेप की आवश्यकता होती है और वे पौधे पक्षियों, मधुमक्खियों और तितलियों के लिए अनुकूल आवास प्रदान नहीं करते हैं। अपने प्राकृतिक आवास के बाहर, ये विदेशी पौधे अक्सर नाजुक होते हैं और संक्रमण से ग्रस्त होते हैं और उन्हें कीटनाशकों और कवकनाशी के नियमित छिड़काव की आवश्यकता हो सकती है। पौधों पर कीटनाशकों का छिड़काव पक्षियों, तितलियों और जैव विविधता के लिए हानिकारक साबित होता है। जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं पर वैश्विक मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार यह पता चला है कि फलों और सब्जियों सहित विश्व की खाद्य फसलों की प्रजातियों के 75 प्रतिशत से अधिक प्रजाति और कुछ सबसे महत्वपूर्ण नकदी फसलें, जैसे कि कॉफी, कोको और बादाम, सभी पशु परागण पर निर्भर होती हैं। पक्षी फल खाते और उनके बीज एक स्थान से दूसरे स्थान में फैलाते हैं, वही बीज नए पौधे को उत्पन्न करते हैं और उसकी वृद्धि करते हैं। तितलियाँ और मधुमक्खियाँ अमृत इकट्ठा करती हैं और फूलों को परागित करती हैं। इन सभी के द्वारा प्रदान की जाने वाली पारिस्थितिकी सेवाओं के बिना, दुनिया की कृषि और खाद्य प्रणाली अधूरी होती है और कृषि प्रणाली को गंभीर रूप से खतरा हो सकता है।
हमारे शहरों में स्थानीय जैव विविधता को पुनः स्थापित करने से पिछली परिस्थितियों में कई अधिक महत्वपूर्ण लाभ हुए हैं। जिस तरह हिमालय में स्थित मनाली को कोंकण तट पर मुंबई में नहीं बनाया जा सकता है तथा अंडमान द्वीप समूह के वर्षावन, लक्षद्वीप के रेत के टीले नहीं हो सकते, ठीक उसी प्रकार स्थानीय और भारतीय मौसम उनकी अपनी प्रजातियों के लिए सबसे उपयुक्त है और उसे कहीं और उत्पन्न नहीं किया जा सकता। वे अपने स्वयं के पौधों और पारिस्थितिक तंत्र को सबसे सुंदर बनाता है।
मुंबई संजय गांधी राष्ट्रीय उद्यान (Sanjay Gandhi National Park), दुनिया का एकमात्र ऐसा राष्ट्रीय उद्यान है जहां एक शहरी महानगर के बीच में तेंदुए जैसे जंगली जानवर इंसानों के साथ रहते हैं। सैकड़ों साल पहले बौद्ध भिक्षुओं द्वारा लगाया गया सीता-अशोक का एक पौधा अब भी कन्हेरी गुफाओं के पास फलता-फूलता है। पक्षी, कीड़े, सरीसृप, गिलहरी और चमगादड़ अन्य स्थानीय और स्वदेशी पेड़ों के साथ एक पारिस्थितिकी तंत्र बनाते हैं जो पौधों की विभिन्न प्रजातियों का समर्थन करता है।

संदर्भ:
https://bit.ly/3G7dR1j
https://bit.ly/3wIXS55

चित्र संदर्भ
1  बरगद के वृक्ष को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
2. क्वींसलैंड ऑस्ट्रेलिया वाइल्डको दर्शाता एक चित्रण (Pixabay)
3. गुलमोहर (Gulmohar) को दर्शाता एक चित्रण (Hippopx)
4. पोवाआई हिल आईआईटी बॉम्बे को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)



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