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कैसे रहे सदैव खुश, क्या सिखाता है पुरुषार्थ और आधुनिक मनोविज्ञान

लखनऊ

 02-07-2022 10:07 AM
विचार 2 दर्शनशास्त्र, गणित व दवा

आपने यह कहावत तो जरूर सुनी होगी की "खुशियां बांटने से बढ़ती हैं!" अर्थात "दान देना या बांटना ही खुशी है!" लेकिन यह तो केवल एक छोटा सा उदाहरण है, जो सच्ची ख़ुशी को परिभाषित करता है। आगे हम आपको एक ऐसी बहुमूल्य पुस्तक “द हैप्पीनेस हाइपोथिसिस: फाइंडिंग मॉडर्न ट्रुथ इन एंशिएंट विजडम” और कुछ शानदार विचारों से रूबरू करवायेंगे, जो आपके लिये खुशियों के हर संभव दरवाजों को खोल देंगे। खुशी की परिकल्पना या “द हैप्पीनेस हाइपोथिसिस:(The Happiness Hypothesis)” पुस्तक को लेखक जोनाथन हैडट (Jonathan Haidt) ने 2006 में जिज्ञासु पाठकों के लिए लिखा था। यह एक मनोविज्ञान आधारित पुस्तक है, इसमें, हैड्ट ने प्राचीन विचारकों- प्लेटो (Plato), बुद्ध , जीसस (Jesus Christ) , और अन्य लोगों द्वारा समर्थित, तथा ख़ुशी से संबंधित कई "महान विचार" प्रस्तुत किए हैं। यह विचार समकालीन मनोवैज्ञानिक अनुसंधानों की जांच करके, उनसे वह सबक निकालते हैं जो अभी हमारे आधुनिक जीवन पर भी लागू होते हैं। पुस्तक के केंद्र में पुण्य, खुशी , पूर्ति और अर्थ की अवधारणाएं पेश की गई हैं। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने आधुनिक लोगों को ख़ुशी पाने के लिए सुलभ अनंत 'ज्ञान' को 10 महान विचारों या दस अध्यायों के रूप में दिया गया है।
पहला अध्याय: बताता है कि, कैसे प्रत्येक व्यक्ति के दो भाग होते हैं: आदिम भाग, जिसमें हमारी मूल प्रवृत्तियाँ शामिल हैं; और दूसरा अत्यधिक विकसित भाग, जो वृत्ति को नियंत्रित करने का प्रयास करता है।
अध्याय दो: में हमारी प्रवृत्ति को नियंत्रित करने का प्रयास दिखाया गया है, जिन्हे विभिन्न तकनीकों जैसे: ध्यान, साधना से नियोजित किया जा सकता है। “भले ही जीन हमारी खुशी को प्रभावित करते हैं, लेकिन हमारे सोचने के तरीके को बदलने से हम खुश हो सकते हैं।”
तीसरा अध्याय: दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करें, जैसा कि आप चाहते हैं कि वे आपके साथ करें, के सुनहरे नियम को बताता है,
चौथा अध्याय: मनुष्य की उस प्रवृत्ति के वर्णन की ओर ले जाता है, जिसमें लोगों के भीतर स्वयं की तुलना में दूसरों में अधिक आसानी से दोष देखने की प्रवृत्ति होती है, जिसे केवल महसूस करने से हम सुधार सकते हैं।
पांचवें अध्याय: में, हैडट ने खुशी की परिकल्पना की धारणा का परिचय दिया है। खुशी की परिकल्पना यह हो सकती है कि, खुशी भीतर से आती है! ऐसा ही बुद्ध ने भी कहा था।
अध्याय छह: में हैड्ट ने तर्क दिया है कि, प्रेम स्वयं पर अधिक पर निर्भर करता है और खुशी के लिए महत्वपूर्ण होता है।
सातवां अध्याय: पूछता है कि, क्या प्रतिकूलता खुशी के लिए जरूरी है? और यह एक सूक्ष्म उत्तर भी प्रदान करता है।
आठवें अध्याय: में हैड्ट ने दावा किया है कि, खुशी प्राप्त करना एक जटिल प्रक्रिया है! जिसमें सद्गुणी अभिनय भी शामिल है।
अध्याय नौ: इस विचार का विस्तार करता है कि एक व्यक्ति की खुशी; सद्गुण से जीने से लाभान्वित होती ।
अध्याय दस: तर्क देता है कि, एक सुखी जीवन वह है जहां आप अपने और दूसरों के बीच, अपने और अपने काम के बीच, कुछ बड़ा संबंध स्थापित कर पाते हैं।
इस पुस्तक में खुश रहने के कई शानदार तरीकों का उदहारण सहित वर्णन है, लेकिन इसके अलावा ख़ुशी को पुरुषार्थ के माध्यम से भी प्राप्त किया जा सकता है।
पुरुषार्थ क्या है?
पुरुषार्थ से तात्पर्य मानव के लक्ष्य या उद्देश्य से होता है। ('पुरुषैर्थ्यते इति पुरुषार्थः') पुरुषार्थ = पुरुष+अर्थ =पुरुष का तात्पर्य विवेक संपन्न मनुष्य से है। अर्थात विवेक शील मनुष्यों के लक्ष्यों की प्राप्ति को ही पुरुषार्थ माना गया है। वेदों में चार पुरुषार्थों- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का वर्णन मिलता है। इसलिए इन्हें 'पुरुषार्थ चतुष्टय' भी कहते हैं। महर्षि मनु को पुरुषार्थ चतुष्टय के प्रतिपादक माना गया हैं। चार्वाक दर्शन केवल दो ही पुरुषार्थ - अर्थ और काम को मान्यता देता है। वह धर्म और मोक्ष को नहीं मानता। महर्षि वात्स्यायन भी मनु के पुरुषार्थ-चतुष्टय के समर्थक हैं, किन्तु वे मोक्ष तथा परलोक की अपेक्षा धर्म, अर्थ, काम पर आधारित सांसारिक जीवन को सर्वोपरि मानते हैं। भारतीय संस्कृति में इन चारों पुरूषार्थो का विशिष्ट स्थान रहा है। वस्तुतः इन पुरूषार्थो ने ही भारतीय संस्कृति में आध्यात्मिकता के साथ भौतिकता का एक अद्भुत समन्वय स्थापित किया है।
पुरुषार्थ को चतुर्वर्ग भी कहा जाता है। पुरुषार्थ हिंदू धर्म में एक प्रमुख अवधारणा है, जिसमें यह माना जाता है कि प्रत्येक मनुष्य के चार उचित लक्ष्य होते हैं जो एक पूर्ण और सुखी जीवन के लिए आवश्यक और पर्याप्त होते हैं।
1. धर्म - जीवन के ऐहिक (ecclesiastical) और पारलौकिक दोनों पक्षों से धर्म को जोड़ा गया था। धर्म शब्द का अर्थ अत्यन्त गहन और विशाल होता है। इसके अंतर्गत मानव जीवन के उच्चतम विकास के साधनों और नियमों का समावेश होता है। धर्म कोई उपासना पद्धति न होकर एक विराट और विलक्षण जीवन-पद्धति है। यह दिखावा नहीं, दर्शन है। यह प्रदर्शन नहीं, प्रयोग है। यह मनुष्य को आधि, व्याधि, उपाधि से मुक्त कर सार्थक जीवन तक पहुँचाने की चिकित्सा है। यह स्वयं द्वारा स्वयं की खोज है।
2. अर्थ - अर्थ "जीवन के साधन", गतिविधियों और संसाधनों का प्रतीक है, जो किसी को उस स्थिति में रहने में सक्षम बनाता है जिसमें वह रहना चाहता है। अर्थ में धन, करियर, जीवनयापन करने के लिए गतिविधि, वित्तीय सुरक्षा और आर्थिक समृद्धि शामिल है। अर्थ की उचित खोज को हिंदू धर्म में मानव जीवन का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य माना जाता है। धर्म के बाद दूसरा स्थान अर्थ का है। अर्थ के बिना, धन के बिना संसार का कार्य चल ही नहीं सकता। जीवन की प्रगति का आधार ही धन है। उद्योग-धंधे, व्यापार, कृषि आदि सभी कार्यो के निमित्त धन की आवश्यकता होती है। यही नहीं, धार्मिक कार्यो, प्रचार, अनुष्ठान आदि सभी धन के बल पर ही चलते हैं।
3. काम - काम इच्छा, जुनून, भावनाओं, इंद्रियों का आनंद, जीवन का सौंदर्य आनंद, स्नेह, या प्रेम, यौन अर्थों के साथ या बिना दर्शाता है। गेविन फ्लड (Gavin Flood) काम को धर्म (नैतिक जिम्मेदारी), अर्थ (भौतिक समृद्धि) और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) की ओर किसी की यात्रा का उल्लंघन किए बिना "प्रेम" के रूप में बताते हैं।
4. मोक्ष - मोक्ष मुक्ति, का प्रतीक है। हिंदू धर्म के कुछ स्कूलों में, मोक्ष संसार से मुक्ति, मृत्यु और पुनर्जन्म के चक्र को दर्शाता है, अन्य स्कूलों में मोक्ष इस जीवन में स्वतंत्रता, आत्म-ज्ञान, आत्म- साक्षात्कार और मुक्ति को दर्शाता है। प्राचीन भारतीय साहित्य इस बात पर जोर देता है कि धर्म सर्वोपरि है। यदि धर्म की उपेक्षा की जाती है, तो अर्थ और काम - क्रमशः लाभ और सुख - सामाजिक अराजकता की ओर ले जाते हैं।

संदर्भ

https://bit.ly/3QOZe7P
https://bit.ly/3HXUAA5
https://bit.ly/39XvJjx
https://bit.ly/3y0N6I7

चित्र संदर्भ
1. “द हैप्पीनेस हाइपोथिसिस:(The Happiness Hypothesis)” पुस्तक को दर्शाता एक चित्रण (amazon)
2. लेखक जोनाथन हैडट को दर्शाता एक चित्रण (flickr)
3. साथ में बैठे दोस्तों को दर्शाता एक चित्रण (wikimedia)
4. महर्षि मनु को दर्शाता एक चित्रण (youtube)



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