घंटाघर और लोगों की दिनचर्या

लखनऊ

 25-02-2018 09:01 AM
वास्तुकला 1 वाह्य भवन

घंटाघर समान्यतः सभी ऐसे शहरों में पाया जाता है जहाँ पर अंग्रेजों का राज था जैसे मेरठ, कानपुर, बनारस, मुम्बई इत्यादि। सभी शहरों में ये घंटाघर शहर के गर्भ में बनाये जाते थें ताकी वहाँ रहने वाले नागरिकों तक इसकी आवाज़ पहुँच सके। घंटाघर की घंटी के आधार पर ही व्यक्ति काम पर जाता था तथा उसकी छुट्टी भी उसी आधार पर होती थी। घंटाघर समस्त शहरों के नब्ज की तरह कार्य करता था क्युँकी यह आधार था सम्पूर्ण दैनिक गतिविधियों का। लखनऊ शहर ब्रितानी शासन के अन्तर्गत कार्य किया था जिसकारण यहाँ पर भी घंटाघर का निर्माण किया गया था। यहाँ का घंटाघर हुसैनाबाद घंटा घर नाम से जाना जाता है जो की इमामबाड़े के ठीक सामने है।

लखनऊ का घंटाघर भारत का सबसे ऊँचा घंटाघर है। इस घंटाघर का निर्माण कार्य 1881ई. में शुरू हुआ था तथा यह 1887 ई. में बनकर तैयार हुआ था। इसे ब्रिटिश वास्तुकला के सबसे बेहतरीन नमूनों में से एक माना जाता है। 221 फीट ऊँचे इस घंटाघर का निर्माण नवाब नसीरुद्दीन हैदर ने सर जार्ज कूपर के आगमन पर करवाया था। जार्ज कूपर संयुक्त अवध प्रान्त के प्रथम लेफ्टिनेंट गवर्नर थे। हैरत की बात हैं कि इस इमारत के समर्थन में कोई भी खम्बा शामिल नहीं हैं। घंटाघर में लगी घड़ी ब्रिटेन की फर्म जे.डब्ल्यू बेसन की बनाई तीन विश्व की महान घडिय़ों में से एक है। गन मेटल से बनी यह घड़ी उस समय 26,900 रुपयों में बनकर तैयार हुई थी। इस घंटाघर में लगी घड़ी की सूईयां उस धातु से बनाई गयी है जिस धातु से बंदूक बनायी जाती थी तथा इन्‍हे लंदन के लुईगेट हिल से लाया गया था। चौदह फीट लंबा और डेढ़ इंच मोटा पेंडुलम, वेस्‍टमिनस्‍टर क्‍लॉक की तुलना में काफी बड़ा है। इस घंटे के आसपास फूलों की पंखुडियों के आकार पर बेल्‍स लगी हुई हैं, जो हर 1 घंटे बाद बजती हैं। कहा जाता हैं इस घंटाघर के पहिये बिग बेन (लन्दन में बने घंटाघर की महान घंटी) से ज्यादा बड़े हैं। हालांकि 1984 में इसकी घड़ियां रुक गयी थी। दो लखनऊ वासियों ने इस नवाबी पहचान को दुरुस्त करने का ज़िम्मा अपने हाथों लिया और इसकी घड़ियों की टिक-टिक लाने में मदद की। इसकी आवाज़ को सुनने के लिए लोग वह खड़े होकर वर्तमान काल में इंतज़ार करते हैं। यह घंटाघर आज भी लखनऊ के ऐतिहासिक महत्ता को प्रदर्शित करता है।

1. गाइड टू लखनऊ, एम.ए.बेग, एम.ए.जे. बेग
2. लखनऊ पोयटिका, डॉ.रुपाली शरण, आमना शमीम.
3. अदब-लखनऊ..... फॉण्ड मेमोरीज़, कमलेश त्रिपाठी, सुजाता त्रिपाठी



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